Bhadas ब्लाग में पुराना कहा-सुना-लिखा कुछ खोजें.......................

Loading...

: जय भड़ास : दुनिया के सबसे बड़े हिंदी ब्लाग में आपका स्वागत है : 888 सदस्यों वाले इस कम्युनिटी ब्लाग पर प्रकाशित किसी रचना के लिए उसका लेखक स्वयं जिम्मेदार होगा : आप भी सदस्यता चाहते हैं तो मोबाइल नंबर, पता और प्रोफाइल yashwantdelhi@gmail.com पर मेल करें : जय भड़ास :

26.3.15

एक कैंसर यौद्धा की कहानी

Name of Patient is Mr. Ratan Lal. He is an accountant working in J.K.J.Jewellers of Jaipur. He had some difficulty in swallowing in July, 2014. He was given supportive treatment his doctor. He was not able to talk and eat properly. On August 4 he was diagnosed as Squamous cell Carcinoma. Doctor wanted to operate him immediately and then Chemo or Radiation. But one of relative Duli Chand Karel told him to visit Dr. O.P.Verma at Kota. He was advised to follow Budwig Protocol sincerely. He was asked to take Om Khand (Oil-Protein Muesli) twice a day, fruit and vegetable juices. For detoxification Coffee Enema, Soda Bicarb bath, Sun therapy and massage was advised. He was also told to do Meditation, Yog Nidra, Pranayam and Visualization. Positive attitude is very important. He followed this treatment very sincerely. Results are mind blowing in just 28 days. His Tumor has started shrinking. He is eating and talking comfortably. Mr. Ratan Lal is very confidant and positive.

Dr. O.P.Verma
M.B.B.S., M.R.S.H.(London)
7-B-43, Mahaveer Nagar III, Kota Raj.
http://flaxindia.blogspot.in
Email- dropvermaji@gmail.com
+919460816360
हमारी संस्था हर बड़े शहर में कैंसर हॉस्पीटल बनाने जा रही है, जहाँ कैंसर के रोगियों का बुडविग प्रोटोकोल द्वारा उपचार किया जाएगा।
मोक्ष के द्वार खोलने वाली अलसी माता परम सुखदायी है। माँ अपने भक्तों की समस्त इच्छाओं की पूर्ति करती है। इसलिए हम अलसी मां का एक विशाल अलसी मंदिर भी बनवा रहे हैं।
मैं आपसे गुजारिश करती हूँ कि आप हमारी संस्था को यथा संभव अपना आर्थिक सहयोग देकर संस्था को सशक्त बनाये।
मीना सुमन
Deposit your Donation & Membership Fee in
Flax Awareness Society A/C No. 33864247918 State Bank Of India, Mahaveer Nagar, Kota Raj. 324005. IFSC Code SBIN0011311
or Flax Awareness Society A/C No. 65180192509 State Bank Of Patiala, Talwandi, Kota Raj. 324007. IFSC Code STBP0001022
For other purposes deposit the money in
Dr. O.P.Verma A/C No. 10927247205 State Bank Of India, Chhawani Chouraha LIC Building, Kota Raj. 324007. IFSC Code SBIN0001534
Autoplay https://www.youtube.com/watch?v=LXCu71Gyhtk

ओ पी वर्मा से मिले ज्ञान तो कैंसर उपचार बने आसान


25.3.15

बुडविग उपचार का मिल जाए ज्ञान तो आरोग्य की राह बन जाए आसान

Patient (Metastatic Liver Cancer) is taking Budwig Protocol since a month. He had difficulty in swallowing solid foods, had vomiting, abdominal pain, body pains and weakness. Now he feels much better, eats very comfortably, vomiting stopped, tumor shrinks and lot of relief in pain. He takes Oil-Protein Muesli twice, Juices, coffee enemas, soda bicarb bath. He also takes Essiac tea at bed time and says good bye to cancer.

केलवाड़ा का मोहन लाल एक महीने पहले हमारे पास आया। उसे लीवर में मेटास्टेटिक कैंसर था। उसे खाना निगलने में बहुत तकलीफ होती थी, उल्टियां होती थी, पेट और शरीर में बहुत दर्द और कमजोरी थी। हमने उसे बडविग प्रोटोकॉल लेने की सलाह दी। एक महीने में ही उसे बहुत अच्छा लग रहा है। अब वह बिना किसी परेशानी के खाना खा रहा है, उल्टियां बंद हो गई हैं, गांठ छोटी होने लगी है और  दर्द में बहुत राहत है। वह दो बार ओम खंड, फल और सब्जियों के जूस, कॉफी एनीमा, सोडा बाइकार्ब बाथ ले रहा है। सोने से पहले वह एसीयक  चाय लेता है और कैंसर को बाय कहता है।
Dr. O.P.Verma
M.B.B.S., M.R.S.H.(London)
7-B-43, Mahaveer Nagar III, Kota Raj.
http://flaxindia.blogspot.inEmail- dropvermaji@gmail.com+919460816360

24.3.15

बहुमत के बाद भी जिला पंचायत अध्यक्ष ,उपाध्यक्ष का चुनाव हारने वाली कांग्रेस जयचंदों को दंड़ित कर पायेगी?
 जिला पंचायत के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत होने के बाद भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। जिले के ग्रामीण मतदाताओं ने जिला पंचायत में कांग्रेस का जनादेश दिया था लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद पर भाजपा की मीना बिसेन और चंद्रशेखर चर्तुवेदी चुनाव जीत गयें हैं। मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने सिवनी में भाजपा का अध्यक्ष बिठाने के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और ऐसे विचार उन्होंने जिले के कुछ विधायकों से भी व्यक्त कर सहयोग का अनुरोध किया था। जब प्रदेश का मुखिया ही जनादेश के विपरीत ऐसा प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ले तो कुछ भी हो सकना संभव था। जब हर तरह के प्रयास के बाद भी बात नहीं बनी तो गोमती ठाकुर  बात मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से करायी गयी। विश्वसनीय सूत्र तो यहां तक दावा कर रहें हैं कि उन्हें महिला आयोग का सदस्य बना कर लाल बत्ती से नवाजने के लिये आश्वस्त कर दिया गया है। इस चुनाव में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत हाने के बाद भी कांग्रेस चुनाव हार गयी और भाजपा ने पहली बार बीस साल बाद जिला पंचायत में कब्जा कर लिया और उसकी मीना बिसेन अध्यक्ष बनीं। जबकि घंसौर से कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी घोषित किये गये चंद्रशेखर चर्तुवेदी भाजपा से उपाध्यक्ष चुने गये।कांग्रेस में हार का विश्लेषण किया जा रहा है और जयचंदों को तलाश कर उन्हें दंड़ित करने की बात की जा रही हैं। लेकिन क्या कांग्रेस जयचंदों को दंड़ित कर पायेगी?
जिपं में कांग्रेस की हार और भाजपा की जीत हुयी चर्चित-जिला पंचायत के चुनावों में कांग्रेस को बहुमत होने के बाद भी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। जिले के ग्रामीण मतदाताओं ने जिला पंचायत में कांग्रेस का जनादेश दिया था लेकिन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद पर भाजपा की मीना बिसेन और चंद्रशेखर चर्तुवेदी चुनाव जीत गयें हैं। हालांकि इस चुनाव में जिले के कांग्रेस के दोनों विधायक रजनीश सिंह और योगेन्द्र सिंह बाबा तथा भाजपा की ओर से कमल मर्सकोले और दिनेश मुनमुन राय सक्रिय थे। इस 19 सदस्यीय जिला पंचायत में कांग्रेस के 11 और भाजपा के 6 तथा दोनों ही पार्टियों के एक एक बागी चुनाव जीते थे। पंचायती राज लागू होने के बाद से लगातार चार बार कांग्रेस ने अपना कब्जा बनाये रखा था जो कि बीस साल बाद स्पष्ट बहुमत होने के बाद भी समाप्त हो गया। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के रणनीतिकार अपने क्षेत्र से निर्वाचित सदस्य को अध्यक्ष बनाने के मोह से परे नहीं रह पाये। इस कारण योग्यता की तुलना में क्षेत्रीयता हावी हो गयी और परिणाम विपरीत आ गये। यह भी कहा जा रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान ने सिवनी में भाजपा का अध्यक्ष बिठाने के लिये प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था और ऐसे विचार उन्होंने जिले के कुछ विधायकों से भी व्यक्त कर सहयोग का अनुरोध किया था। जब प्रदेश का मुखिया ही जनादेश के विपरीत ऐसा प्रतिष्ठा का प्रश्न बना ले तो कुछ भी हो सकना संभव था। जिले के प्रभारी मंत्री गौरीशंकर बिसेन और सांसदद्वय फग्गनसिंह कुलस्ते तथा बोधसिंह भगत भी इस प्रयास में जुट गये थे। अंततः भाजपा की मीना बिसेन को 10,कांग्रेस की केवलारी क्षेत्र से चुनी गयीं ऊषा दयाल पटेल को 8 तथा 1 वोट निरस्त हुआ जबकि उपाध्यक्ष पद में भाजपा के चंद्रशेखर चर्तुवेदी और कांग्रेस के अशोक सिरसाम को 9 9 वोट मिले और एक वोट इसमें भी निरस्त हुआ। इस तरह कांग्रेस के खेमे के अध्यक्ष पद में दो तथा उपाध्यक्ष पद में एक वोट बाहर गया और कहा जाता है कि प्रत्याशी चयन से नाराज एक सदस्य ने दोनों ही समय अपना वोट एक ही तरीके से निरस्त करवा दिया। कांग्रेसी खेमें में एक तरफ तो इस बात को लेकर खोज जारी है कि आखिर अपनें में ही जयचंद कौन हैं? तो दूसरी तरफ कुछ नेताओं का यह भी मानना है कि कांग्रेसी सदस्य जयचंद क्यों बने? इसके कारणों को भी तलाशना चाहिये। चुनाव के बाद कुछ कांग्रेसी सदस्यों ने प्रत्याशी चयन के तरीके से भी नाराजगी जतायी हैं तो कुछ सदस्यों का यह भी कहना है कि सदस्यों की राय कुछ और थी और उन पर यह निर्णय थोपा गया था। इसीलिये कांग्रेस को हार का सामना पड़ा। कुछ राजनैतिक प्रेक्षक तो यह मान रहें कि जब मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था तो फिर कहीं भी कुछ भी हो जाना असंभव नहीं हैं?
शिवराज से बात करने के बाद मानीं गोमती?-जिले के भाजपा नेताओं ने जिला पंचायत की चार बार लगातार चुनाव जीतने वाली गोमती ठाकुर को इस बार टिकिट नहीं दी थी। लेकिन वो बागी होकर चुनाव लड़ीं थीं और एक ही क्षेत्र से लगातार पांच बार चुनाव जीतने का एक रिकार्ड बनाया था। वे भाजपा के स्थानीय नेतृत्व से बुरी तरह नाराज थीं। वे किसी भी कीमत पर भाजपा को अध्यक्ष उपाध्यक्ष पद के चुनाव में उस वक्त तक वोट देने को तैयार नहीं थीं जबकि उन्हें अध्यक्ष पद का उम्मीदवार ना बना दिया जाय। भाजपायी सूत्रों का कहना है कि जब हर तरह के प्रयास के बाद भी बात नहीं बनी तो उनकी बात मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान से करायी गयी। विश्वसनीय सूत्र तो यहां तक दावा कर रहें हैं कि उन्हें महिला आयोग का सदस्य बना कर लाल बत्ती से नवाजने के लिये आश्वस्त कर दिया गया है। यदि ऐसा होता है तो जिले एक मात्र बरघाट क्षेत्र से विधानसभा चुनाव जीतने वाली भाजपा अब इसी क्षेत्र में मीना बिसेन के बाद दूसरी लाल बत्ती देने की तैयारी कर रही है। 
क्या जयचंदों को दंड़ित करेगी कांग्रेस?-अभी तक के जिला पंचायत अध्यक्ष उपाध्यक्ष चुनाव के बारे में देखा जाये तो पहली आदिवासी महिला अध्यक्ष गीता उइके सिवनी विस से थीं तो उपाध्यक्ष झुम्मकलाल बिसेन केवलारी से थे। दूसरी अनुसूचित जाति की महिला अध्यक्ष रैनवती मानेश्वर लखनादौन विस से थीं तो उपाध्यक्ष आलोक वाजपेयी घंसौर विस के थे। तीसरी पिछड़े वर्ग की किरार जाति की महिला अध्यक्ष प्रीता ठाकुर केवलारी क्षेत्र से थीं तो उपाध्यक्ष शक्तिसिंह घंसौर विस के थे। चौथे पिछड़े वर्ग के कुर्मी जाति के अध्यक्ष मोहन चंदेल नये परिसीमन के अनुसार बरघाट क्षेत्र के थे तो उपाध्यक्ष अनिल चौरसिया केवलारी विस के थे। इस तरह यदि देखा जाये तो कांग्रेस ने घंसौर विस को छोड़कर सभी क्षेत्रों से अध्यक्ष दिये थे तो घंसौर क्षेत्र को दो बार उपाध्यक्ष पद दिया गया था। केवलारी क्षेत्र कोे दो बार उपाध्यक्ष तो एक बार अध्यक्ष पद दिया गया था। घंसौर क्षेत्र परिसीमन में समाप्त कर दिया गया था। इस बार पुराने घंसौर क्षेत्र की दावेदार चित्रलेखा नेताम, जो कि पहले जिपं चुनाव में अध्यक्ष पद की दावेदार थीं, प्रबल दावेदार थीं लेकिन कांग्रेस ने केवलारी क्षेत्र की किरार समाज की ऊषा दयाल पटले को अध्यक्ष पद के लिये उम्मीदवार बनाया और सिवनी विकास खंड़ के अशोक सिरसाम को उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाया था जिनक क्षेत्र में केवलारी विस का भोमा सहित कुछ हिस्सा आता हैं।लेकिन इस चुनाव में कांग्रेस का स्पष्ट बहुमत हाने के बाद भी कांग्रेस चुनाव हार गयी और भाजपा ने पहली बार बीस साल बाद जिला पंचायत में कब्जा कर लिया और उसकी मीना बिसेन अध्यक्ष बनीं। जबकि घंसौर से कांग्रेस समर्थित प्रत्याशी घोषित किये गये चंद्रशेखर चर्तुवेदी उपाध्यक्ष चुने गये। इनके पिता जयंतकुमार चर्तुवेदी घंसौर क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता है और लंबे समय से कांग्रेस की राजनीति कर रहें है। कांग्रेस में हार का विश्लेषण किया जा रहा है और जयचंदों को तलाश कर उन्हें दंड़ित करने की बात की जा रही हैं लेकिन पिछले बीस सालों से जयचंदों को पुरुस्कृत करने का कांग्रेस में जो सिलसिला चला है उसे देखते हुये यह नहीं लगता कि जयचंदों के खिलाफ कोई कार्यवाही हो पायेगी। “मुसाफिर”     

22.3.15

अलसी की मेगी

अलसी की मैगी में ओमेगा-3 का दम,
रखे बच्चों को तंदुरूस्त हर कदम.

           दोस्तों, मेगी बच्चों का मनपसंद व्यंजन है। लेकिन यह प्रिजर्वेटिव्ज और खतरनाक कैमीकल्स से भरपूर है और सेहत को बहुत नुकसान पहुँचाता है। माधुरी दीक्षित ने भी बच्चों के लिए ओट्स मेगी बनाई पर बच्चों ने उसे नकार दिया। अब फ्लेक्स इंडिया ने बच्चों के लिए मजेदार धुँआंधार अलसी की मेगी बनाई है, इसके स्वाद ने बच्चों और बूढ़ों सभी को दीवाना बना दिया है। 

इसका स्लोगन गीत है (शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के दर्द जवानी का सताए बढ़ बढ़ के)  .... 

सेहत पे लग जाए स्वाद का तड़का, 
अलसी की मेगी खाके दिल मेरा फड़का। 
बुद्धि बढ़ाए ताकत भी आए, 
रैंक भी अच्छी लाए लड़की और लड़का।




ऐसे होते हैं चमत्कार


शांति की आरोग्य यात्रा – आह से अहा तक (कैंसर में अलसी के तेल का चमत्कार)

शांति की आरोग्य यात्रा आह से अहा तक 
तीन महीने में बदला जीवन 
इस महिला का नाम शांति उम्र 40 वर्ष है। यह डूँगरगंढ, बीकानेर के पास किसी गांव की रहने वाली है। डेढ़ साल पहले इसकी बच्चेदानी में लियोमायोसारकोमा नाम का कैंसर हुआ। बीकानेर के एक अच्छे अस्पताल में इसका आपरेशन और कीमोथैरपी कर दी गई। 6 महिने तक सब कुछ ठीक ठाक रहा, लेकिन उसके बाद स्थिति बिगडने लगी। उसकी कमर में बांई तरफ एक बहुत बड़ा मेटास्टेटिक ट्यूमर हो गया, जिसमें बहुत दर्द रहने लगा, खून की कमी हो गई और हिमोग्लोबिन 6 से नीचे आ गया। कमजोरी, उबकाई, अनिद्रा तथा कई परेशानियां होने लगी। भूख भी नही लगती थी। एलोपैथी से कोई फायदा नही हो रहा था, इसलिए उनकी दवाइयां बंद कर दी गई। कुछ महिने इधर-उधर भटकने के बाद, किसी ने उसे सही राह दिखाई। और तीन महीने पहले वह मुझसे परामर्श लेने आई। वह बहुत कमजोर, सुस्त और निढ़ाल हो चुकी थी, चेहरा पीला पड़ चुका था। वह कुछ बोल भी नहीं पा रही थी, हिमोग्लोबिन 7 ग्राम के आस पास रहा होगा। बांई तरफ कमर की गांठ में असहनीय दर्द और वेदना थी।                  
यह पूरा परिवार अशिक्षित था और और ग्रामीण इलाके के एक खेत में रहता था। ये हिंदी भाषा भी नहीं बोल पाते थे। इन्हें बुडविग प्रोटोकोल की पूरी ट्रेनिंग देना हमें बड़ा कठिन काम लग रहा था। फिर भी हमने दिन भर इन्हें बुडविग प्रोटोकोल की ट्रेनिंग दी। मुझे तो लग ही नहीं रहा था कि यह मरीज चार दिन भी बुडविग प्रोटोकोल ले पाएगी। लेकिन डेढ़ महीने बाद उसके भाई का अचानक फोन आया,  मुझसे कुछ सवाल पूछे और कहा कि शांति की हालत धीरे धीरे सुधर रही है। यह सब सुनने के बाद भी मुझे कोई खास उम्मीद नहीं थी।
                                                    


लेकिन जब तीन महीने बाद 25 नवम्बर 2014 को शांति ने मेरे कमरे में कदम रखा तो मैं इसे देखकर स्तभ रह गया। मुझे विश्वास नहीं हो पा रहा था कि क्या यह वही महिला है जो तीन महिने पहले मुझे दिखाने आई थी। वह बार-बार मुझसे अपनी भाषा मे कुछ कहने व पूछने की कोशिश कर रही थी। वह खुश व प्रसन्न दिखाई दे रही थी। उसका चेहरा चमक उठा था। चेहरे के दाग धब्बे दूर हो चुके थे। चेहरे की लाली और चिकनापन देखते बनता था। उसकी रग-रग से ओमेगा-3 के अणु और ऊर्जावान इलेक्ट्रोन्स टपक रहे थे। उसकी उल्टियां बंद हो चुकी थी, भूख खुल गई थी, दर्द में भी आराम था। उसका हिमोग्लोबिन बढ़ कर 11.5 ग्राम हो चुका था। उसकी बड़ी सारी गांठ 84x78 से कम होकर 46x34  मि.मी. हो चुकी है। उसके लीवर का आकार सामान्य हो गया है। किडनी का स्टोन निकल चुका है। ये सारा चमत्कार बुडबिग प्रोटोकोल का है। अलसी का तेल अपना असर दिखा चुका है। संलग्न रिपोर्ट्स और तस्वीरें सारी कहानी बयां कर रही है। उसकी दोनों तस्वीरों में रात दिन का फर्क है। आज हमारा आत्म विश्वास शिखर को छू रहा है। शांति की आरोग्य यात्रा की खबरें जर्मनी तक पहुँची हैं। सभी दोस्त हमें बधाई दे रहे हैं। फेसबुक पर लाइक्स और कमेंट्स का अंबार लगा है। जर्मनी से विज्वलाइजेशन गुरू क्लॉस पर्टल ने भी बधाई का मेल भेजा है। ये हमारे लिए फक्र की बात है।
हम ऐसा समझते थे कि बुडविग उपचार लेने वाले मरीज को कुछ तो पढ़ा लिखा और समझदार होना जरूरी है। लेकिन शांति ने हमारी इस भ्रांति का हमेशा के लिए चकनाचूर करके रख दिया तोड़ कर रख दिया। जुग जुग जियो शांति...
Sincerely
Dr. O.P.Verma
M.B.B.S., M.R.S.H. (London)
7-B-43, Mahaveer Nagar III, Kota Raj.
http://flaxindia.blogspot.in
Email-
dropvermaji@gmail.com
+919460816360


    

21.3.15

बिहार की पूरी तस्वीर क्या है नीतीश जी?

मित्रों,बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार गजब के वाकपटु हैं और शोमैन भी। पूरे बिहार में इस समय मैट्रिक की परीक्षा में इस कदर जमकर कदाचार हो रहा है कि इसे परीक्षा कहना इस शब्द का ही अपमान होगा। बल्कि यह तो स्वेच्छा है और इसमें कदाचारियों की मदद कर रहे हैं पुलिस,शिक्षक आदि अर्थात् पूरे सरकारी तंत्र ने परीक्षा को कमाई का साधन बना लिया है। वैसे तो यह हर साल का भ्रष्टोत्सव है लेकिन इस बार मीडिया ज्यादा जागरूक है वरना कदाचार के खिलाफ तो हमने अपने अखबार में पिछले साल भी मैट्रिक और इंटर की परीक्षा में जमकर लिखा था।
मित्रों,नीतीश जी अपने महान असत्यवादी़-पाखंडवादी श्रीमुख से फरमाते हैं कि इस परीक्षा के दौरान मीडिया बिहार की अधूरी तस्वीर पेश कर रही है तो क्या नीतीशजी बताएंगे कि फिर बिहार की पूरी तस्वीर क्या है? मीडिया द्वारा जहाँ पूरे राज्य के लगभग प्रत्येक जिले और प्रत्येक केंद्र पर कदाचार की खबरें दी गई थीं वहीं उनको पूरे बिहार में सिर्फ चार केंद्रों पर ही कदाचार नजर आया। रद्द तो पूरी परीक्षा होना चाहिए थी लेकिन उनको तो सिर्फ वही दिखता है जो वह देखना चाहते हैं। जाने भी दीजिए वे बेचारे तो सावन के अंधे हैं इसलिए उनको सिर्फ हरियाली ही नजर आती है। हम बताते हैं बिहार की पूरी तस्वीर क्योंकि नीतीश बाबू के कुशासन से रोजाना पाला तो हमारा पड़ता है। नीतीश बाबू का क्या उनको तो सिर्फ पैसा चाहिए फिर वो किसी भी तरह से आए।
मित्रों,बिहार की मुकम्मल तस्वीर तो यह है कि पूरे बिहार में कहीं भी सरकार नाम की चीज ही नहीं है। आप कहेंगे कैसे? तो हम एक उदाहरण द्वारा आपको बताते हैं। अभी कुछ दिन पहले हमने यह खबर लगाई थी कि बिहार की पुलिस कानून के अनुसार नहीं बल्कि अपनी मनमर्जी के अनुसार काम करती है। खैर तब हमने बताया था कि हाजीपुर के सदर थाना में जब हम ठगी की एफआईआर करने गए तब क्या हुआ। अब आगे सुनिये कि उसके बाद क्या हुआ। उसके बाद थाना ने एफआईआर दर्ज करने में 5 दिन लगा दिया। हमने थानेदार को कई-कई बार फोन किया,एसपी को फोन किया लेकिन किसी ने कुछ नहीं किया। सवाल उठता है कि सरकार ने इनको सरकारी फोन क्यों दिया है जबकि इनको बिना पैसे लिए कोई काम करना ही नहीं है।
मित्रों,हद तो हो गई कल जब पीड़ित सुरेश बाबू एफआईआर लेने थाना पहुँचे तो थाने के मुंशी ने उनसे एफआईआर की कॉपी देने के लिए 500 रु. के रिश्वत की मांग कर दी। मैंने उनसे कहा मुंशी से बात करवाईए तो मुंशी फोन पर नहीं आया और गालियाँ बकने लगा। फिर मैंने थानेदार को फोन लगाया तो उसने कहा कि वो थाने पर नहीं है लॉ एंड ऑर्डर संभाल रहा है। सुनकर हँसी आई कि जब बिहार में लॉ को संभालनेवाले खुद ही ऑर्डर में नहीं हैं तो वे लॉ एंड ऑर्डर क्या संभालेंगे। फिर हमने एसपी वैशाली को फोन किया तो उन्होंने कहा कि आप लिखित निवेदन दे दीजिए हम जाँच करवा लेंगे और फोन काट दिया। अब आप ही बताईए कि जब एफआईआर की कॉपी लेनी है तो इसमें जाँच क्या होगी और जाँच से निकलकर क्या आएगा? क्या एसपी दूध के धुले हैं जो दूध का दूध और पानी का पानी कर देंगे।
मित्रों,हमने तिरहुत रेंज के आईजी को फोन किया तो पहले तो मैसेज आया कि हम अभी मीटिंग में है और बाद में फोन करने पर कहा गया कि रांग नंबर है और फोन काट दिया गया। फिर हम और ऊपर चढ़े और डीजीपी को फोन किया। फोन डीजीपी ने नहीं उनके रीडर ने उठाया और कहा कि शाम में फोन करिए और वो भी लैंड लाईन पर। इसके बाद और ऊपर चढ़ने की हमारी हिम्मत ही नहीं रही क्योंकि हम समझ चुके थे कि जिस राज्य में तबादले ने उद्योग का रूप ले रखा हो वहाँ और ऊपर जाने से कोई फायदा नहीं है। फिर माननीय मुख्यमंत्री को तो सबकुछ ठीकठाक नजर आ ही रहा है। ऊपर से उन्होंने मीडिया को अपना मोबाईल नंबर भी नहीं दिया है तो उनका लैंडलाईन फोन तो अधिकारी उठाएंगे। पहले यह पूछकर तोलेंगे कि कितना बड़ा आदमी बोल रहा है तब मुख्यमंत्री को फोन देंगे और हम तो ठहरे छोटे पत्रकार तो हमारी तो उनसे किसी भी कीमत पर बात ही नहीं होने दी जाएगी या फिर नीतीश जी हमने बात करेंगे ही नहीं।
मित्रों,तो यह है हमारे बिहार की मुकम्मल तस्वीर। एफआईआर के आवेदन के समय मुंशी ने खुद ही हमसे कहा था कि प्रार्थी का फोन नंबर भी डाल दीजिएगा। तो फिर कायदे से उनको एफआईआर हो जाने के बाद खुद ही फोन करके प्रार्थी को बुलाना चाहिए था और एफआईआर की कॉपी दे देनी चाहिए थी। लेकिन उनको कानून-कायदे से क्या मतलब? उनको तो बस पैसे से मतलब है। कदाचित घूस लेना ही उनकी ड्यूटी है।
मित्रों,आज जब हमने अभी सदर थाने के थानेदार को फोन लगाया तो उसने मेरा नाम सुनते ही फोन काट दिया। अब आप ही बताईए कि अंग्रेजों की पुलिस और सुशासन की पुलिस में क्या अंतर है? तब भी दरोगा (दारोगा) को रोकर या गाकर घूस देनी ही पड़ती थी और आज भी देनी ही पड़ती है। तब तो बड़े अफसर तुरंत कदम उठाते थे। आज कोई कदम नहीं उठाते।
मित्रों,अंत में मैं क्षमा चाहूँगा कि मैं आपको बिहार के वर्तमान शासन-प्रशासन की सिर्फ एक बानगी ही दिखा पाया क्योंकि पूरी कथा लिखूंगा तो परती परिकथा से भी मोटी किताब लिख जाएगी। बाँकी सुशासन की कुछ पोल तो पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी भी खोल ही रहे हैं कि कैसे बिहार में लागत से कई गुना ज्यादा का एस्टीमेट बनता है और कैसे उसका कुछ हिस्सा मुख्यमंत्री को भी दिया जाता है। संक्षेप में बस यही समझ लीजिए कि नीतीश बाबू के शासन और दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक (1351-1388) के शासन में कोई अंतर नहीं है। हुआ यूँ था कि फिरोजशाह तुगलक के पास एक सैनिक गया यह शिकायत लेकर कि उससे वेतन के ऐवज में रिश्वत मांगी जा रही है तो फिरोजशाह तुगलक ने उसको अपने पास से पैसे देकर कहा कि तो दे दो क्योंकि मैं भी देता हूँ। यहाँ तो नीतीश जी से 500 रु. भी देने से रहे क्योंकि नेता लोग तो सिर्फ लेना जानते हैं। मैं सुशासन बाबू को खुली चुनौती देता हूँ कि अगर वे सचमुच इस राज्य के शासन-प्रशासन के मुखिया हैं तो मेरे संबंधी सुरेश बाबू जो विकलांग भी हैं को बिना पैसे दिए एफआईआर की कॉपी दिलवा दें। थाने से उनको फोन करवाएँ और बुलाकर बाईज्जत उनको एफआईआर की कॉपी दिलवाएँ। अन्यथा खुलेआम कह दें कि यह काम मेरे बस का नहीं है क्योंकि यह मेरा काम नहीं है बल्कि यह एक सामाजिक समस्या है ठीक उसी तरह जैसे परसों उनके शिक्षा मंत्री ने नकल को लेकर कहा था।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

16.3.15

इकलौते वारिस से लावारिस तक

मित्रों,जब मैंने होश संभाला तो खुद को बड़ी दीदी सुनीता जो अब बक्सर के छतनवार गांव के जनार्दन सिंह की पत्नी और बंटी और छोटू की माँ है की गोद में पाया। वह मारती भी थी तो दुलारती भी थी। फिर मेरी नानी धन्ना कुंवर की तो जैसे जान ही मुझमें बसती थी। मेरे मामा नहीं थे और चचेरे मामा मेरी नानी को काफी मारते-पीटते थे इसलिए मेरा पूरा परिवार मेरे जन्म के पाँच साल पहले से ही मेरे ननिहाल जो महनार रोड रेलवे स्टेशन के नजदीक जगन्नाथपुर गांव में था में रहता था। खुद मेरा जन्म भी ननिहाल में ही हुआ। मैं पूरे गांव का लाडला था और बला का शरारती। मैंने बचपन में सांड की सवारी भी गांठी है तो आम-अमरूद चुराकर भी खाया है। कई बार तो पेड़ के मालिक की आँखों के आगे भी। मुझे याद है कि 1991 में जब मेरी तबियत काफी खराब हो गई थी तो लगभग पूरा जगन्नाथपुर और छिटपुट रूप से चमरहरा तक के सैंकड़ों लोग कई दिनों तक पीएमसीएच से हिले तक नहीं थे। जगन्नाथपुर के प्रत्येक परिवार ने मेरी जान के ऐवज में काली माता को बकरा चढ़ाने की मन्नत मान दी थी। यद्यपि पूरी तरह से शाकाहारी होने के कारण मैंने आज तक एक भी बकरे की बलि नहीं दी है।
मित्रों,अपने पूरे स्कूली जीवन में मैंने कभी बाहर का चाट-पकौड़ा नहीं खाया। जब भी बड़ी दीदी पैसे देती मैं शाम में उनको ही लौटाकर दे देता। जब मैं मैट्रिक में था तभी मैंने साइकिल चलाना सीखा। फिर तो घर का सारा काम मेरे ही जिम्मे आ गया। मुझे याद है कि चाहे 1989 में हुआ मेरी बड़ी दीदी का दुरागमन हो या फिर नानी का श्राद्ध मैंने दो-दो हफ्तों तक एक पांव पर खड़े रहकर सारा भार उठाया। इसी बीच सन 93 में मैंने पॉलिटेक्निक की प्रतियोगिता परीक्षा पास की और मेरा नामांकन दरभंगा पॉलिटेक्निक में सिविल इंजीनियरिंग में हुआ। इसी बीच पूर्णिया पॉलिटेक्निक में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में सीट खाली हुई। उस समय बिहार में सिविल इंजीनियरों को नौकरी नहीं मिलती थी इसलिए पिताजी ने मेरा स्थानान्तरण पूर्णिया पॉलिटेक्निक में करवा दिया। तब तक मेरी छोटी दीदी की उम्र काफी हो चुकी थी। उस समय उनकी उम्र की कोई भी लड़की मेरे गांव या ननिहाल में क्वांरी नहीं थी। तब तक नानी का देहांत हो चुका था और हमलोग महनार बाजार में किराये के मकान में रहने लगे थे। हमलोग की आर्थिक स्थिति पिताजी विष्णुपद सिंह जी के राम प्रसाद सिंह महाविद्यालय,चकेयाज में रीडर होने के बावजूद इतनी खराब थी कि उनको हर महीने खर्चा चलाने के लिए कभी कॉलेज में अपने जूनियरों से कभी लाईब्रेरियन चाचा से कर्ज लेना पड़ता था और उनके घर जाकर पैसे लाने की शर्मिंदगी भी मुझे ही उठानी पड़ती। इसी बीच मेरे ननिहाल में मेरी हमउम्र एक लड़की की शादी के दौरान मेरे चचेरे मामा सत्येन्द्र सिंह द्वारा एक ऐसी टिप्पणी कर दी गई जो मेरे दिल-दिमाग को चीर गई। उन्होंने कहा कि बहन तुम ही अपने घर बिठा लोगे क्या,शादी क्यों नहीं करते? गुस्सा तो बहुत आया लेकिन खून के घूंट पीकर रह गया।
मित्रों,तब मेरे छोटे नाना के बेटों ने नानी के खेतों पर जबरन कब्जा कर लिया था और खेत की फसल भी नहीं देते थे। नानी मरने से पहले जमीन माँ के नाम पर कर गई थी। जमीन में से कुछ जगन्नाथपुर में था तो कुछ कटिहार में। मेरे नाना रामगुलाम सिंह जिनकी मौत मेरे जन्म से पहले ही हो चुकी थी अपने गांव के सबसे दबंग और समृद्ध किसान थे। मैं भीतर-ही-भीतर गुस्से से जल रहा था। फिर मैंने कटिहार वाली जमीन पर आना-जाना शुरू किया। न खाने का ठौर रहता और न रहने का। कभी भी खा लेता,कहीं भी सो लेता। फुलवड़िया जहां कि नानी का कामत था के ही एक दुसाध लड़के से मेरी दाँतकटी दोस्ती हो गई। मेरा मित्र राजकुमार मुझे अपने सगों से भी ज्यादा मानता था। उसकी,उसके मामा,बंदा,विष्णु और लालबाबू,जगन्नाथपुर के ही कमतिया सीतेश मामा,उपेंद्र मामा और रामजी मामा की सहायता से दो साल के अथक परिश्रम के बाद मैंने जमीन पर कब्जा कर लिया। इस दौरान मुझे गांव की गंदी राजनीति में भी उतरना पड़ा।
मित्रों,तब तक पिताजी गुड्डी दीदी जो मुझसे पाँच साल बड़ी थी के लिए वर की तलाश करने में जुट गए थे। उधर जगन्नाथपुर की जमीन पर माँ द्वारा दायर टाईटल सूट खुल गया था और जमकर पैसे खा रहा था। कई बार के प्रयास के बाद मैंने तीन बीघा जमीन के लिए ग्राहक को खोजा और माँ को रजिस्ट्री के लिए बुलाया। इस तरह किसी तरह से दीदी की शादी हो गई। दीदी की पुछरिया में मिठाई भेजने के लिए हमलोगों के पास पैसे नहीं थे उस पर हमलोगों पर लाखों का कर्ज हो गया था। मैं वर पक्ष द्वारा शादी में लाए गए मिठाई के टोकरों को ही पुछरिया में लेकर गया था। इस बीच मैं यह भी भूल गया कि मैं पॉलिटेक्निक में भी पढ़ता हूँ। उस पर पप्पू यादव के समर्थक छात्रों के साथ जिनका पॉलिटेक्निक पर कब्जा था हमारा टंटा हो गया। शादी के बाद हमारी आर्थिक स्थिति इतनी खराब थी कि मुझे पढ़ाई छोड़कर घर बैठना पड़ा और मैं इंजीनियर बनते-बनते रह गया। संतोष इस बात का था कि दीदी की शादी एक सरकारी अफसर के साथ हुई थी। जीजाजी राकेश कुमार जी इस समय भारत सरकार के MSOPI मंत्रालय में क्लान वन अधिकारी हैं और दिल्ली के सरोजनीनगर में रहते हैं।
मित्रों,फिर मैंने घर पर रहकर ही इतिहास विषय लेकर स्नातक किया और आईएएस की तैयारी के लिए दिल्ली चला गया। मगर ईश्वर की मर्जी के आगे किसकी चलती है। वर्ष 2003 में आईएएस की मुख्य परीक्षा देते समय ही मुझे डेंगू हो गया और मैं आईएएस बनते-बनते रह गया। फिर मैंने माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय के नोएडा कैंपस से एमजे किया। इस दौरान अपने सहपाठी मित्रों के प्यार की बदौलत अपनी कक्षा का प्रतिनिधि भी रहा और इस दौरान विश्वविद्यालय की हालत में कई सुधार भी करवाये। धीरे-धीरे मेरी ताकत इतनी ज्यादा हो गई थी कि विभागाध्यक्ष अरूण भगत कहते कि मैंने नहीं सोंचा था कि आप इतने शक्तिशाली हो जाएंगे कि कैंपस को आपके इशारों पर चलना और चलाना पड़ेगा। मैं और मेरे मित्र ही तब यह फैसला करते कि किसको किस अखबार या चैनल में नौकरी करने के लिए भेजा जाएगा।
मित्रों,इसी दौरान मैं दैनिक जागरण,नोएडा में इंटर्न करने लगा और इस बात की पूरी संभावना थी कि वहीं मेरी नौकरी भी लग जाती। तब तक मेरी छोटी बहन जो मुझसे ढाई साल छोटी थी की उम्र 30 को पार करने लगी थी और मेरे माँ-पिताजी उसकी शादी को लेकर काफी चिंतित थे। इसी बीच एक दिन मेरी माँ ने मुझे फोन कर कहा कि बहन की शादी नहीं करोगे क्या? पिताजी से तो अब दौड़-धूप होती नहीं। मेरे पिताजी वर्ष 2003 में ही कॉलेज की नौकरी से सेवानिवृत हो चुके थे। माँ का फोन जाते ही मैं अपार संभावनाओं के शहर दिल्ली को छोड़कर हाजीपुर आ गया और नाम के लिए पटना,हिंदुस्तान में तीन हजार की नौकरी कर ली। फिर कई स्थानों पर वरतुहारी की मगर अंत में शादी पक्की हुई बिहार के ही मधेपुरा निवासी और उस समय आईबीएन7 में प्रोड्यूशर की नौकरी कर रहे नीरज कुमार सिंह से। उस समय नीरज को 18 हजार रुपये वेतन के रूप में मिलते थे। उसने गाजियाबाद के इंदिरापुरम में एक फ्लैट भी खरीद रखा था। वरतुहारी के सिलसिले कई बार तो मुझे लगातार दो-दो रातों तक जगकर सफर करना पड़ा।
मित्रों,शादी में हमने दिल खोलकर खर्च किया फिर भी शादी के तत्काल बाद से ही मेरी छोटी बहन हमसे पैसे मांगने लगी। नीरज ने न जाने क्यों चुल्हा,टीवी वगैरह को गांव भेज दिया। हमने मोह में आकर पैसे दे दिए। मगर जब यह सिलसिला बन गया और हर महीने की बात हो गई तब मैंने विरोध करना शुरू कर दिया क्योंकि हम खुद ही पिछले 20 सालों से बेघर थे। फिर मेरी शादी हुई और शादी के दौरान किसी ने मेरी ससुराल में नीरज के साथ अभद्र मजाक कर दिया। जब मैं अपनी पत्नी को विदा करवा कर अपने घर पहुँचा तो देखा कि मेरी छोटी बहन रूबी मशीन गन की गोलियों की तरह अपनी भाभी को गालियाँ दिए जा रही थी और मेरी माँ उसे रोक भी नहीं रही थी। जब सारे संबंधी अपने-अपने घर चले गए तब मेरी माँ का रवैया भी धीरे-धीरे बदलने लगा। मेरी बहनों और भांजे-भांजियों के बहकावे का असर यह हुआ कि मेरी माँ अपनी बहू को देखना ही नहीं चाहती थी।
मित्रों,इसी बीच मेरी पत्नी सात महीने का गर्भ लेकर अपने मायके चली गई जहाँ कि 23 मार्च,2012 को मेरे बेटे ने जन्म लिया। चूँकि 23 मार्च भगत सिंह का शहीद दिवस था इसलिए हमने उसका नाम भगत सिंह ही रख दिया। बाद में जब-जब मैं मेरी पत्नी को अपने पास लाता मेरी माँ और मेरी भांजी ब्यूटी जिसकी शादी गमहर के सुनील से हुई है और जिसको मैंने बचपन में अपार स्नेह दिया था उसको इतना तंग करती कि मैं उकता कर उसको मायके रख आता। इस बार जब 6 दिसंबर,2014 को वो मेरे पास रहने आई तो माँ ने मेरे घर को रणक्षेत्र में बदल कर रख दिया। वो हमलोगों पर 1 रुपया भी खर्च करना नहीं चाहती थी और सबकुछ अपनी बेटियों और उनके बाल-बच्चों को दे देना चाहती थी। जब उसने देखा कि मेरी पत्नी इस बार मायके नहीं जा रही तो उसने अलग डेरा ले लिया और हमें अपने हाल पर छोड़कर पिताजी के साथ चली गई। मेरी बड़ी दीदी की प्रतिक्रिया थी कि सबकुछ उसका है वो चाहे तो लुटा-पुटा दे,मेरी मंझली बहन ने मेरी पत्नी से कहा कि तुमको उसके सारे सितम को हँसकर सह लेने चाहिए थे जबकि उसने खुद अपनी उस सास की कभी सेवा नहीं की जो दरअसल उसके पति की चाची थी और अपने तीन-तीन बेरोजगार दामादों को दरकिनार करके उसके पति को अपने पति की मौत के बाद अनुकंपा की नौकरी दे दी थी और छोटी बहन रूबी या छोटे बहनोई नीरज इस समय आज तक में 61 हजार रुपये का वेतन प्राप्त कर रहा है का तो कहना ही क्या उनका तो वश चले तो मेरे माता-पिता से सारी जमीन-जायदाद भी लिखवा लें।
मित्रों,आज मेरे पास मेरे बच्चे को पढ़ाने तो क्या खिलाने तक के पैसे नहीं हैं। मैं पूरी तरह से बर्बाद होकर जब जिंदगी के पिछले पन्नों पर नजर डालता हूँ तो सोंचता कि मुझसे गलती कहाँ हुई? क्या अपने परिवार के मान और सुख के लिए दो-दो बार त्याग करके मैंने गलती की? क्या मेरा भगवान शिव वाला जीवन-दर्शन गलत था कि स्वयं विष पीकर जगत को अमरत्त्व दो? क्या मैंने पिछले चार सालों से अपने माता-पिता को अपने हाथों खाना बनाकर,खिलाकर और 24 घंटे सेवा करके गलती की? पता नहीं मुझसे कहाँ गलती हुई जिसकी सजा मुझको मिली? कभी माखनलाल के नोएडा परिसर में पढ़ाई के दौरान वहाँ के क्लर्क देवदत्त शर्मा ने मुझे कहा था कि आप बड़े सीधे हैं कदम-कदम पर छले जाएंगे मगर क्या किसी इकलौते बेटे के साथ कोई माँ-बाप छल करता है क्या? क्या कोई अपने कथित इकलौते वारिस को लावारिस बनाकर भाग जाता है क्या? जबतक तंगी थी तब तक तो साथ रखा और अब जब 50 हजार का पेंशन मिलने लगा तब छोड़ दिया? माँ,मम्मी और मम्मी जी कहनेवाले दामाद क्या मिल गए माई कहनेवाले और शिव-पार्वती भाव से सेवा करनेवाले को लात मार दिया? यह सही है कि मेरे अंदर अब भी इतना जीवट है कि मैं अपनी जिंदगी को फिर से सजा-संवार लूंगा लेकिन सबकी खुशी में अपनी खुशी समझते-समझते संघर्ष के सबसे जरुरतमंद क्षणों में खुद ही तन्हा रह जाने का दंश तो अब जीवनभर मेरे मन को डँसता रहेगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

13.3.15

कानून नहीं थानेदारों की मर्जी से चलते हैं बिहार के थाने

हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार की महान पुलिस की महानता का वर्णन कदाचित शेष भी अपने हजारों मुखों से भी नहीं कर सकते। शायद बिहार पुलिस की इसी महानता का माहात्म्य है कि कोई भी व्यक्ति किसी आपराधिक घटना के बाद पुलिस के पास जाने की हिम्मत ही नहीं करता है। फिर जब बात वैशाली पुलिस की हो तब तो कहना ही क्या! इनकी कर्महीनता को कह सकना तो कदाचित नहीं बल्कि निश्चित रूप से हजारों शेष भगवानों के वश में भी नहीं है।
मित्रों,हुआ यूँ कि मेरे दोस्त रंजन के ससुर जी सुरेश प्रसाद सिंह,वल्द श्री रामदेव सिंह,सा. गुरमिया,पो. थाथन बुजुर्ग,थाना सदर हाजीपुर ने 10 मार्च,2015 को दोपहर के 1 बजकर 12 मिनट पर सदर थाना हाजीपुर स्थित एक्सिस बैंक के एटीएम से महज 1000 रु. निकाले। चूँकि उनको पैसा निकालना नहीं आता था इसलिए एक अनजान युवक द्वारा मदद की पेशकश करने पर वे मदद लेने से मना नहीं कर सके। पैसा निकालने के दौरान युवक ने लिंक फेल हो जाने का बहाना किया। फिर अपना एटीएम डालकर पैसा निकालने का नाटक किया और पैसे निकाल कर चला गया। थोड़ी देर बाद जब श्री सिंह ने 1000 रु. निकाला तो उनके तो होश ही उड़ गए क्योंकि जमा राशि में से 16000 रु. निकल चुके थे।
मित्रों,कल होते ही श्री सिंह जो लगभग 60 साल के हैं स्टेट बैंक जहाँ उनका उक्त खाता था पहुँचे और पासबुक अपडेट करवाया तब पता चला कि उनको चकमा देकर उस नितांत परोपकारी युवक ने चार बार में 16000 रु. निकाल लिए थे। बेचारे ने अपने दामाद को फोन किया और दामाद ने हमको। हमने कहा कि कल यानि दिनांक 12 मार्च को भेज देना। फिर उनको लेकर सदर थाने में पहुँचा जहाँ मेरा काफी ठंडा स्वागत करते हुए एक आवेदन लिखने को कहा गया। फिर आवेदन में कई गलतियाँ निकाली गईं। फिर से आवेदन लिखकर कमियों को दूर कर देने के बाद थाने के महान मुंशी ने मुझसे फिर से आवेदन लिखवाया और उसके बाद एक बार फिर से। उसके बाद कहा गया कि इंस्पेक्टर साहब से अनुमति ले लीजिए।
मित्रों,पता नहीं कि कानून इस बारे में क्या कहता है? क्या एफआईआर दर्ज करने के लिए इंस्पेक्टर की ईजाजत जरूरी होती है या नहीं? फिर भी मैं इंस्पेक्टर साहब के पास पहुँचा और अपना परिचय देते हुए वाकये से उनको अवगत करवाया। इंस्पेक्टर साहब ने मुंशी को बुलाया और एफआईआर दर्ज कर लेने का आदेश दिया। उसके बाद जब मैं मुंशीजी के पास बैठा हुआ था तभी एक पुलिस अधिकारी ने मुझे एफआईआर दर्ज नहीं करवाने की अनमोल सलाह दी क्योंकि उनके मतानुसार पैसा ऊपर होगा ही नहीं। तब मैंने उनसे कहा कि आपलोग एफआईआर दर्ज करने से मना कैसे कर सकते हैं जबकि पीड़ित ऐसा करना चाहता है। फिर मैं मुंशी जी को कल आने की बात कहकर अपने अखबार के दफ्तर में आ गया। आज जब थाने में गया तो बताया गया कि बड़ाबाबू छापा मारने में इतना व्यस्त हैं कि उनसे मामले के बारे में बात ही नहीं हो पाई और इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं हो पाया है।
मित्रों,तो यह है सुशासन बाबू के सुशासन में हाजीपुर की पुलिस का रवैया। अब पता नहीं कब तक एफआईआर दर्ज किया जाएगा या फिर दर्ज किया जाएगा भी कि नहीं। अब आप ही बताईए कि जब एक पत्रकार के साथ पुलिस का व्यवहार ऐसा है तो वो आम आदमी के साथ कैसा व्यवहार करती होगी?
मित्रों,सुशासन बाबू से तो कुछ कहना ही बेकार है क्योंकि पिछले दस सालों में हमारे और उनके बीच काफी कहासुनी हो चुकी है लेकिन थानों और पुलिस के हालात में रंचमात्र भी कोई बदलाव नहीं आया है अलबत्ता रिश्वत की दरों में भारी ईजाफा जरूर हो चुका है। इसलिए इस बार मैं सीधे-सीधे भारत के यशस्वी और तेजस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से निवेदन करुंगा कि हुजूर कुछ करिए और कुछ ऐसा करिए और जल्दी में करिए कि अगले छह महीने-साल भर में पूरे भारत की जनता को एफआईआर दर्ज करवाने के लिए थानों में जाना ही न पड़े यानि वो घर बैठे ऑनलाईन एफआईआर दर्ज करवा सके। तभी जाकर अपने आपको सरकारी दामाद समझनेवाले पुलिसवालों पर लोकसेवक शब्द फबेगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

12.3.15

हद कर दी 'आप' ने

मित्रों,पिछले एक महीने का समय दिल्ली वालों के लिए एक के बाद एक हद से गुजरने का रहा है। पहले तो उन्होंने सारी हदों को पार करते हुए एक ऐसी पार्टी को विधानसभा की लगभग सारी-की-सारी सीटें दे दीं जिसका काम काम करना नहीं बल्कि रायता फैलाना भर है। फिर उसके बाद से हद करने की बारी रही है उस पार्टी की जिसके दिल्ली में जीतने के बाद मीडिया के छद्मधर्मनिरपेक्ष हिस्से के कदम जमीन पर पड़ ही नहीं रहे थे। कोई इसे मोदी के लिए झटका बता रहा था तो कोई मोदी के अंत की शुरूआत।
मित्रों,मगर यह क्या हुआ कि आज जीत के एक महीने के भीतर ही वह पार्टी पार्टी नहीं फाइटिंग क्लब बन गई है। लगातार उसके कर्णधार एक-दूसरे पर आरोपों की बरसात किए जा रहे हैं। सिनेमा हॉल वाले परेशान हैं कि शो खाली क्यों जा रहे हैं। जाए भी क्यों नहीं जब मुफ्त में जबर्दस्त कॉमेडी,सस्पेन्स,थ्रिलर,रिवेन्ज,एक्शन टेलीवीजन और अन्य समाचार माध्यमों पर चौबीसों घंटे उपलब्ध है तो कोई क्यों जाए सिनेमा देखकर व्यर्थ में पैसा बर्बाद करने? मेरी सिनेमा हॉलवालों को मुफ्त में सलाह है कि वे केंद्र सरकार से मांग करें कि आप पार्टी पर मनोरंजन कर लगाया जाए। अगर उनकी मांगें नहीं मानी गई तो निकट-भविष्य में हो सकता है कि बॉलीवुड का नामोनिशान ही नहीं रहे।
मित्रों,आज अगर आप पार्टी की स्थिति को देखते हुए कोई अपनी मूर्खता पर रो रहा होगा तो वो होगी दिल्ली की जनता। उनसे किए गए 70 वादों पर तो अब आप पार्टी के लोग बात भी नहीं कर रहे,वादों को पूरा क्या खाक करेंगे। हाँ एक बात को लेकर दिल्ली की जनता जरूर संतोष कर सकती है कि सरकार बनाने के तुरंत बाद से ही आप पार्टी के नेतागण उनका भरपुर मनोरंजन कर रहे हैं। जहाँ तक मोदी जी के पूर्णकालिक व स्थायी विरोधी मीडिया का सवाल है तो वे लोग इस समय खेती-किसानी,फिल्मों और क्रिकेट से संबंधित कार्यक्रमों का चौबीसों घंटे प्रसारण कर सकते हैं,समाचार तो दिखा नहीं सकते क्योंकि फिर तो उनको अपने महानायक के दोगलेपन को भी दिखाना होगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

10.3.15

नापाक पाकिस्तान को हौंसला देंगे ऐसे इरादे!

-नितिन शर्मा 'सबरंगी'
जम्मू कश्मीर में सरकार बनते ही अलगाववादियों/कट्टरपंथियों/आतंकियों को अच्छी खबर मिली। सरकार का उनके प्रति नरम रूख भले ही देश को झटका दे गया हो, लेकिन विरोधी नापाक मुल्क के लिए खुशी जैसा है। सरकार ने अलगाववादी मसरत को रिहा करके अपने इरादे भी साफ कर दिए। भला कौन सी ऐसी रहमदिली है कि जिस शख्स पर गंभीर आरोप हों, बेगुनाहों की मौत के दाग जिसके दामन पर लगे हों और वह 5 लाख का इनामी रहा हो उसे रिहा कर दिया जाये। 
दरअसल जिस मसरत को रिहा किया गया है वह अलगाववादी हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी का करीबी माना जाता है। मसरत 2008-10 में राष्ट्रवि
रोधी प्रदर्शनों का मास्टरमाइंड रहा है। उस दौरान पत्थरबाजी की घटनाओं में 112 लोग मारे गए थे। मसरत के खिलाफ देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने समेत दर्जनों मामले दर्ज थे। उसे चार महीनों की तलाश के बाद अक्टूबर 2010 में पकड़ा गया था। मसरत पर संवेदनशील इलाकों में भड़काऊ भाषण के आरोप भी लग चुके हैं। मसरत आलम को अक्टूबर 2010 में श्रीनगर के गुलाब बाग इलाके से 4 महीने की मशक्कत के बाद गिरफ्तार किया गया था। गिलानी के करीबी माने जाने वाले मसरत आलम पर दस लाख रुपये का इनाम भी था। मसरत 2010 से पब्लिक सेफ्टी एक्ट यानी पीएसए के तहत जेल में बंद था। उसे बारामूला जेल में रखा गया था
इस रिहाई का न सिर्फ पूरे देश में विरोध हुआ बल्कि सहायोगी पार्टी भाजपा भी घिर गई। ऐसे कदम की उम्मीद किसी को नहीं थी। इतना ही नहीं आतंकियों के लिये कार्ययोजना बनाने पर भी विचोर किया जाने लगा। यह तब ओर भी गंभीर है जब पूरा मुल्क आतंकी घटनाओं से गुजर रहा हो ओर आतंक को रोकने के लिये नई-नई योजनाएं भी बनायी जा रही हों। मुफ्ती मोहम्मद सईद सरकार के प्रति भाजपा भी सख्त रूख दिखा रही है। सबसे बड़ा सवाल यह कि सरकार ऐसा करके संदेश क्या देना चाहती है। जाहिर है कि मुल्क के प्रति वफा रखने वालों को तो इससे खुशी मिलेगी नहीं ओर मुल्क के प्रति घिनौनी सोच व नफरत रखने वाले खुश होंगे। शर्मनाक ही है कि जिनके दामन पर बेगुनाहों की मौत के दाग हैं उन्हेें आजाद किया जा रहा है। कोई दोराय नहीं कि ऐसे लोग सजा के ही हकदार होते हैं। ऐसे इरादे नापाक पाकिस्तान को भी हौंसला देंगे। जो भारत को हिंसा की आग में झोंकने का मंसूबा हमेशा पाले रहता है। आतंक की नई खेप तैयार करता है।


8.3.15

सावधान,नरेंद्र मोदी जी,कश्मीर कहीं आपको बर्बाद न कर दे?

मित्रों,इतिहास गवाह है कि भारत के महानतक शासकों में से एक अकबर ने दीने ईलाही धर्म चलाया था। ब्रिटिश इतिहासकार लेनपुल ने इसे अकबर की मूर्खता का स्मारक बताया है। वजह यह थी कि इस धर्म के चलते अकबर ने एक साथ हिन्दुओं और मुसलमानों दोनों का समर्थन खो दिया। मुसलमानों ने उसे मुसलमान मानना बंद कर दिया और हिंदुओं में यह भय व्याप्त हो गया कि अकबर इसके बहाने उनका धर्म छीनना चाहता है।
मित्रों, कुछ इसी तरह की मूर्खता इन दिनों भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी राजनैतिक पार्टी भाजपा कर रही है। भाजपा और मोदी ने कश्मीर में अलगाववादियों की समर्थक और भारत और भारतीय सेना की सबसे बड़ी दुश्मन पीडीपी के साथ सरकार बनाई है। इस सरकार ने अस्तित्व में आते ही सबसे पहला कदम यह उठाया है कि उसने भारतीय सेना पर पत्थरबाजी करने में सबसे आगे रहनेवाले मशरफ आलम को जेल से रिहा कर दिया है। इससे पहले शपथ-ग्रहण के समय ही मुफ्ती मोहम्मद सईद ने कश्मीर में शांति का मुख्य श्रेय़ पाकिस्तान और अलगाववादियों को दिया था।
मित्रों,भाजपा अभी भी कह रही है कि कश्मीर में सरकार न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत चलाई जाएगी तो क्या यही है कश्मीर में भाजपा-पीडीपी की संयुक्त सरकार का न्यूनतम साझा कार्यक्रम?? अगर ऐसा है तो फिर भाजपा को कोई अधिकार नहीं है श्यामा प्रसाद मुखर्जी को अपना कहने का या फिर उनका नाम भी लेने का? अगर यही भाजपा का राष्ट्रवाद है तो फिर निश्चित रूप से यह भारत की उस बहुसंख्यक जनता के साथ धोखा है जिसने पिछले साल के लोकसभा चुनावों में उसे मत दिया था।
मित्रों,नरेंद्र मोदी और भाजपा को हरगिज यह नहीं भूलना चाहिए कि अगर हिन्दुओं का उसके प्रति मोहभंग हो गया तो उनकी हैसियत दो कौड़ी की भी नहीं रह जाएगी। रही बात मुसलमानों की तो मैं यह स्टांप पेपर पर लिखकर देने को तैयार हूँ कि उनका मत भाजपा को कभी नहीं मिलेगा। नरेंद्र मोदीजी और अमित शाह जी यह अकबर का जमाना नहीं है कि बिना जनता के विश्वास के भी कोई 50 सालों तक भारत पर शासन करेगा। आज के हिंदुस्तान में 5 साल के शासन को 10 में बदलना ही किसी भी व्यक्ति या दल के लिए टेढ़ी खीर होती है। ऐसा न हो कि साल 2019 आते-आते आपके ऊपर से भी माँ भारती की अनन्य भक्त भारत की बहुसंख्यक राष्ट्रवादी जनता का विश्वास समाप्त हो जाए।
मित्रों, चूँकि ऐसा होना भारत के विकास के लिए काफी अहितकारी सिद्ध होगा इसलिए मेरा नरेंद्र मोदी और अमित शाह से यह करबद्ध प्रार्थना है कि आपलोग कश्मीर के सनकी नेता मुफ्ती की सही रास्ते पर आने का स्पष्ट निर्देश दें और अगर फिर भी वो रास्ते पर नहीं आता है तो उसे बर्खास्त कर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाएँ क्योंकि मैं नहीं चाहता कि नरेंद्र मोदी से भारत की जनता इतनी जल्दी नाराज हो जाए और फिर से देश देशद्रोहियों के हाथों में चला जाए। अंत में मैं मोदी जी और शाह जी को मैं भारतीय इतिहास के एक और दृष्टांत की याद दिलाना चाहूंगा। 5 जनवरी,1544 को शेरशाह सूरी और मारवाड़ के शासक मालदेव के बीच जेतारण का युद्ध लड़ा गया था जिसमें तत्कालीन भारत का बादशाह शेरशाह सूरी हारते-हारते बचा था और तब उसने कहा था कि एक मुट्ठी भर बाजरे की कीमत पर मैँ हिन्दुस्तान की सियासत खो बैठता। कहीं आपलोगों का भी वही हाल नहीं हो।
मित्रों,इससे पहले 7 अक्तूबर,2013,दिन सोमवार को मैंने ब्रज की दुनिया पर ब्लॉग लिखकर उस समय नरेंद्र मोदी जी को चेतावनी दी थी कि सावधान मोदीजी यू टर्न लेना मना है जब वे प्रधानमंत्री नहीं थे बल्कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भर थे। लेकिन नरेंद्र मोदी क्यों सुनने लगे हमारी? आखिर मैं एक आर्थिक रूप से निहायत निर्बल,असफल छोटा-सा,सीधा-सादा,देशभक्त पत्रकार जो ठहरा।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

1.3.15


27.2.15

This VIP and VVIP culture should be stop in our country !!!

Very good subject to ponder upon !
Well done Arnub !
This VIP and VVIP culture should be stop in our country !!!
‪#‎EndVVIPRaj‬

24.2.15

अन्ना हजारे देशभक्त हैं या देशद्रोही?

मित्रों,एक बार फिर से कथित गांधीवादी अन्ना हजारे जंतर मंतर पर धरना पर बैठे हुए हैं। उनका साथ महान धरनावादी नेता अरविंद केजरीवाल भी देने जा रहे हैं। कहने को तो अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में धरना कर रहे हैं लेकिन वास्तव में धरने के पीछे की सच्चाई क्या है यह कोई नहीं जानता। क्या अन्ना निःस्वार्थ व्यक्ति हैं या धरना करना उनका पेशा है अर्थात् अन्ना पैसे लेकर धरना देते हैं? जिस तरह से अन्ना द्वारा पिछले सालों में किए गए अनशनों में जमा पैसों को ठिकाने लगा दिया गया और जिस तरह स्वामी अग्निवेश ने टीम अन्ना के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया था कि उन्होंने आईएसी के नाम पर मिलने वाले 80 लाख रुपये को अपने निजी ट्रस्ट में जमा कराया था को देखते हुए तो प्रथम दृष्ट्या यही प्रतीत हो रहा है कि अन्ना हजारे न केवल एक पेशेवर धरनेबाज और अनशनकर्ता है बल्कि वंदे मातरम् के नारे का दुरुपयोग करनेवाला देशद्रोही भी है,खद्दर की उजली धोती पहननेवाला बगुला भगत है। आईएसी के संस्थापकों में से एक अग्निवेश के मुताबिक केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने में देरी की, जबकि कोर कमिटी ने आईएसी के नाम से खाता खोलने के कई बार निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने की बजाय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में प्राप्त दान को अपने निजी ट्रस्ट पब्लिस कॉज रिसर्च फाउंडेशन में जमा कराया।
मित्रों,क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जो व्यक्ति एक मंदिर में रहता हो और अपने-आपको सादगी की प्रतिमूर्ति कहता हो वो विशेष विमान से यात्रा करे और बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिलों के साथ चले। सवाल उठता है कि यह सादगी की प्रतिमूर्ति विमान-यात्रा और महंगे वाहनों से चलने के लिए पैसे कहाँ से लाता है? क्या इसके लिए उसको फोर्ड फाउंडेशन या फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान प्राप्त (अ)लाभकारी संस्थाओं या फिर आम आदमी पार्टी से पैसे मिले हैं? अन्ना ने घोषणा की थी कि उनके मंच पर कोई नेता नहीं आएगा फिर आप पार्टी से चुनाव लड़ चुकी मेधा पाटेकर उनके मंच से भाषण कैसे दे रही है? अन्ना अगर शुरू से अंत तक पूरी तरह से गैर राजनैतिक व्यक्तित्व रहे हैं तो फिर अरविंद केजरीवाल उनसे मिलने महाराष्ट्र सदन क्यों गए थे? 22 फरवरी को अन्ना ने कहा कि केजरीवाल का मंच पर स्वागत है फिर कल कहा कि वे केजरीवाल को मंच पर नहीं आने देंगे जबकि मनीष सिसोदिया का दावा है कि केजरीवाल अन्ना के साथ मंच साझा करेंगे। आखिर यह कैसा गड़बड़झाला है? अन्ना और केजरीवाल के संबंधों पर तो यही कहा जा सकता है कि खुली पलक पर झूठा गुस्सा बंद पलक में प्यार?
मित्रों,जिस तरह अन्ना ने आंदोलन शुरू किया था और जिस तरह यह आंदोलन आगे बढ़ा और जिस तरह से आंदोलन के दौरान किरण बेदी को बदनाम कर केजरीवाल को महिमामंडित किया गया इस पूरे घटनाक्रम को देखकर बहुत ही आसानी से यह समझा जा सकता है कि अन्ना+टीम केजरीवाल का आंदोलन शुरू से ही एक राजनैतिक आंदोलन था और छिपे हुए राजनैतिक और भारत-विरोधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आयोजित किया गया था जिसकी डोर कहीं दूर सात समंदर पार फोर्ड फाउंडेशन के हाथों में थी। ओबामा द्वारा सोनिया गांधी से मुलाकात और उसके बाद उनका धार्मिक सद्भाव पर प्रवचन देना कहीं-न-कहीं इस बात का इशारा कर रहा है कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर मोदी सरकार से खुश नहीं है और नरेंद्र मोदी से उनकी नजदीकी स्वाभाविक नहीं बल्कि मजबूरी है।
मित्रों,सवाल उठता है कि धरना पर बैठे अन्ना के ईर्द-गिर्द कौन-से लोग हैं? क्या ये लोग भारत का विकास चाहते हैं,या ये लोग चाहते हैं कि भारत की ऊर्जा जरुरतों को पूरा किया जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत विकास के मामले में दुनिया का सिरमौर बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की सैन्य ताकत के मामले में इतना आत्मनिर्भर हो जाए कि दुनिया का कोई भी देश उसको आँखें न दिखाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन का स्थान ले ले और दुनिया की फैक्ट्री बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की युवाशक्ति को अभिशाप से वरदान में बदल दिया जाए और दुनिया के दूसरे देशों के लोग उसी तरह भारत आने को लालायित हों जिस तरह आज भारतीय अमेरिका जाने का सपना देखते हैं,क्या ये लोग चाहते हैं कि सारी सरकारी सुविधा लोगों को मोबाईल पर ही प्राप्त हो जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि पूरे भारत में विश्वस्तरीय सड़कों का जाल बिछे,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत के हर खेत को पानी मिले,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारतीय रेल लेटलतीफी के लिए कुख्यात होने के बजाए अपनी रफ्तार के लिए जानी जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत में सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की जीडीपी 2 ट्रिलियन डॉलर के बजाए 20 ट्रिलियन डॉलर हो जाए? इन सारे सवालों का बस एक ही उत्तर है नहीं,बिल्कुल भी नहीं। बल्कि अन्ना और उनके साथ धरना देने वाले संगठन और संगठनों के लोग यह चाहते हैं कि भारत हमेशा साँपों और सँपेरों का देश ही बना रहे,भारत का बिजली-उत्पादन इसी तरह जरुरत से काफी कम पर बना रहे,युवाशक्ति के हाथों में कलम या कंप्यूटर का माऊस नहीं हो बल्कि बंदूकें हों,भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनने के बदले सबसे बड़ा आयातक बना रहे।
मित्रों,जहाँ तक भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का प्रश्न है तो अभी तक यह सिर्फ एक अध्यादेश है। इस पर विधेय़क आएगा,उस पर संसद में विचार होगा और तब तमाम संशोधनों के बाद वह कानून का रूप लेगा। मतलब कि अभी तो उबलते हुए पानी में चावल डाला तक नहीं गया है और अन्ना भात जल गया,भात जल गया चिल्लाने लगे हैं। फिर केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वो इस मामले पर सदन में खुले दिमाग से चर्चा करवाएगी फिर अन्ना को धरने पर बैठने की जल्दी क्यों थी? केंद्र सरकार न तो भूमि अधिग्रहण को इतना आसान बनाना चाहती है कि कोई सरकार जब चाहे तब किसी किसान की जमीन छीन ले और न ही इतना कठिन कि विकास के कार्यों के लिए जमीन प्राप्त करना सर्वथा असंभव ही हो जाए फिर अन्ना को परेशानी क्या है? विदेशों से जो कंपनियाँ भारत में कारखाना खोलने के लिए आएंगी क्या वो हवा में कारखाने खोलेगी? केजरीवाल सरकार जब विद्युत तापघर स्थापित करेगी तो क्या वो जमीन के बदले आसमान में स्थापित करेगी? नए स्कूलों और नए महाविद्यालयों को हवा में बनाया जाएगा? केंद्र सरकार तो खुद ही कह रही है कि किसानों का हित उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस दिशा में भूमि स्वास्थ्य कार्ड,प्रधानमंत्री सिंचाई योजना जैसे तरह-तरह के इंतजाम भी कर रही है फिर अन्ना हजारों को धरना पर बैठने की जल्दीबाजी क्यों थी या है? जब केजरीवाल सरकार को वादों को पूरा करने के लिए पूरा 5 साल चाहिए तो मोदी सरकार को 5 साल क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? मोदी सरकार ने कोयले की लगभग पूरी रायल्टी राज्य सरकारों को दे दी,कोयला खानों की पारदर्शी नीलामी करवाई,2 जी स्पेक्ट्रमों की पारदर्शी नीलामी करवाने जा रही है,सारी सब्सिडियों को सीधे गरीबों के खातों तक पहुँचाने की व्यवस्था करने जा रही है,केंद्रीय मंत्रालयों में रोजाना कारपोरेट चूहों की धरपकड़ हो रही है,अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,बंगाल से लेकर केरल तक के घोटालेबाज-हत्यारे राजनेताओं को जेल भेजा जा रहा है,सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सांसदों और विधायकों पर चल रहे आपराधिक कांडों का स्पीडी ट्रायल करवाया जा रहा है। ऐसे में क्या अन्ना अंधे हैं या फिर उनका मोदी विरोध विपक्षी दलों की तरह सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं है?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

20.2.15

मांझी प्रकरण में गलती किसकी,मांझी,भाजपा या नीतीश की?

मित्रों,बिहार की राजनीति के मांझी कांड का आज अंत हो गया। अब इस नाटक को ट्रेजडी कहा जाए या कॉमेडी इस बात का निर्णय करना उतना ही मुश्किल है जितना इस बात का फैसला करना कि नीतीश राज ज्यादा बुरा था या मांझी राज। खैर जो नहीं होना चाहिए था वो तो हो चुका है अब आगे यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि सुशासन बाबू किस तरह फिर से कथित सुशासन की स्थापना करते हैं क्योंकि मेरी राय में जबसे नीतीश कुमार ने भाजपाई मंत्रियों को सरकार से अलग किया है तभी से सुशासन की गाड़ी बेपटरी है।
मित्रों,मांझी जी ने इस्तीफा तो दे दिया है लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने और हटने के घटनाक्रम ने कई अहम सवालों को जन्म दिया है। पहला सवाल तो यही है कि क्या नीतीश कुमार जी ने इस्तीफा देकर सही किया था। हमने तब भी यही कहा था कि नीतीश कुमार को इस्तीफा नहीं देना चाहिए था और अगर इस्तीफा देना ही था तो नए चुनाव करवाने चाहिए थे क्योंकि जनता ने उनको जो मत दिया था वह अकेले उनको नहीं था बल्कि जदयू-भाजपा गठबंधन को था। फिर उनको अपने बदले किसी और को मुख्यमंत्री बनाने अधिकार किसने दे दिया?
मित्रों,जहाँ तक मांझी जी के कामकाज करने के तरीके का सवाल है तो यह तो निश्चित है नीतीश कुमार ने मांझी को समझने में ठीक वैसे ही भूल कर दी जैसी भूल भाजपा ने खुद नीतीश के मामले में की थी। मांझी को पहले दिन से ही ठीक से काम नहीं करने दिया गया यह बात और है मांझी को काम करना आता भी नहीं था। मांझी लगातार उटपटांग बयान देते रहे जिससे पार्टी की जगहँसाई भी होती रही। धीरे-धीरे मांझी ने रिमोट के आदेश को मानना बंद कर दिया और मंत्रिमंडल में शामिल कई मंत्रियों को अपने पक्ष में कर लिया लेकिन वे यह भूल गए कि विधानसभा में वास्तविक शक्ति तो विधानसभा अध्यक्ष के पास होती है जो अब भी नीतीश कुमार के पाले में ही थे।
मित्रों,यद्यपि बिहार के दलित-महादलित मांझी सरकार के पराभव से उद्वेलित तो हैं लेकिन अब देखना यह है कि मांझी नई पार्टी बनाकर उनके गुस्से को कितना भुना पाते हैं। वैसे अभी भी चुनावों में 8 महीना बाँकी है और नीतीश कुमार निश्चित रूप से इस समय का भरपुर सदुपयोग करनेवाले हैं। वे दलितों-महादलितों सहित सभी जातियों और वर्गों के लिए नई-नई घोषणाओं की झड़ी लगानेवाले हैं जिसका असर होना भी निश्चित है।
मित्रों,जहाँ तक भाजपा की संभावनाओं का सवाल है तो आगामी चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार कहाँ तक जंगल राज को मंगल राज में बदल पाते हैं। वैसे भाजपा को मांझी का समर्थन करने से अलावे और विकल्प ढूँढ़ने चाहिए थे क्योंकि जबतक मांझी-नीतीश में गहरी छनती रही तबतक भाजपा की निगाहों में मांझी निहायत अयोग्य शासक थे और जैसे नहीं मांझी ने विद्रोह किया तो वही मांझी अच्छे हो गए?
मित्रों,लगता है कि भाजपा ने दिल्ली की हार से कोई सबक नहीं लिया है। भाजपा को अब से भी सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि बिहार में भी उसको वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जैसी स्थिति दिल्ली में थी। बिहार में भी हिन्दू बँटे हुए हैं और मुसलमान एकजुट। इसलिए भाजपा को सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए काफी सोंच-समझकर कदम उठाने होंगे। साथ ही,केंद्र की मोदी सरकार को काफी तेज गति से इस तरह के काम करने होंगे जिनका असर दूरदराज के गांवों तक में आसानी से दिखाई दे। दिल्ली से लेकर गांवों तक में भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार करना होगा,शासन-प्रशासन को ज्यादा-से-ज्यादा पारदर्शी और सूचना-प्रोद्योगिकी आधारित करना होगा,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाना होगा और मेक इन इंडिया में बिहार भी लाभान्वित हो यह सुनिश्चित करना होगा क्योंकि बिहार की सबसे बड़ी समस्या आज भी बिहार में बिहारियों को रोजगार का नहीं मिलना है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

13.2.15

न मोदी नेपोलियन हैं और न दिल्ली वाटरलू

13 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,10 फरवरी को दिल्ली में भाजपा को मिला करारी हार के बाद से ही मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू बताने में जुटा हुआ है जबकि वास्तविकता ऐसी है नहीं। नेपोलियन तलवार और बंदूकों के बल पर यूरोप को जीतना चाहता था जबकि नरेंद्र मोदी अपने अच्छे कामों से भारतीयों का दिल जीतना चाहते हैं। यहाँ संघर्ष जमीन जीतने के लिए नहीं बल्कि दिल जीतने के लिए हो रहा था और वास्तव में दिल्ली की हार मोदी की हार नहीं बल्कि खुद भारतीयों की हार है।
मित्रों,दिल्ली के चुनाव परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से यह समझ सकते हैं कि कैसे मुट्ठीभर अंग्रेजों ने विशालकाय भारत पर कब्जा कर लिया था। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने दक्षिण में निजाम और मराठों को बारी-बारी से लालच देकर आपस में ही लड़वाया और वे अंग्रेजों की चाल को समझ ही नहीं सके। इसी तरह अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला,बंगाल के सेनापति मीरजाफर को भी लालच देकर अपना उल्लू सीधा किया और जब मतलब निकल गया तब दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। कभी निजाम का पक्ष लेकर मराठों को हराया तो कभी मराठों को साथ में लेकर निजाम को। इसी तरह इतिहास बताता है कि जब ग्वालियर के किले में रहकर रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा ले रही थी तब उनके किले के किसी द्वारपाल ने सिर्फ एक सोने की ईट के बदले 16-17 जून 1858 की आधी रात को किले के द्वार को खोल दिया था फिर अंजाम जो हुआ उसे सारी दुनिया जानती है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है लालच हम भारतीयों के खून में है और उसी गंदे खून का दुष्परिणाम है दिल्ली का चुनाव-परिणाम। किसी ने एक लैपटॉप,एक साईकिल या एक मिक्सी दे दिया तो हम बिना यह देखे-परखे कि वह कैसा आदमी है उसे अपना राज्य अपना सबकुछ सौंप देते हैं। दिल्ली में भी वही हुआ जो अब तक यूपी,बिहार और तमिलनाडु में होता आ रहा था। दिल्ली में हमने यह नहीं देखा कि 40 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली दिल्ली के लिए कोई व्यक्ति या पार्टी कैसे 15 लाख करोड़ रुपये के वादे कर रहा है? हमने यह भी नहीं देखा कि पिछली बार उस व्यक्ति या पार्टी ने कितने वादों को पूरा किया था?
मित्रों,अभी तो दिल्ली में मुख्यमंत्री का शपथ-ग्रहण भी नहीं हुआ है और स्वंघोषित एकमात्र सत्यवादी जी की पार्टी ने गीता,बाईबिल और कुरान से भी ज्यादा पवित्र अपने घोषणा-पत्र से पलटना शुरू भी कर दिया है। उसने घोषित कर दिया है कि दिल्ली में सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर ही मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलेगी। वो भी सिर्फ आधे घंटे के लिए और उसमें भी फेसबुक आदि सोशल वेबसाईटों पर प्रतिबंध रहेगा। लो कल्लो बात। फिर फ्री के वाई-फाई का हम क्या अँचार डालेंगे? इतना ही नहीं कथित आम आदमियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम वादों को तभी पूरा कर सकेंगे जब केंद्र सरकार हमें पर्याप्त आर्थिक सहायता देगी। तो फिर इन लोगों ने घोषणा-पत्र में इस बात की घोषणा क्यों नहीं की कि हम वर्णित घोषणाओं और वादों को तभी पूरा करेंगे जब केंद्र सरकार पैसे देगी? घोषणा-पत्र में अगर यह लिखा गया था कि मुफ्त वाई-फाई,मुफ्त पानी,झुग्गी के स्थान पर मकान और सस्ती बिजली में नियम और शर्तें लागू होंगी तो फिर अखबारों में क्यों नहीं वादों के साथ-साथ उन नियमों और शर्तों को प्रमुखता से छपवाया गया? क्यों नियमों और शर्तों को जनता से छिपाया गया? अभी एक और खबर आई है कि सस्ती बिजली और फ्री में पानी देने के लिए नई सरकार के पास विकास की राशि को सब्सिडी के रूप में बर्बाद करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अगर हर राज्य में इसी तरह होता रहा और हो भी रहा है तो फिर कहाँ से आएगी विकास के लिए राशि और कैसे होगा देश का विकास?
मित्रों,ठगों को तो ठगी करनी ही थी अगर उन्होंने ठगी की तो इसमें उनका क्या दोष? दोष तो उनका है जिनका कबीर के इस 600 साल पुराने दोहे में आज भी अटूट विश्वास है कि कबिरा आप ठगाईए और न ठगिए कोए। आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होए।। तो ठगाते रहिए और सदियों तक लंगोट में फाग खेलकर चरम सुख का अनुभव करते रहिए। आप यकीनन देश के दुश्मनों द्वारा अभी दिल्ली में ठगे गए हैं,कल बिहार,परसों पश्चिम बंगाल और तरसों उत्तर प्रदेश में ठगे जाएंगे और इस तरह लगातार अपने लिए सुख उपजाते रहेंगे। मेरा यह पूरा आलेख विशेष तौर पर भारत के हिन्दुओं के लिए है। मुसलमानों का तो फिक्स है कि वे किसको वोट करेंगे फिर चाहे कोई कितने भी लैपटॉप,साईकिल क्यों न दे दे लेकिन दुनिया के सबसे पुराने धर्म के अनुयायियों का कोई ईमान-धर्म है क्या? फिर कोई दल या नेता क्यों इनके हित की बात करेगा,क्यों इनकी भलाई के लिए लड़ेगा?
मित्रों,शपथ-ग्रहण से पहले ही कथित आम आदमी कहने लगे हैं कि सोशल-साईट्सविहीन आधे घंटे के फ्री वाई-फाई के आने में कम-से-कम 6 महीने लग जाएंगे तो क्या नरेंद्र मोदी स्विटजरलैंड या जर्मनी के बाप लगते हैं जो उनके एकबार फोन घुमाते ही 10 दिन के भीतर ही सारा-का-सारा कालाधन देश में वापस आ जाएगा। मोदी को तो वह कोट जिसका मूल्य भले ही कितना भी हो उपहार में मिला था और मोदी हर साल जुलाई में उपहार में मिली वस्तुओं को नीलाम करके प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। बाँकी के नेताओं में क्या कोई एक भी ऐसा है जो ऐसा करता हो? बाँकी के नेता तो जब सरकारी आवास को खाली करते हैं तो बल्ब और कुर्सियाँ तक उठाकर ऐसे ले जाते हैं जैसे उनके बाप का माल हो। अभी हाल ही में हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब अपना कार्यकाल पूरा किया तब अपने साथ देश-विदेश में मिले कीमती उपहारों को भी साथ ले गईँ जिनको बाद में भारत सरकार को पत्राचार कर वापस मंगवाना पड़ा। और ऐसी लुटेरी पार्टियों के लुटेरे नेता भारत के प्रधानमंत्री के शूट पर सवाल उठा रहे हैं? खुद तो इनलोगों ने 200 रुपये मीटर का कपड़ा पहनकर देश को हजारों करोड़ का चूना लगा दिया और सवाल उठा रहे हैं पीएम के शूट पर?
मित्रों,कल ही बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने स्वीकार किया है कि बिहार में जो पुल बनते हैं उनके पायों के निर्माण पर जितना खर्च होता है उससे कहीं ज्यादा तो कमीशन दे दिया जाता है और वह कमीशन मुख्यमंत्री तक पहुँचता है। उन्होंने यह भी माना है कि पुल 20 करोड़ में बन जाता है लेकिन बिल 200 करोड़ रुपये का बनाया जाता है। और जिस व्यक्ति ने इस सारी कमीशनखोरी पर केंद्र सरकार में पूर्ण विराम लगा दिया उसी से आज बेईमान ईमानदार पार्टियों के लोग शूट का दाम पूछ रहे हैं और जनता भी उनके झाँसे में आ जा रही है! सवा सौ साल पहले भारत-दुर्दशा लिखकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया था लेकिन भारत की अंतरात्मा तो आज तक भी सोयी हुई ही है। सवा सौ साल पहले की तरह आज भी हमारे लिए हमारी वरीयता सूची में हमारे स्वार्थों का स्थान सबसे ऊपर है और देशहित कहीं नहीं। आज भी हम दस-बीस हजार रुपये के फायदे के लिए अपने राज्य और देश को देश के घोषित-अघोषित दुश्मनों के हाथों में हर पाँच साल पर सहर्ष सौंप देते हैं। वो हमें बार-बार धोखा देते हैं और बार-बार माफी मांगते हैं और हम बार-बार माफ भी कर देते हैं। वो कभी हमें रोटी का लालच देते हैं तो कभी पानी का तो कभी लैपटॉप या साईकिल या मिक्सी का और तब हम भूल जाते हैं कि इनके हाथों में हमारे राज्य या देश का हित सुरक्षित रहेगा या नहीं। हम लालच में आकर अपना वोट बेच देते हैं और उनको मौका दे देते देश को बेचने का। कौन कहता है काठ की हाँड़ी एक बार ही आग पर चढ़ती है?  फिर सवा सौ करोड़ के भारत में एक व्यक्ति के लिए अगर नेशन फर्स्ट और लास्ट है तो होकर भी क्या कर लेगा???
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

10.2.15

जनता की नब्ज पहचानने में विफल रही भाजपा

10 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,दिल्ली ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अश्वमेध के घोड़े को रोक लिया है। जीत जीत होती है और हार हार। फिर हार जब इतनी करारी हो तो सवाल उठना और भी लाजिमी हो जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं सच कहूंगा मगर फिर भी हार जाऊंगा, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा? लेकिन ऐसा हो चुका है और भारत की राजधानी दिल्ली में हो चुका है। कभी 15वीं-16वीं शताब्दी में कबीर को भी जमाने से यही शिकायत थी कि साधो,देख ये जग बौराना।
साँच कहूँ तो मारन धावे,
झूठौ जग पतियाना,
साधो,देख लो जग बौराना।।
मित्रों,वजह चाहे जो भी हो हार तो हार होती है। मुझे लगता है दिल्ली में भाजपा अतिआत्मविश्वास की बीमारी से ग्रस्त हो गई थी। भाजपा जनता से कट गई थी। लोक और तंत्र के बीच संवादहीनता की स्थिति पैदा हो गई थी। भाजपा का प्रचार ऊपर से नीचे की ओर चल रहा था वहीं आप पार्टी का प्रचार सीधे नीचे से चल रहा था। उनके कार्यकर्ता लगातार लोगों से डोर-टू-डोर संपर्क कर रहे थे जो कि भाजपा नहीं कर रही थी। फिर भाजपा ने चुनावों में काफी देर भी कर दी। मेरे हिसाब से दिल्ली में चुनाव लोकसभा चुनावों के तुरन्त बाद करवा लेना चाहिए था। चुनावों में देरी ने कई तरह के अंदेशों और अफवाहों को हवा दी।
मित्रों,दूसरी जो वजह हार की है वो है दिल्ली भाजपा में सिर फुटौब्बल। भाजपा में ऐसा कम ही देखा जाता है कि प्रदेश अध्यक्ष का ही टिकट कट जाए और उनके समर्थक प्रदेश कार्यालय को घेर लें लेकिन ऐसा हुआ। उस पर भाजपा ने अपने पुराने कैडरों की उपेक्षा करते हुए किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया जिससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में निराशा उत्पन्ना हो गई। इतना ही नहीं पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए हुए लोगों को सिर आँखों पर बिठाया जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ जनता के बीच भी गलत संकेत गया।
मित्रों,तीसरी वजह यह रही कि पार्टी ने कई मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी। नरेंद्र मोदी के शूट के मुद्दे पर पार्टी को तुरन्त बताना चाहिए था कि शूट गिफ्ट में मिली है और मोदी गिफ्ट में मिली चीजों की सालाना नीलामी करवाते हैं और प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। इसी तरह पार्टी ने प्रत्येक भारतवासी के खाते में 15 लाख रुपये वाले जुमले पर भी चुप्पी साधे रखी।
मित्रों,चौथी वजह यह रही कि मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी में धैर्य और वक्तृता शक्ति की कमी। पूरे चुनाव अभियान के दौरान किरण बेदी जी राजनेता की तरह दिखी ही नहीं। हमेशा ऐसा लगता रहा कि उनके पास समय की कमी है। यहाँ तक कि टीवी चैनल वालों के लिए भी उनके पास समय नहीं था। अगर उनको टीवी पर बहस नहीं करनी थी तो उनको इसकी पहल भी नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि उनके बहस से पीछे हटने का जो संकेत जनता के बीच गया वह पार्टी के लिए काफी घातक रहा। किरण बेदी जी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत ही विवाद से की लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भाजपा का पट्टा पहनाकर।
मित्रों,पाँचवीं वजह यह रही कि भाजपा ने अपना विजन डॉक्यूमेंट लाने में काफी देर कर दी। उसके विजन डॉक्यूमेंट में अधिकतर वादे वही थे जो आप पार्टी के घोषणा-पत्र में पहले ही आ चुके थे।
मित्रों,छठी वजह यह रही कि दिल्ली सहित सारे देश में धीरे-धीरे जनता को लगने लगा है कि मोदी जी के केंद्र में आने के बावजूद ग्रास रूट लेवल पर स्थितियाँ कमोबेश वैसी ही और वही हैं जो 9 महीने पहले थीं। आज भी पुलिस भ्रष्ट है,नगर निगम भ्रष्ट हैं,चारों तरफ गंदगी है,भ्रष्टाचार है,बिजली और पानी की किल्लत है,न्याय विलंबित और बेहद खर्चीला है,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति काफी खराब है,पंचायती राज भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण के प्रतीक बने हुए हैं,जनवितरण प्रणाली में व्यापक भ्रष्टाचार है आदि-आदि।
मित्रों,सातवीं वजह यह रही कि आज भी भारत की जनता मुफ्तखोर है। उसको हर चीज मुफ्त में चाहिए भले ही इसके लिए देश के विकास के रथ को रोकना ही क्यों न पड़े। उसको इस बात से कुछ भी लेना-देना नहीं है कि कौन सी पार्टी देशभक्त है और कौन सी पार्टी देश विरोधी। यहाँ यह ध्यान देनेवाली बात है कि दिल्ली का वार्षिक बजट मात्र 40,000 करोड़ रुपये का होता है वही आप पार्टी ने 15 लाख करोड़ रुपये के वादे दिल्ली की जनता से कर दिए हैं। जाहिर है कि भविष्य में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वे इन वादों को कैसे पूरा करते हैं। या फिर से पैसों की मांग के लिए धरने पर बैठ जाते हैं। सबसे ज्यादा दिलचस्प यह देखना होगा कि पूरी दिल्ली में कबसे मुफ्त में वाई-फाई की सुविधा शुरू की जाती है और कब दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। क्योंकि दिल्ली के ज्यादातर युवा फ्री वाई-फाई के लालच में आ गए।
मित्रों,आठवीं वजह यह रही कि कांग्रेस का पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी ले उड़ी। वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा इस बार भी वहीं है जहाँ 2013 में थी। अगर भाजपा ने जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया होता तो निश्चित रूप से कांग्रेस के वोट बैंक में उसको भी हिस्सा मिलता लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि मोदी सरकार ने भले ही डीजल के दाम कितने भी कम क्यों न कर दिए हों उसका व्यापक असर महंगाई पर दिख नहीं रहा क्योंकि न तो बसों-टेम्पो के भाड़े ही कम हुए और न ही ट्रकों के।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि भाजपा की तरफ से घर-वापसी आदि को लेकर लगातार उटपटांग बयान आते रहे। खुद नरेंद्र मोदी के दिल्ली में दिए गए चारों भाषण भी निर्विवाद नहीं रहे। भाग्यवान और अभागा जैसे जुमले सिर्फ और सिर्फ दंभ और अभिमान के परिचायक रहे। मोदी केजरीवाल को निगेटिव कहते रहे लेकिन कहीँ-न-कहीं उनका खुद का भाषण ही निगेटिव हो गया। उनको आप पार्टी की आलोचना करने के बजाए यह बताना चाहिए था कि वे दिल्ली के लिए क्या-क्या करना चाहते हैं। उनको नौ महीने में दिल्ली नगर निगम की स्थिति को सुधारना चाहिए था। फिर योगी आदित्यनाथ ने तो हद ही कर दी यह कहकर कि वे देश की प्रत्येक मस्जिद में गौरी-गणेश की प्रतिमा स्थापित करवा देंगे। कुल मिलाकर निश्चित रूप से भाजपा ने कई गलतियाँ कीं और उन गलतियों का खामियाजा उसे भुगतना ही था। देश की जनता निश्चित रूप से मोदी सरकार के काम करने की रफ्तार से संतुष्ट नहीं है। उसको और भी तेज रफ्तार में काम चाहिए और ऐसे काम चाहिए जो जमीनी स्तर पर आसानी से दिखाई दें। उसको भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए,त्वरित न्याय चाहिए,सफाई चाहिए,अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधा चाहिए,रोजगार चाहिए आदि-आदि।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)