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27.2.15

This VIP and VVIP culture should be stop in our country !!!

Very good subject to ponder upon !
Well done Arnub !
This VIP and VVIP culture should be stop in our country !!!
‪#‎EndVVIPRaj‬

24.2.15

अन्ना हजारे देशभक्त हैं या देशद्रोही?

मित्रों,एक बार फिर से कथित गांधीवादी अन्ना हजारे जंतर मंतर पर धरना पर बैठे हुए हैं। उनका साथ महान धरनावादी नेता अरविंद केजरीवाल भी देने जा रहे हैं। कहने को तो अन्ना हजारे भूमि अधिग्रहण बिल के विरोध में धरना कर रहे हैं लेकिन वास्तव में धरने के पीछे की सच्चाई क्या है यह कोई नहीं जानता। क्या अन्ना निःस्वार्थ व्यक्ति हैं या धरना करना उनका पेशा है अर्थात् अन्ना पैसे लेकर धरना देते हैं? जिस तरह से अन्ना द्वारा पिछले सालों में किए गए अनशनों में जमा पैसों को ठिकाने लगा दिया गया और जिस तरह स्वामी अग्निवेश ने टीम अन्ना के अहम सदस्य अरविंद केजरीवाल पर आरोप लगाया था कि उन्होंने आईएसी के नाम पर मिलने वाले 80 लाख रुपये को अपने निजी ट्रस्ट में जमा कराया था को देखते हुए तो प्रथम दृष्ट्या यही प्रतीत हो रहा है कि अन्ना हजारे न केवल एक पेशेवर धरनेबाज और अनशनकर्ता है बल्कि वंदे मातरम् के नारे का दुरुपयोग करनेवाला देशद्रोही भी है,खद्दर की उजली धोती पहननेवाला बगुला भगत है। आईएसी के संस्थापकों में से एक अग्निवेश के मुताबिक केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने में देरी की, जबकि कोर कमिटी ने आईएसी के नाम से खाता खोलने के कई बार निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि केजरीवाल ने आईएसी के नाम से खाता खोलने की बजाय भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में प्राप्त दान को अपने निजी ट्रस्ट पब्लिस कॉज रिसर्च फाउंडेशन में जमा कराया।
मित्रों,क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि जो व्यक्ति एक मंदिर में रहता हो और अपने-आपको सादगी की प्रतिमूर्ति कहता हो वो विशेष विमान से यात्रा करे और बड़ी-बड़ी गाड़ियों के काफिलों के साथ चले। सवाल उठता है कि यह सादगी की प्रतिमूर्ति विमान-यात्रा और महंगे वाहनों से चलने के लिए पैसे कहाँ से लाता है? क्या इसके लिए उसको फोर्ड फाउंडेशन या फोर्ड फाउंडेशन से अनुदान प्राप्त (अ)लाभकारी संस्थाओं या फिर आम आदमी पार्टी से पैसे मिले हैं? अन्ना ने घोषणा की थी कि उनके मंच पर कोई नेता नहीं आएगा फिर आप पार्टी से चुनाव लड़ चुकी मेधा पाटेकर उनके मंच से भाषण कैसे दे रही है? अन्ना अगर शुरू से अंत तक पूरी तरह से गैर राजनैतिक व्यक्तित्व रहे हैं तो फिर अरविंद केजरीवाल उनसे मिलने महाराष्ट्र सदन क्यों गए थे? 22 फरवरी को अन्ना ने कहा कि केजरीवाल का मंच पर स्वागत है फिर कल कहा कि वे केजरीवाल को मंच पर नहीं आने देंगे जबकि मनीष सिसोदिया का दावा है कि केजरीवाल अन्ना के साथ मंच साझा करेंगे। आखिर यह कैसा गड़बड़झाला है? अन्ना और केजरीवाल के संबंधों पर तो यही कहा जा सकता है कि खुली पलक पर झूठा गुस्सा बंद पलक में प्यार?
मित्रों,जिस तरह अन्ना ने आंदोलन शुरू किया था और जिस तरह यह आंदोलन आगे बढ़ा और जिस तरह से आंदोलन के दौरान किरण बेदी को बदनाम कर केजरीवाल को महिमामंडित किया गया इस पूरे घटनाक्रम को देखकर बहुत ही आसानी से यह समझा जा सकता है कि अन्ना+टीम केजरीवाल का आंदोलन शुरू से ही एक राजनैतिक आंदोलन था और छिपे हुए राजनैतिक और भारत-विरोधी उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आयोजित किया गया था जिसकी डोर कहीं दूर सात समंदर पार फोर्ड फाउंडेशन के हाथों में थी। ओबामा द्वारा सोनिया गांधी से मुलाकात और उसके बाद उनका धार्मिक सद्भाव पर प्रवचन देना कहीं-न-कहीं इस बात का इशारा कर रहा है कि अमेरिका भीतर-ही-भीतर मोदी सरकार से खुश नहीं है और नरेंद्र मोदी से उनकी नजदीकी स्वाभाविक नहीं बल्कि मजबूरी है।
मित्रों,सवाल उठता है कि धरना पर बैठे अन्ना के ईर्द-गिर्द कौन-से लोग हैं? क्या ये लोग भारत का विकास चाहते हैं,या ये लोग चाहते हैं कि भारत की ऊर्जा जरुरतों को पूरा किया जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत विकास के मामले में दुनिया का सिरमौर बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की सैन्य ताकत के मामले में इतना आत्मनिर्भर हो जाए कि दुनिया का कोई भी देश उसको आँखें न दिखाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में चीन का स्थान ले ले और दुनिया की फैक्ट्री बने,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की युवाशक्ति को अभिशाप से वरदान में बदल दिया जाए और दुनिया के दूसरे देशों के लोग उसी तरह भारत आने को लालायित हों जिस तरह आज भारतीय अमेरिका जाने का सपना देखते हैं,क्या ये लोग चाहते हैं कि सारी सरकारी सुविधा लोगों को मोबाईल पर ही प्राप्त हो जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि पूरे भारत में विश्वस्तरीय सड़कों का जाल बिछे,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत के हर खेत को पानी मिले,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारतीय रेल लेटलतीफी के लिए कुख्यात होने के बजाए अपनी रफ्तार के लिए जानी जाए,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत में सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का स्तर दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो,क्या ये लोग चाहते हैं कि भारत की जीडीपी 2 ट्रिलियन डॉलर के बजाए 20 ट्रिलियन डॉलर हो जाए? इन सारे सवालों का बस एक ही उत्तर है नहीं,बिल्कुल भी नहीं। बल्कि अन्ना और उनके साथ धरना देने वाले संगठन और संगठनों के लोग यह चाहते हैं कि भारत हमेशा साँपों और सँपेरों का देश ही बना रहे,भारत का बिजली-उत्पादन इसी तरह जरुरत से काफी कम पर बना रहे,युवाशक्ति के हाथों में कलम या कंप्यूटर का माऊस नहीं हो बल्कि बंदूकें हों,भारत दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बनने के बदले सबसे बड़ा आयातक बना रहे।
मित्रों,जहाँ तक भूमि अधिग्रहण अध्यादेश का प्रश्न है तो अभी तक यह सिर्फ एक अध्यादेश है। इस पर विधेय़क आएगा,उस पर संसद में विचार होगा और तब तमाम संशोधनों के बाद वह कानून का रूप लेगा। मतलब कि अभी तो उबलते हुए पानी में चावल डाला तक नहीं गया है और अन्ना भात जल गया,भात जल गया चिल्लाने लगे हैं। फिर केंद्र सरकार बार-बार यह कह रही है कि वो इस मामले पर सदन में खुले दिमाग से चर्चा करवाएगी फिर अन्ना को धरने पर बैठने की जल्दी क्यों थी? केंद्र सरकार न तो भूमि अधिग्रहण को इतना आसान बनाना चाहती है कि कोई सरकार जब चाहे तब किसी किसान की जमीन छीन ले और न ही इतना कठिन कि विकास के कार्यों के लिए जमीन प्राप्त करना सर्वथा असंभव ही हो जाए फिर अन्ना को परेशानी क्या है? विदेशों से जो कंपनियाँ भारत में कारखाना खोलने के लिए आएंगी क्या वो हवा में कारखाने खोलेगी? केजरीवाल सरकार जब विद्युत तापघर स्थापित करेगी तो क्या वो जमीन के बदले आसमान में स्थापित करेगी? नए स्कूलों और नए महाविद्यालयों को हवा में बनाया जाएगा? केंद्र सरकार तो खुद ही कह रही है कि किसानों का हित उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है और इस दिशा में भूमि स्वास्थ्य कार्ड,प्रधानमंत्री सिंचाई योजना जैसे तरह-तरह के इंतजाम भी कर रही है फिर अन्ना हजारों को धरना पर बैठने की जल्दीबाजी क्यों थी या है? जब केजरीवाल सरकार को वादों को पूरा करने के लिए पूरा 5 साल चाहिए तो मोदी सरकार को 5 साल क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? मोदी सरकार ने कोयले की लगभग पूरी रायल्टी राज्य सरकारों को दे दी,कोयला खानों की पारदर्शी नीलामी करवाई,2 जी स्पेक्ट्रमों की पारदर्शी नीलामी करवाने जा रही है,सारी सब्सिडियों को सीधे गरीबों के खातों तक पहुँचाने की व्यवस्था करने जा रही है,केंद्रीय मंत्रालयों में रोजाना कारपोरेट चूहों की धरपकड़ हो रही है,अंबानी पर जुर्माना हो रहा है,बंगाल से लेकर केरल तक के घोटालेबाज-हत्यारे राजनेताओं को जेल भेजा जा रहा है,सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सांसदों और विधायकों पर चल रहे आपराधिक कांडों का स्पीडी ट्रायल करवाया जा रहा है। ऐसे में क्या अन्ना अंधे हैं या फिर उनका मोदी विरोध विपक्षी दलों की तरह सिर्फ विरोध के लिए विरोध नहीं है?
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

20.2.15

मांझी प्रकरण में गलती किसकी,मांझी,भाजपा या नीतीश की?

मित्रों,बिहार की राजनीति के मांझी कांड का आज अंत हो गया। अब इस नाटक को ट्रेजडी कहा जाए या कॉमेडी इस बात का निर्णय करना उतना ही मुश्किल है जितना इस बात का फैसला करना कि नीतीश राज ज्यादा बुरा था या मांझी राज। खैर जो नहीं होना चाहिए था वो तो हो चुका है अब आगे यह देखना कम दिलचस्प नहीं होगा कि सुशासन बाबू किस तरह फिर से कथित सुशासन की स्थापना करते हैं क्योंकि मेरी राय में जबसे नीतीश कुमार ने भाजपाई मंत्रियों को सरकार से अलग किया है तभी से सुशासन की गाड़ी बेपटरी है।
मित्रों,मांझी जी ने इस्तीफा तो दे दिया है लेकिन उनके मुख्यमंत्री बनने और हटने के घटनाक्रम ने कई अहम सवालों को जन्म दिया है। पहला सवाल तो यही है कि क्या नीतीश कुमार जी ने इस्तीफा देकर सही किया था। हमने तब भी यही कहा था कि नीतीश कुमार को इस्तीफा नहीं देना चाहिए था और अगर इस्तीफा देना ही था तो नए चुनाव करवाने चाहिए थे क्योंकि जनता ने उनको जो मत दिया था वह अकेले उनको नहीं था बल्कि जदयू-भाजपा गठबंधन को था। फिर उनको अपने बदले किसी और को मुख्यमंत्री बनाने अधिकार किसने दे दिया?
मित्रों,जहाँ तक मांझी जी के कामकाज करने के तरीके का सवाल है तो यह तो निश्चित है नीतीश कुमार ने मांझी को समझने में ठीक वैसे ही भूल कर दी जैसी भूल भाजपा ने खुद नीतीश के मामले में की थी। मांझी को पहले दिन से ही ठीक से काम नहीं करने दिया गया यह बात और है मांझी को काम करना आता भी नहीं था। मांझी लगातार उटपटांग बयान देते रहे जिससे पार्टी की जगहँसाई भी होती रही। धीरे-धीरे मांझी ने रिमोट के आदेश को मानना बंद कर दिया और मंत्रिमंडल में शामिल कई मंत्रियों को अपने पक्ष में कर लिया लेकिन वे यह भूल गए कि विधानसभा में वास्तविक शक्ति तो विधानसभा अध्यक्ष के पास होती है जो अब भी नीतीश कुमार के पाले में ही थे।
मित्रों,यद्यपि बिहार के दलित-महादलित मांझी सरकार के पराभव से उद्वेलित तो हैं लेकिन अब देखना यह है कि मांझी नई पार्टी बनाकर उनके गुस्से को कितना भुना पाते हैं। वैसे अभी भी चुनावों में 8 महीना बाँकी है और नीतीश कुमार निश्चित रूप से इस समय का भरपुर सदुपयोग करनेवाले हैं। वे दलितों-महादलितों सहित सभी जातियों और वर्गों के लिए नई-नई घोषणाओं की झड़ी लगानेवाले हैं जिसका असर होना भी निश्चित है।
मित्रों,जहाँ तक भाजपा की संभावनाओं का सवाल है तो आगामी चुनाव में भाजपा का प्रदर्शन काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि नीतीश कुमार कहाँ तक जंगल राज को मंगल राज में बदल पाते हैं। वैसे भाजपा को मांझी का समर्थन करने से अलावे और विकल्प ढूँढ़ने चाहिए थे क्योंकि जबतक मांझी-नीतीश में गहरी छनती रही तबतक भाजपा की निगाहों में मांझी निहायत अयोग्य शासक थे और जैसे नहीं मांझी ने विद्रोह किया तो वही मांझी अच्छे हो गए?
मित्रों,लगता है कि भाजपा ने दिल्ली की हार से कोई सबक नहीं लिया है। भाजपा को अब से भी सचेत हो जाना चाहिए क्योंकि बिहार में भी उसको वैसी ही स्थिति का सामना करना पड़ सकता है जैसी स्थिति दिल्ली में थी। बिहार में भी हिन्दू बँटे हुए हैं और मुसलमान एकजुट। इसलिए भाजपा को सामाजिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए काफी सोंच-समझकर कदम उठाने होंगे। साथ ही,केंद्र की मोदी सरकार को काफी तेज गति से इस तरह के काम करने होंगे जिनका असर दूरदराज के गांवों तक में आसानी से दिखाई दे। दिल्ली से लेकर गांवों तक में भ्रष्टाचार पर करारा प्रहार करना होगा,शासन-प्रशासन को ज्यादा-से-ज्यादा पारदर्शी और सूचना-प्रोद्योगिकी आधारित करना होगा,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार लाना होगा और मेक इन इंडिया में बिहार भी लाभान्वित हो यह सुनिश्चित करना होगा क्योंकि बिहार की सबसे बड़ी समस्या आज भी बिहार में बिहारियों को रोजगार का नहीं मिलना है।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

13.2.15

न मोदी नेपोलियन हैं और न दिल्ली वाटरलू

13 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,10 फरवरी को दिल्ली में भाजपा को मिला करारी हार के बाद से ही मीडिया का एक हिस्सा दिल्ली को भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए वाटरलू बताने में जुटा हुआ है जबकि वास्तविकता ऐसी है नहीं। नेपोलियन तलवार और बंदूकों के बल पर यूरोप को जीतना चाहता था जबकि नरेंद्र मोदी अपने अच्छे कामों से भारतीयों का दिल जीतना चाहते हैं। यहाँ संघर्ष जमीन जीतने के लिए नहीं बल्कि दिल जीतने के लिए हो रहा था और वास्तव में दिल्ली की हार मोदी की हार नहीं बल्कि खुद भारतीयों की हार है।
मित्रों,दिल्ली के चुनाव परिणामों का अगर हम विश्लेषण करें तो आसानी से यह समझ सकते हैं कि कैसे मुट्ठीभर अंग्रेजों ने विशालकाय भारत पर कब्जा कर लिया था। इतिहास गवाह है कि अंग्रेजों ने दक्षिण में निजाम और मराठों को बारी-बारी से लालच देकर आपस में ही लड़वाया और वे अंग्रेजों की चाल को समझ ही नहीं सके। इसी तरह अंग्रेजों ने अवध के नवाब शुजाउद्दौला,बंगाल के सेनापति मीरजाफर को भी लालच देकर अपना उल्लू सीधा किया और जब मतलब निकल गया तब दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया। कभी निजाम का पक्ष लेकर मराठों को हराया तो कभी मराठों को साथ में लेकर निजाम को। इसी तरह इतिहास बताता है कि जब ग्वालियर के किले में रहकर रानी लक्ष्मीबाई अंग्रेजों से लोहा ले रही थी तब उनके किले के किसी द्वारपाल ने सिर्फ एक सोने की ईट के बदले 16-17 जून 1858 की आधी रात को किले के द्वार को खोल दिया था फिर अंजाम जो हुआ उसे सारी दुनिया जानती है।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है लालच हम भारतीयों के खून में है और उसी गंदे खून का दुष्परिणाम है दिल्ली का चुनाव-परिणाम। किसी ने एक लैपटॉप,एक साईकिल या एक मिक्सी दे दिया तो हम बिना यह देखे-परखे कि वह कैसा आदमी है उसे अपना राज्य अपना सबकुछ सौंप देते हैं। दिल्ली में भी वही हुआ जो अब तक यूपी,बिहार और तमिलनाडु में होता आ रहा था। दिल्ली में हमने यह नहीं देखा कि 40 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली दिल्ली के लिए कोई व्यक्ति या पार्टी कैसे 15 लाख करोड़ रुपये के वादे कर रहा है? हमने यह भी नहीं देखा कि पिछली बार उस व्यक्ति या पार्टी ने कितने वादों को पूरा किया था?
मित्रों,अभी तो दिल्ली में मुख्यमंत्री का शपथ-ग्रहण भी नहीं हुआ है और स्वंघोषित एकमात्र सत्यवादी जी की पार्टी ने गीता,बाईबिल और कुरान से भी ज्यादा पवित्र अपने घोषणा-पत्र से पलटना शुरू भी कर दिया है। उसने घोषित कर दिया है कि दिल्ली में सिर्फ सार्वजनिक स्थलों पर ही मुफ्त वाई-फाई की सुविधा मिलेगी। वो भी सिर्फ आधे घंटे के लिए और उसमें भी फेसबुक आदि सोशल वेबसाईटों पर प्रतिबंध रहेगा। लो कल्लो बात। फिर फ्री के वाई-फाई का हम क्या अँचार डालेंगे? इतना ही नहीं कथित आम आदमियों ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि हम वादों को तभी पूरा कर सकेंगे जब केंद्र सरकार हमें पर्याप्त आर्थिक सहायता देगी। तो फिर इन लोगों ने घोषणा-पत्र में इस बात की घोषणा क्यों नहीं की कि हम वर्णित घोषणाओं और वादों को तभी पूरा करेंगे जब केंद्र सरकार पैसे देगी? घोषणा-पत्र में अगर यह लिखा गया था कि मुफ्त वाई-फाई,मुफ्त पानी,झुग्गी के स्थान पर मकान और सस्ती बिजली में नियम और शर्तें लागू होंगी तो फिर अखबारों में क्यों नहीं वादों के साथ-साथ उन नियमों और शर्तों को प्रमुखता से छपवाया गया? क्यों नियमों और शर्तों को जनता से छिपाया गया? अभी एक और खबर आई है कि सस्ती बिजली और फ्री में पानी देने के लिए नई सरकार के पास विकास की राशि को सब्सिडी के रूप में बर्बाद करने के अलावा और कोई उपाय नहीं है। अगर हर राज्य में इसी तरह होता रहा और हो भी रहा है तो फिर कहाँ से आएगी विकास के लिए राशि और कैसे होगा देश का विकास?
मित्रों,ठगों को तो ठगी करनी ही थी अगर उन्होंने ठगी की तो इसमें उनका क्या दोष? दोष तो उनका है जिनका कबीर के इस 600 साल पुराने दोहे में आज भी अटूट विश्वास है कि कबिरा आप ठगाईए और न ठगिए कोए। आप ठगे सुख उपजै और ठगे दुःख होए।। तो ठगाते रहिए और सदियों तक लंगोट में फाग खेलकर चरम सुख का अनुभव करते रहिए। आप यकीनन देश के दुश्मनों द्वारा अभी दिल्ली में ठगे गए हैं,कल बिहार,परसों पश्चिम बंगाल और तरसों उत्तर प्रदेश में ठगे जाएंगे और इस तरह लगातार अपने लिए सुख उपजाते रहेंगे। मेरा यह पूरा आलेख विशेष तौर पर भारत के हिन्दुओं के लिए है। मुसलमानों का तो फिक्स है कि वे किसको वोट करेंगे फिर चाहे कोई कितने भी लैपटॉप,साईकिल क्यों न दे दे लेकिन दुनिया के सबसे पुराने धर्म के अनुयायियों का कोई ईमान-धर्म है क्या? फिर कोई दल या नेता क्यों इनके हित की बात करेगा,क्यों इनकी भलाई के लिए लड़ेगा?
मित्रों,शपथ-ग्रहण से पहले ही कथित आम आदमी कहने लगे हैं कि सोशल-साईट्सविहीन आधे घंटे के फ्री वाई-फाई के आने में कम-से-कम 6 महीने लग जाएंगे तो क्या नरेंद्र मोदी स्विटजरलैंड या जर्मनी के बाप लगते हैं जो उनके एकबार फोन घुमाते ही 10 दिन के भीतर ही सारा-का-सारा कालाधन देश में वापस आ जाएगा। मोदी को तो वह कोट जिसका मूल्य भले ही कितना भी हो उपहार में मिला था और मोदी हर साल जुलाई में उपहार में मिली वस्तुओं को नीलाम करके प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। बाँकी के नेताओं में क्या कोई एक भी ऐसा है जो ऐसा करता हो? बाँकी के नेता तो जब सरकारी आवास को खाली करते हैं तो बल्ब और कुर्सियाँ तक उठाकर ऐसे ले जाते हैं जैसे उनके बाप का माल हो। अभी हाल ही में हमारी पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने जब अपना कार्यकाल पूरा किया तब अपने साथ देश-विदेश में मिले कीमती उपहारों को भी साथ ले गईँ जिनको बाद में भारत सरकार को पत्राचार कर वापस मंगवाना पड़ा। और ऐसी लुटेरी पार्टियों के लुटेरे नेता भारत के प्रधानमंत्री के शूट पर सवाल उठा रहे हैं? खुद तो इनलोगों ने 200 रुपये मीटर का कपड़ा पहनकर देश को हजारों करोड़ का चूना लगा दिया और सवाल उठा रहे हैं पीएम के शूट पर?
मित्रों,कल ही बिहार के मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी ने स्वीकार किया है कि बिहार में जो पुल बनते हैं उनके पायों के निर्माण पर जितना खर्च होता है उससे कहीं ज्यादा तो कमीशन दे दिया जाता है और वह कमीशन मुख्यमंत्री तक पहुँचता है। उन्होंने यह भी माना है कि पुल 20 करोड़ में बन जाता है लेकिन बिल 200 करोड़ रुपये का बनाया जाता है। और जिस व्यक्ति ने इस सारी कमीशनखोरी पर केंद्र सरकार में पूर्ण विराम लगा दिया उसी से आज बेईमान ईमानदार पार्टियों के लोग शूट का दाम पूछ रहे हैं और जनता भी उनके झाँसे में आ जा रही है! सवा सौ साल पहले भारत-दुर्दशा लिखकर भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने भारत की अंतरात्मा को जगाने का प्रयास किया था लेकिन भारत की अंतरात्मा तो आज तक भी सोयी हुई ही है। सवा सौ साल पहले की तरह आज भी हमारे लिए हमारी वरीयता सूची में हमारे स्वार्थों का स्थान सबसे ऊपर है और देशहित कहीं नहीं। आज भी हम दस-बीस हजार रुपये के फायदे के लिए अपने राज्य और देश को देश के घोषित-अघोषित दुश्मनों के हाथों में हर पाँच साल पर सहर्ष सौंप देते हैं। वो हमें बार-बार धोखा देते हैं और बार-बार माफी मांगते हैं और हम बार-बार माफ भी कर देते हैं। वो कभी हमें रोटी का लालच देते हैं तो कभी पानी का तो कभी लैपटॉप या साईकिल या मिक्सी का और तब हम भूल जाते हैं कि इनके हाथों में हमारे राज्य या देश का हित सुरक्षित रहेगा या नहीं। हम लालच में आकर अपना वोट बेच देते हैं और उनको मौका दे देते देश को बेचने का। कौन कहता है काठ की हाँड़ी एक बार ही आग पर चढ़ती है?  फिर सवा सौ करोड़ के भारत में एक व्यक्ति के लिए अगर नेशन फर्स्ट और लास्ट है तो होकर भी क्या कर लेगा???
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

10.2.15

जनता की नब्ज पहचानने में विफल रही भाजपा

10 फरवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,दिल्ली ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अश्वमेध के घोड़े को रोक लिया है। जीत जीत होती है और हार हार। फिर हार जब इतनी करारी हो तो सवाल उठना और भी लाजिमी हो जाता है। ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं सच कहूंगा मगर फिर भी हार जाऊंगा, वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा? लेकिन ऐसा हो चुका है और भारत की राजधानी दिल्ली में हो चुका है। कभी 15वीं-16वीं शताब्दी में कबीर को भी जमाने से यही शिकायत थी कि साधो,देख ये जग बौराना।
साँच कहूँ तो मारन धावे,
झूठौ जग पतियाना,
साधो,देख लो जग बौराना।।
मित्रों,वजह चाहे जो भी हो हार तो हार होती है। मुझे लगता है दिल्ली में भाजपा अतिआत्मविश्वास की बीमारी से ग्रस्त हो गई थी। भाजपा जनता से कट गई थी। लोक और तंत्र के बीच संवादहीनता की स्थिति पैदा हो गई थी। भाजपा का प्रचार ऊपर से नीचे की ओर चल रहा था वहीं आप पार्टी का प्रचार सीधे नीचे से चल रहा था। उनके कार्यकर्ता लगातार लोगों से डोर-टू-डोर संपर्क कर रहे थे जो कि भाजपा नहीं कर रही थी। फिर भाजपा ने चुनावों में काफी देर भी कर दी। मेरे हिसाब से दिल्ली में चुनाव लोकसभा चुनावों के तुरन्त बाद करवा लेना चाहिए था। चुनावों में देरी ने कई तरह के अंदेशों और अफवाहों को हवा दी।
मित्रों,दूसरी जो वजह हार की है वो है दिल्ली भाजपा में सिर फुटौब्बल। भाजपा में ऐसा कम ही देखा जाता है कि प्रदेश अध्यक्ष का ही टिकट कट जाए और उनके समर्थक प्रदेश कार्यालय को घेर लें लेकिन ऐसा हुआ। उस पर भाजपा ने अपने पुराने कैडरों की उपेक्षा करते हुए किरण बेदी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार बना दिया जिससे पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में निराशा उत्पन्ना हो गई। इतना ही नहीं पार्टी ने दूसरी पार्टी से आए हुए लोगों को सिर आँखों पर बिठाया जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ-साथ जनता के बीच भी गलत संकेत गया।
मित्रों,तीसरी वजह यह रही कि पार्टी ने कई मुद्दों पर चुप्पी साधे रखी। नरेंद्र मोदी के शूट के मुद्दे पर पार्टी को तुरन्त बताना चाहिए था कि शूट गिफ्ट में मिली है और मोदी गिफ्ट में मिली चीजों की सालाना नीलामी करवाते हैं और प्राप्त राशि को सरकारी खजाने में जमा करवा देते हैं। इसी तरह पार्टी ने प्रत्येक भारतवासी के खाते में 15 लाख रुपये वाले जुमले पर भी चुप्पी साधे रखी।
मित्रों,चौथी वजह यह रही कि मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार किरण बेदी में धैर्य और वक्तृता शक्ति की कमी। पूरे चुनाव अभियान के दौरान किरण बेदी जी राजनेता की तरह दिखी ही नहीं। हमेशा ऐसा लगता रहा कि उनके पास समय की कमी है। यहाँ तक कि टीवी चैनल वालों के लिए भी उनके पास समय नहीं था। अगर उनको टीवी पर बहस नहीं करनी थी तो उनको इसकी पहल भी नहीं करनी चाहिए थी क्योंकि उनके बहस से पीछे हटने का जो संकेत जनता के बीच गया वह पार्टी के लिए काफी घातक रहा। किरण बेदी जी ने चुनाव प्रचार की शुरुआत ही विवाद से की लाला लाजपत राय की प्रतिमा को भाजपा का पट्टा पहनाकर।
मित्रों,पाँचवीं वजह यह रही कि भाजपा ने अपना विजन डॉक्यूमेंट लाने में काफी देर कर दी। उसके विजन डॉक्यूमेंट में अधिकतर वादे वही थे जो आप पार्टी के घोषणा-पत्र में पहले ही आ चुके थे।
मित्रों,छठी वजह यह रही कि दिल्ली सहित सारे देश में धीरे-धीरे जनता को लगने लगा है कि मोदी जी के केंद्र में आने के बावजूद ग्रास रूट लेवल पर स्थितियाँ कमोबेश वैसी ही और वही हैं जो 9 महीने पहले थीं। आज भी पुलिस भ्रष्ट है,नगर निगम भ्रष्ट हैं,चारों तरफ गंदगी है,भ्रष्टाचार है,बिजली और पानी की किल्लत है,न्याय विलंबित और बेहद खर्चीला है,शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति काफी खराब है,पंचायती राज भ्रष्टाचार के विकेंद्रीकरण के प्रतीक बने हुए हैं,जनवितरण प्रणाली में व्यापक भ्रष्टाचार है आदि-आदि।
मित्रों,सातवीं वजह यह रही कि आज भी भारत की जनता मुफ्तखोर है। उसको हर चीज मुफ्त में चाहिए भले ही इसके लिए देश के विकास के रथ को रोकना ही क्यों न पड़े। उसको इस बात से कुछ भी लेना-देना नहीं है कि कौन सी पार्टी देशभक्त है और कौन सी पार्टी देश विरोधी। यहाँ यह ध्यान देनेवाली बात है कि दिल्ली का वार्षिक बजट मात्र 40,000 करोड़ रुपये का होता है वही आप पार्टी ने 15 लाख करोड़ रुपये के वादे दिल्ली की जनता से कर दिए हैं। जाहिर है कि भविष्य में यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वे इन वादों को कैसे पूरा करते हैं। या फिर से पैसों की मांग के लिए धरने पर बैठ जाते हैं। सबसे ज्यादा दिलचस्प यह देखना होगा कि पूरी दिल्ली में कबसे मुफ्त में वाई-फाई की सुविधा शुरू की जाती है और कब दिल्ली में 15 लाख सीसीटीवी कैमरे लगाए जाते हैं। क्योंकि दिल्ली के ज्यादातर युवा फ्री वाई-फाई के लालच में आ गए।
मित्रों,आठवीं वजह यह रही कि कांग्रेस का पूरा वोट बैंक आम आदमी पार्टी ले उड़ी। वोट प्रतिशत के मामले में भाजपा इस बार भी वहीं है जहाँ 2013 में थी। अगर भाजपा ने जमीनी स्तर पर घर-घर जाकर चुनाव प्रचार किया होता तो निश्चित रूप से कांग्रेस के वोट बैंक में उसको भी हिस्सा मिलता लेकिन वह ऐसा नहीं कर पाई जिसका दुष्परिणाम आज हमारे सामने है।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि मोदी सरकार ने भले ही डीजल के दाम कितने भी कम क्यों न कर दिए हों उसका व्यापक असर महंगाई पर दिख नहीं रहा क्योंकि न तो बसों-टेम्पो के भाड़े ही कम हुए और न ही ट्रकों के।
मित्रों,नौवीं वजह यह रही कि भाजपा की तरफ से घर-वापसी आदि को लेकर लगातार उटपटांग बयान आते रहे। खुद नरेंद्र मोदी के दिल्ली में दिए गए चारों भाषण भी निर्विवाद नहीं रहे। भाग्यवान और अभागा जैसे जुमले सिर्फ और सिर्फ दंभ और अभिमान के परिचायक रहे। मोदी केजरीवाल को निगेटिव कहते रहे लेकिन कहीँ-न-कहीं उनका खुद का भाषण ही निगेटिव हो गया। उनको आप पार्टी की आलोचना करने के बजाए यह बताना चाहिए था कि वे दिल्ली के लिए क्या-क्या करना चाहते हैं। उनको नौ महीने में दिल्ली नगर निगम की स्थिति को सुधारना चाहिए था। फिर योगी आदित्यनाथ ने तो हद ही कर दी यह कहकर कि वे देश की प्रत्येक मस्जिद में गौरी-गणेश की प्रतिमा स्थापित करवा देंगे। कुल मिलाकर निश्चित रूप से भाजपा ने कई गलतियाँ कीं और उन गलतियों का खामियाजा उसे भुगतना ही था। देश की जनता निश्चित रूप से मोदी सरकार के काम करने की रफ्तार से संतुष्ट नहीं है। उसको और भी तेज रफ्तार में काम चाहिए और ऐसे काम चाहिए जो जमीनी स्तर पर आसानी से दिखाई दें। उसको भ्रष्टाचार से मुक्ति चाहिए,त्वरित न्याय चाहिए,सफाई चाहिए,अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी सुविधा चाहिए,रोजगार चाहिए आदि-आदि।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

29.1.15

किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल,एक आलोचनात्मक विश्लेषण

29 जनवरी,2015,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,अब दिल्ली के मतदान में कुछ ही दिन शेष रह गए हैं। दिल्ली में ऐसा पहली बार हुआ है कि यहाँ की सभी तीनों प्रमुख पार्टियों ने अपने-अपने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। जैसा कि आप जानते हैं कि दिल्ली पिछले 800 सालों से भारत की राजधानी है,भारत का दिल बनी हुई है ऐसे में दिल्ली पर कब्जे का मतलब सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं हो सकता।
मित्रों,लगभग सारे विश्लेषक यह मानकर चल रहे हैं कि इस बार दिल्ली में मुख्य मुकाबला भाजपा और आप पार्टी के बीच है। यह कहीं-न-कहीं आश्चर्यजनक है क्योंकि जो पार्टी दिल्ली को अपने हाल पर छोड़कर बनारस भाग गई थी वही पार्टी कैसे टक्कर में हो सकती है! फिर भी जो है सो है। ऐसा तो हमारे साथ अक्सर ही होता है कि हम जो चाहते हैं वैसा होता नहीं है। हम चौथे स्तंभ हैं और हम तो इसके साथ-साथ कि क्या हो रहा है बस यही बता सकते हैं कि क्या होना चाहिए। बस यही तो हमारे वश में है।
मित्रों,पिछले कई दिनों से जबसे किरण बेदी जी को भाजपा ने अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है मीडिया किरण बेदी और अरविंद केजरीवाल तथा भाजपा और आप पार्टी की तुलना करने में जुटी हुई है। मैं समझता हूँ कि दोनों दो तरह के मिजाज वाले लोग हैं इसलिए इन दोनों की तुलना हो ही नहीं सकती फिर भी जबकि दोनों आमने-सामने हैं तो तुलना तो करनी ही पड़ेगी।
मित्रों,पहले अरविंद केजरीवाल की कथनी,करनी और शख्सियत पर विचार करते हैं। अरविंद को भी किरण बेदी की ही तरह रमन मैग्सेसे पुरस्कार मिल चुका है। अरविंद विवाद पुरूष हैं क्योंकि उनको जानबूझकर विवादों में रहने में मजा आता है इसलिए वे लगातार विवादित बयान देते रहते हैं,अंट-शंट बकते रहते हैं। अरविंद आरोप लगाने में मास्टर हैं लेकिन आज तक अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाए हैं। अरविंद में एक और कमी यह है कि जब उनके ऊपर आरोप लगता है तो वे चुप्पी साध जाते हैं,न तो खंडन करते हैं और न ही मंडन। झूठ बोलने में उनको मास्टरी है। किसी के बारे में भी कुछ भी बोल दिया और जब प्रमाण मांगा गया तो कह दिया कि हमने तो आरोप लगा दिए हैं अब ये सही हैं या गलत जनता समझेगी। अरविंद चंदा किंग हैं और उनको भारतमाता के कट्टर दुश्मनों से भी चंदा लेने में कोई आपत्ति नहीं है। अरविंद कभी भी अपने किसी भी पुराने कथन पर कायम नहीं रह पाए हैं। बोलते हैं कि हम तो आम आदमी हैं जी हमें वीवीआईपी ट्रीटमेंट नहीं चाहिए लेकिन साथ ही वीवीआईपी पास की भी ईच्छा रखते हैं। अरविंद सर्वेवीर हैं। उनके पास सर्वक्षकों की एक बेहतरीन टीम है जो पहले से ही सर्वेक्षण के निष्कर्ष निर्धारित कर लेते हैं और पीछे सर्वेक्षण करते हैं। जैसे-हमने पता लगाया है जी कि हमारे 49 दिनों के शासन में भ्रष्टाचार काफी कम हो गया था,हमने सर्वे करवाया है जी कि हम 55 सीटों पर चुनाव जीतने जा रहे हैं,हमने यह सर्वे करवाया है जी,वह सर्वे करवाया है जी। अरविंद जी धरातल पर चाहे काम करें या न करें सर्वे बहुत करवाते हैं। अरविंद जी ने मीडिया में भी अच्छे दोस्त बना रखे हैं जो उनके आगे-पीछे भगत सिंह की तस्वीरें लगाकर लगातार उनको क्रांतिकारी साबित करने में जुटी रहती है। उनके क्रांतिकारी मीडिया-मित्र भी लगातार सर्वे करवाते हैं और गजब के सर्वे करवाते हैं। अभी कुछ ही दिन पहले एबीपी न्यूज कह रहा था कि दिल्ली में सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन दिल्ली के लोग मुख्यमंत्री के रूप में तो अरविंद को ही देखना चाहते हैं। यानि सरकार तो भाजपा की बनेगी लेकिन मुख्यमंत्री तो अरविंद केजरीवाल ही होंगे। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल मीडियाप्रेमी हैं,ब्लोअर की हवा हैं,परले दर्जे के हवाबाज हैं। आजतक उन्होंने सिर्फ बोला ही है किया कुछ भी नहीं है और अभी भी वे ऐसा ही करते दिख रहे हैं। मुख्यमंत्री बनकर वे बहुतकुछ कर सकते थे लेकिन उन्होंने खुद कोई काम नहीं किया सिर्फ केंद्र सरकार या विपक्ष के खिलाफ बयान देते रहे या फिर केंद्र और संसद-संविधान के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करते रहे। उनकी पार्टी में एक-से-एक कश्मीर के स्वतंत्रता-प्रेमी और राष्ट्रविरोधी तत्त्व भरे पड़े हैं।
मित्रों,अब आते है किरण बेदी जी पर। किरण बेदी ने जब जो कहा है वही किया है। किरण जी ने कभी किसी के ऊपर भी झूठे आरोप नहीं लगाए हैं न ही किरण जी अपनी झूठी प्रशंसा ही पसंद करती हैं। तभी तो महान क्रांतिकारी पत्रकार रवीश कुमार को उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की गाड़ी नहीं उठवाई थी। किरण जी कर्मठ हैं,कर्त्तव्यनिष्ठ हैं,अनुशासनप्रिय हैं और देशभक्त हैं। किरण जी के पास एक पूरा खाका है,पूरी योजना है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री बनकर वे कैसे दिल्ली के लिए काम करेंगी और दिल्ली का विकास करेंगी जो कि केजरीवाल के पास नहीं है। किरण जी ने अपने 40 साल के प्रशासनिक जीवन के द्वारा पहले ही यह साबित कर दिया है कि उनके पास अच्छा शासन व प्रशासन देने की भरपुर योग्यता है। किरण जी ने नौकरी के दौरान कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि किरण जी उस पुलिस का हिस्सा थीं जिसको हमारे देश में सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग का खिताब अता किया जाता है और फिर भी वे निष्कलंक हैं। फिर वे जिस पार्टी का हिस्सा हैं वह घोर राष्ट्रवादी पार्टी है,राष्ट्रभक्तों की पार्टी है। हाँ,मैंने पिछले तीन-चार दिनों में गौर किया है कि किरण जी में कुछ कमियाँ भी हैं। किरण जी पत्रकारों को देखकर घबरा जाती हैं और ठीक से जवाब नहीं दे पातीं जबकि उनको ऐसा नहीं करना चाहिए। किरण जी भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रेरणा लेनी चाहिए जिन्होंने लोकसभा चुनावों के दौरान अपने घोर विचारधारात्मक शत्रु चैनल एबीपी पर धमाकेदार साक्षात्कार देकर तहलका मचा दिया था। जहाँ तक दो-2 वोटर आईकार्ड होने का सवाल है तो मेरे पास भी दो-दो हैं जिनमें से एक का अब मैं कहीं भी इस्तेमाल नहीं करता। मैं भी चाहता हूँ कि एक को रद्द करवा दूँ लेकिन लालफीताशाही और दफ्तरों की बेवजह की दौड़ लगाने से भागता हूँ। अगर ऐसा करना अपराध है तो मैं भी अपराधी हूँ लेकिन क्या ऐसा नहीं होना चाहिए कि बीएलओ जाँच करके खुद ही एक को रद्द कर दे। फिर दिल्ली में तो कम-से-कम 22% वोटर आई कार्ड फर्जी हैं,एक ही फोटो पर 15-पन्द्रह आई कार्ड बने हुए हैं तो क्या इसमें भी उस तस्वीर वाले या वोटर की ही गलती है। मेरी 70 वर्षीय माँ की उम्र वोटर आईकार्ड में 98 साल दर्ज कर दी गई है,मेरे गाँव के कई पुरुषों के वोटर आईकार्ड में महिलाओं की और कई महिलाओं के वोटर आईकार्ड में पुरुषों की तस्वीरें दर्ज है,इसमें किसकी गलती है? हमारे हाजीपुर में लोग पिछले 20 सालों से रह रहे हैं और बार-बार मतदाता सूची में नाम दर्ज करने के लिए आवेदन देते हैं फिर भी उनका नाम दर्ज नहीं किया जाता,इसमें किसकी गलती है?
मित्रों,तो यह था अरविंद केजरीवाल और किरण बेदी की कथनी,करनी और शख्सियत का आलोचनात्मक विश्लेषण। अब यह आप दिल्लीवासियों पर निर्भर करता है आप किसको चुनते हैं। झूठ और अराजकता को या सत्य और सृजनात्मकता को? विवादपुरुष को या विकासस्त्री को? रायता को या विकास को? राष्ट्रविरोधी को या राष्ट्रभक्त को? निर्णय आपके अपने हाथों में है। आप ही अपनी दिल्ली के भाग्यनिर्माता हैं। क्या आप वर्ष 2013 में अपने द्वारा की गई गलती को दोहराना चाहेंगे?

(हाजीपुर टाईम्स पर प्रकाशित)

18.1.15

पीके

शहीद भगत सिंह ने कहा था ‘‘आप किसी प्रचलित विश्वास का विरोध करके देखिए लोग आपको अहंकारी कहेंगे।’’ सच ही कहा है, प्रायः लोग अपनी ‘लकीर के फकीर’ मानसिकता की परिधि से बाहर आते घबराते हैं। ऐसा इसलिए नहीं है कि वे आना नहीं चाहते बल्कि बाहर आने के पश्चात् उन्हें अन्य कोई आसरा नज़र नहीं आता या कोई अन्य मान्यता नहीं मिलती। वे स्वयं को असहाय-असहज महसूस करते हैं। और कदाचित् होते भी हैं। कारण- अज्ञानता, निर्भरता एवं भय। अज्ञानता के कारण वे निर्भर है और निर्भरता के कारण भयभीत। वे प्रायः अगुवाई करने से घबराते हैं और अगर कोई पथप्रदर्शक मिल जाए तो बीच राह में उसके अदृश्य हो, धोखा देने, जो कि मानवीय प्रवृति है, उन्हंे भयभीत कर देती है। वे ग़लत भी नहीं हैं। अक्सर ऐसी राहें जटिल तो होती ही हैं और उन पर दृढ़ रहना उससे भी अधिक कठिन होता है। बहरहाल यहाँ बात है आमिर खान की फिल्म पीके के बहिष्कार की। यह विरोध वास्तव में किसी लतीफे से कम नहीं है। बिलकुल ऐसा, मानो एक दृृृष्टिबाधित कह रहा हो कि सूरज लाल नहीं काला है। वास्तव में उसके लिए सूरज काला ही है और यह कहना उसकी विवशता। परन्तु जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं वे तो विवश नहीं हैं! फिर ये कैसी मानसिकता है? वस्तुतः जिन मुद्दों का विरोध किया जा रहा है वे तो फिल्म का हिस्सा भी नहीं है। विरोध है कि फिल्म हिन्दु विरोधी है और हिन्दु देवी-देवताओं का अपमान करती है। जबकि फिल्म में प्रत्येक धर्म के ‘‘ठेकेदारों’’ का विरोध किया गया है, न कि किसी धर्म विशेष का। यह फिल्म अंधविश्वास और धर्म का धंधा करने वाले दलालों को केन्द्रित करके बनाई गई है फिर वे चाहे किसी भी धर्म के हों। सच तो यह है कि हम सभी इन ठेकेदारों के हाथों की कठपुतली बनते जा रहे हैं। इन्हें अपनी दुकान के रहस्य खुलते प्रतीत हुए तो नचा दिया जन-समूह को विरोध करने के लिए। ये पारंगत हैं मानसिक पराधीनता का दुरुपयोग करने में। क्या ऐसा नहीं है? इस बात का दावा किया जा सकता है कि जो लोग इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं उनमें से अधिकतर ने तो यह फिल्म देखी भी नहीं होगी। तो भला क्यों कर रहे हैं विरोध? क्योंकि यह फिल्म एक मुस्लिम व्यक्ति ने बनाई है! यह तो कोई मुख्य वजह नहीं हो सकती! बॉलीवुड में हिन्दी फिल्मों का निर्माण किया जाता है, टॉलीवुड में तमिल एवं इसी प्रकार अन्य। कहीं भी मुस्लिमवुड का अस्तित्व नहीं है और न ही इस प्रकार धर्मविशेष का अस्तित्व होना चाहिए। तो भला इस फिल्म को धर्म विशेष के लिए कैसे बना सकते थे? किसी भी विषय का सामान्यीकरण करके ही प्रस्तुत किया जाना विषय के साथ न्याय करना है। एक ओर तो हम धर्म-निरपेक्षता की बात करते हैं। ‘‘हम सब भारतीय हैं’’, के नारे लगाते हैं। दूसरी ओर किसी भी अनावश्यक विषय को धर्म-जाति से जोड़ देते हैं। किसी भी निर्माण के पीछे छुपी धारणा के स्थान पर निर्माता के धर्म को अधिक महत्त्व कैसे दिया जा सकता है? निर्माता द्वारा परोसी गई अश्लीलता दर्शकों एवं फिल्म की माँग के नाम पर सरलता से स्वीकार कर ली जाती है परन्तु वास्तविक एवं उपयोगी तथ्यों का विरोध मात्र इस आधार पर किया जाता है कि वे किसी धर्म से जुड़े हैं। निश्चित रूप से यह भावी पीढ़ी को भ्रमित करने का घृणित प्रयास है तथा सामाजिक दृष्टि से घातक भी है। इस फिल्म का एक बहुत सुंदर दृृश्य हमारी संकुचित मानसिकता एवं कुतर्कों पर कटाक्ष करता है। पीके पर आरोप था कि वह ईश्वर को नहीं मानता। उससे पूछा गया कि तुम ईश्वर को नहीं मानते? उसने कहा मानता हूँ। बिलकुल मानता हूँ। मगर उस ईश्वर को मानता हँू जिसने हम सबको बनाया न कि जिसे आपने बनाया। सही ही तो कहा पीके ने। मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे-चर्च इत्यादि में हमने अपने-अपने स्वार्थानुसार ईश्वर बनाए और अपनी-अपनी आवश्यकतानुसार उन्हें पूजते हैं। हममें से ज़्यादातर लोग तो ईश्वर को इसलिए पूजते हैं क्योंकि उनके पूर्वज उनकी पूजा करते आ रहे हैं। यदि उनसे पूछा जाए कि उनके ईश्वर का इतिहास क्या है या उनके माता-पिता कौन थे तो वे इससे अनभिज्ञ है, पूर्णतः निरुत्तर हैं। आज की युवा पीढ़ी तो इतनी आधुनिक हो गई है कि उन्हें होली-दिवाली जैसे मुख्य त्योहारों को मनाने के कारणांे तक का ज्ञान नहीं है। हाँ! लेकिन वे मंदिर अवश्य जाते हैं क्योंकि उनके भगवान जो वहाँ हैं। हम सभी जानते हैं कि मंदिरों में बैठकर किस प्रकार की चर्चाएँ की जाती हैं और प्रत्येक व्यक्ति इस बात की आलोचना भी बहुत ऊँची आवाज़ में करता है परन्तु वे सभी अवसर पाते ही स्वयं भी यही सब करते हैं। सही कहा जाता है कि भाषण दूसरों को देने के लिए ही होते हैं। ख़ैर बात यह है कि क्या यह सच्ची श्रद्धा है? या मात्र दिखावा या आत्मसंतुष्टि? यहाँ पुन शहीद भगत सिंह की बात प्रासांगिक लगती है कि प्रचलन का विरोध सरलता से स्वीकार्य नहीं होता। परन्तु यह भी सत्य है कि प्रचलित कितनी ही प्रथाएँ अपनी निरंकुशता के कारण ही समाप्त होती रही हैं और आगे भी होती रहेंगी। सती प्रथा हो या विधवा विवाह प्रत्येक प्रथा के प्रति होने वाले विरोध के भी विरोध में लोग मान्यताओें और धार्मिक भावनाओं के आहत होने का राग अलापते आए हैं परन्तु अन्ततः उन्हें समाप्त होना ही पड़ा। आज समाज के बुद्धिजीवी इन विषयों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चर्चा का विषय बना रहे हैं। उनका आम आदमी को इन भ्रमजालों से मुक्त करने का प्रयास सरहानीय है। वास्तव में आम आदमी स्वयं भी कहीं न कहीं इन समस्त पाखंडों से उकता गया है। वह स्वयं भी इन निरर्थक बंधनों से मुक्त होना चाहता है परन्तु साहस नहीं कर पाता। 1947 में भारत स्वतंत्र भले ही हो गया हो परन्तु मानसिक स्वतंत्रता से अभी भी वह कोसों दूर है। इस पराधीनता के अधीन रहकर उन्नति संभव नहीं और यह भौतिक परतंत्रता से कहीं अधिक घातक भी है। एक सशक्त राष्ट्र के रूप में विश्वपटल स्वयं को स्थापित करने के लिए भारत को एक स्वतंत्र चिंतक होना अति आवश्यक है।

12.1.15

वैतनिक प्रभाव

वेतन मिलने के कुछ दिन तक नौकरी पेशा पूंजीवादी रहता है, महीने के अंत तक वह समाजवादी होने लगता है और जो वैतनिक प्रताड़ना से परे है, वह हमेशा मार्क्सवादी बना रहता है।
- सखाजी

7.1.15

मेडिकल कालेज को लेकर प्रदेश सरकार के जिम्मेदार लोगों के अलग अलग बयानों से राजनीति गर्मायी
 सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने एक प्रश्न पूछा था। इस तारांकित प्रश्न क्र. 515 का सदन में जवाब 12 दिसम्बर 2014 को प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दिया था। अपना पूरक प्रश्न पूछने के पहले मुनमुन राय ने कहा कि,“ माननीय अध्यक्ष महोदय आपकी मार्फत मैं माननीय मंत्री जी से इस प्रश्न का जवाब मांगने से पूर्व  माननीय मुख्यमंत्री जी और माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी को बधाई दूंगा कि हमारे जिले में पहली बार एक बड़ा काम मेडिकल कालेज का आपके माध्यम से सरकार के माध्यम से होने जा रहा है।”छिंदवाड़ा जिले के विधायक सोहनलाल बाल्मीक ने कहा कि छंदवाड़ा जिले में मेडिकल कालेज पहले स्वीकृत हुआ था और सरकार की गलत नीतियों के कारण मेडिकल कालेज सिवनी में परिवर्तित किया जा रहा है।”जब 2013 में छिंदवाड़ा और शिवपुरी में केन्द्र द्वारा पोषित मेडिकल कालेज खुलने खोले जाने की घोषणा हुयी थी तब प्रदेश सरकार ने इस बात का खुलासा क्यों नहीं किया था कि प्रदेश सरकार ने प्रस्ताव में सिवनी और सतना प्रस्तावित किया था जिसे तत्कालीन केन्द्र सरकार ने बदल कर छिंदवाड़ा और शिवपुरी कर दिया जहां से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद थे। जिले में हुये पहले जिला पंचायत चुनाव में भाजपा की गोमती ठाकुर वार्ड क्रं 8 से चुनाव जीती थी। तब से लेकर पिछले चुनाव तक वे लगातार इसी वार्ड से निर्वाचित होते आयीं है। एक बार पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़वाया था लेकिन वे हार गयीं थीं। 
केन्द्र सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेज से कब छटेगी धुंध?ः-शीतकालीन सत्र में विधानसभा में जिला चिकित्सालय की स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर सिवनी के विधायक दिनेश मुनमुन राय ने एक प्रश्न पूछा था। इस तारांकित प्रश्न क्र. 515 का सदन में जवाब 12 दिसम्बर 2014 को प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने दिया था। अपना पूरक प्रश्न पूछने के पहले मुनमुन राय ने कहा कि,“ माननीय अध्यक्ष महोदय आपकी मार्फत मैं माननीय मंत्री जी से इस प्रश्न का जवाब मांगने से पूर्व  माननीय मुख्यमंत्री जी और माननीय स्वास्थ्य मंत्री जी को बधाई दूंगा कि हमारे जिले में पहली बार एक बड़ा काम मेडिकल कालेज का आपके माध्यम से सरकार के माध्यम से होने जा रहा है।” मुनमुन राय के इतना कहते ही छिंदवाड़ा जिले के विधायक सोहनलाल बाल्मीक ने कहा कि,“अध्यक्ष महोदय यह विषय के बाहर की बात है। मुझे बोलने का मौका नहीं दिया जा रहा है जो बात हमको कहनी चाहिये। मेडीकल कालेज की बात मैंने उठाई हैं। छिंदवाड़ा जिले में मेडिकल कालेज पहले स्वीकृत हुआ था और सरकार की गलत नीतियों के कारण मेडिकल कालेज सिवनी में परिवर्तित किया जा रहा है।” इस पर व्यवधान हुआ। अध्यक्ष महोदय ने कहा कि,“ आप प्रश्न कर दें। यह उनका प्रश्न है। यह आपका प्रश्न नहीं था। आपका प्रश्न था क्या?” इस पर सोहन लाल बाल्मीक ने कहा कि,“ उनकी बधायी का हम विरोध करेंगें। मुनमुन भाई यह छिंदवाड़ा में सेंक्शन था माननीय कमलनाथ के मार्फत ” इस पर फिर व्यवधान हुआ। और चर्चा फिर मूल प्रश्न पर चालू हो गयी। विधानसभा की इस कार्यवाही विवरण में यह स्पष्ट हो गया है कि विधायक मुनमुन राय ने सदन में मेडिकल कालेज के लिये सिर्फ मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को बधायी भर दी थी। उनकी इस बधायी से ही सदन में विवाद हुआ और छिंदवाड़ा और सिवनी को लेकर एक सवाल खड़ा हो गया। लेकिन एक बात यह भी स्पष्ट हो गयी कि सदन में मौजूद मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री ने इस मामले में चुप्पी साधे रहे । जबकि छिंदवाड़ा की सभा में मुख्यमंत्री ने यह दहाड़ लगायी कि मेडिकल कालेज छिंदवाड़ा में ही खुलेगा और उनके रहते कोई भी माई का लाल छिंदवाड़ा से उसका हक नहीं छीन सकता।  उन्होंने यह तक कह डाला कि यह अफवाह ना जाने कौन फैला रहा है । जबकि प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री ने अपना रिपोर्ट कार्ड पेश करते समय प्रेस को यह बताया था कि प्रदेश सरकार का मूल प्रस्ताव सिवनी और सतना में केन्द्रीय सरकार द्वारा पोषित मेडिकल कालेज खोले जायेंगें जिसे तत्कालीन यू.पी.ए. सरकार ने बदल कर छिंदवाड़ा और शिवपुरी कर दिया था। लेकिन ये कालेज सतना और सिवनी में ही खुलेंगें। छिंदवाड़ा के कलेक्टर ने मुख्यमंत्री के छिंदवाड़ा प्रवास के पूर्व प्रेस कांफ्रेंस लेकर यह कहा कि मेडिकल कालेज छिंदवाड़ा में ही खुलेगा। इसमें कोई भ्रम नहीं हैं। प्रदेश सरकार के जिम्मेदार लोगों के द्वारा दिये गये अलग अलग बयानों से छिंदवाड़ा और सिवनी के राजनैतिक क्षेत्रों में हडकंप मच गया और आंदोलन तथा बयानबाजी होने लगी। इन सब बातों से एक सवाल यह सामने आता है कि जब 2013 में छिंदवाड़ा और शिवपुरी में केन्द्र द्वारा पोषित मेडिकल कालेज खुलने खोले जाने की घोषणा हुयी थी तब प्रदेश सरकार ने इस बात का खुलासा क्यों नहीं किया था कि प्रदेश सरकार ने प्रस्ताव में सिवनी और सतना प्रस्तावित किया था जिसे तत्कालीन केन्द्र सरकार ने बदल कर छिंदवाड़ा और शिवपुरी कर दिया जहां से केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया सांसद थे। ऐसे में यह उठना स्वभाविक है कि क्या इस स्थान परिवर्तन में प्रदेश की भाजपा सरकार और उसके मुखिया की भी सहमति थी? विधानसभा में सिवनी के लिये बधायी स्वीकार करने वाले शिवराज सिंह की छिंदवाड़ा की सभा में लगायी गयी दहाड़ क्या नगर निगम के होने वाले चुनाव के संबंध में थी? इन तमाम बातों से ऐसा लगता है कि हमेशा सिवनी के साथ छल करने वाली प्रदेश सरकार और उसके मुखिया शिवराज सिंह जिले की भोली भाली जनता की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं। ऐसी ही थोथी घोषणाओं के चलते विस चुनाव में भाजपा का मात्र एक विधायक ही जीत पाया जबकि पिछली विस में भाजपा के तीन विधायक थे। यदि ऐसा ही चलते रहा तो जिले में भाजपा का सूपड़ा साफ होने से कोई नहीं रोक पायेगा। 
गामती ठाकुर की उपेक्षा सियासी हल्कों हुयी चर्चित:-मध्यप्रदेश में 1994 से तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने पंचायती राज लागू किया था। देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा संविधान में संशोधन के बाद प्रदेश में पंचायती राज लागू करने वाला पहला प्रदेश मध्यप्रदेश था। जिले में हुये पहले जिला पंचायत चुनाव में भाजपा की गोमती ठाकुर वार्ड क्रं 8 से चुनाव जीती थी। तब से लेकर पिछले चुनाव तक वे लगातार इसी वार्ड से निर्वाचित होते आयीं है। एक बार पार्टी ने उन्हें अध्यक्ष पद का चुनाव भी लड़वाया था लेकिन वे हार गयीं थीं। इस बार भाजपा ने उनके वार्ड से उन्हें उम्मीदवार ना बना कर माया ठाकरे को अपना समर्थित उम्मीदवार बनाया है। लेकिन गोमती ठाकुर भी फिर से पांचवी बार इसी वार्ड से चुनाव लड़ रहीं है। इससे नाराज होकर भाजपा नेतृत्व ने उनसे जिला महिला मोर्चे के अध्यक्ष पद से स्तीफा ले लिया और आनन फानन में उसे मंजूर भी कर लिया। भाजपा की अंदरूनी राजनीति जानने वालों का कहना है कि चूंकि इस बार जिला पंचायत अध्यक्ष का पद महिला अनारक्षित हुआ है इसलिये सालों से अध्यक्ष बनने की लालसा रखने वाली गोमती ठाकुर को दौड़ से बाहर करने के लिये स्थानीय भाजपायी गुटबंदी के चलते गोमती ठाकुर को भाजपा ने अपना प्रत्याशी नहीं बनाया है। यदि वे प्रत्याशी बन कर जीत कर आतीं तो ना केवल जिले में यह रिकार्ड बनता ब्लकि भाजपा में भी सबसे अनुभवी सदस्य वही होतीं और उनके दावे को दरकिनार करना आसान नहीं होता। इसी के चलतें ये सब सियासी चाले चलीं गयी है। यहां यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि श्रीमती गोमती ठाकुर भाजपा की ना केवल वरिष्ठ सक्रिय महिला नेत्री रहीं हैं वरन जिला भाजपा की महामंत्री सहित कई महत्वपूर्ण पदों की जवाबदारी भी निभा चुकीं हैं। ऐसे में उनकी उपेक्षा किया जाना सियासी हल्कों में चर्चित हैं। “मुसाफिर” 
दर्पण झूठ ना बोले, सिवन
6 जनवरी 2015 से साभार  




1.1.15

नववर्ष में सब अमंगल दूर हो.


बीते वर्ष बिहार में राजग गठबंधन का टूटना अफसोसजनक रहा. अहंकार राज्यहित पर भारी पड़ा. बिहार का भविष्य नीच बिहारी नेताओं ने बर्बाद किया है. शिव प्रकाश राय जी ने बतौर One Man Army राज्य में कई घोटालों का उद्भेदन किया और एक सच्चे सामाजिक कार्यकर्ता की भांति अनवरत जूझते रहे हैं, वर्तमान में ऐसे लोगों की जरुरत है, भयवश ही सही तंत्र ऐसे जुनूनी लोगों की वजह से कुछ सही दिशा में काम कर भी देता है. नागरिक अधिकार मंच, बिहार के माध्यम से उन्होंने उच्च न्यायालय में कई जनहित याचिकाएं दायर कर रखी हैं, जिससे गड़बड़ी करनेवालों की नींद हराम है, बहुत सारे मामले अभी पाईपलाईन में हैं. बिहार जनशिकायत निवारण प्रणाली www.bpgrs.in पर दर्ज शिकायतों का कोई संज्ञान नहीं लिया जाता, उम्मीद है नववर्ष में इसे उपयोगी बनाया जाएगा. बिहार राज्य खाद्य निगम की गलत धान-खरीद नीतियों के कारण राज्य सरकार को भी अत्यधिक राजस्व की क्षति हुई है और राज्य में राईस मिल उद्योग भी पूरी तरह बर्बाद हो गया. नए साल में किसानों से धान-खरीद की प्रक्रिया में उम्मीद है सुधार किया जाएगा. जजों की नियुक्ति हेतु केंद्र सरकार द्वारा कॉलेजियम सिस्टम के स्थान पर न्यायिक आयोग के गठन का फैसला काबिले तारीफ़ और साहसिक कदम है. प्रधानमंत्री जी का स्वच्छ भारत अभियान जन-जागरूकता की दिशा में शानदार पहल है, इस कार्यक्रम को शुरू करने हेतु वे बधाई के पात्र हैं. मनरेगा, शिक्षा, स्वास्थ्य, समेकित बाल-विकास परियोजना, पीडीएस ये सब जनता के धन को लूटने के कार्यक्रम हैं और इनका जमीनी स्तर पर कहीं कोई समुचित क्रियान्वयन नहीं हो रहा. इन सब योजनाओं में सुधार की भी कोई गुंजाईश नहीं सबको बंद कर देना चाहिए और बिना किसी के दबाव में आए इन्हें निजी हाथों में सौंप देना चाहिए. राज्य सरकार की मुख्यमंत्री साईकिल योजना का उद्देश्य सफल रहा है और यह बालिकाओं में आत्मविश्वास जगाने का काम किया है, बाकी छात्रवृत्ति, पोशाक-राशि इत्यादि एक तरह से वोट के लिए नकदी बाँटने जैसा है. यह सरकारी विद्यालयों में कलह का कारण बना हुआ है. मध्याह्न भोजन योजना तो किसी सिरफिरे के दिमाग की उपज है, जिसने भी यह योजना बनाई है वह अवश्य ही चाहता होगा कि गरीबों के बच्चे न पढ़ें. आपलोग बतायें अमीरों के बच्चों के लिए जो टॉप क्लास के स्कूल हैं उनमें मध्याह्न भोजन योजना का प्रावधान है ? अगर उद्देश्य संतुलित भोजन देना है तो बच्चे की माँ को इससे संबंधित राशि और अनाज उपलब्ध कराई जानी चाहिए थी. मध्याह्न भोजन योजना के कारण ही बिहार में गंडामन धर्माशती जैसे काण्ड हुए. भूमि की कमी को देखते हुए इंदिरा आवास योजना के लाभार्थियों का ग्रुप बनाकर पेयजल एवं शौचालय संपन्न बहुमंजिले भवन बनाकर उन्हें आवंटित करना चाहिए न कि उनके खाते में सत्तर हजार रूपए डाल दिए और निश्चिन्त हो गए. मेरे गाँव में लगभग एक करोड़ रूपए से अधिक के सरकारी भवन का निर्माण हुआ है पर उनका दस साल से भी अधिक समय से कोई उपयोग नहीं हुआ और अब वे खस्ताहाल उपयोग लायक हैं भी नहीं. आप राज्य और देश स्तर पर इस तरह के फिजूलखर्ची का अनुमान लगा सकते हैं. यह सब इसलिए होता है कि विभिन्न विभागों के बीच सामंजस्य का घोर अभाव है. भवन निर्माण विभाग ने पशु अस्पताल का निर्माण करवा दिया पर उसमें बैठने के लिए सरकार के पास डॉक्टर और कर्मियों का अभाव है. पहले डॉक्टर की व्यवस्था करते तब भवन बनाते, जनता के धन का इस तरह निर्लज्जता और निर्ममता से बंदरबांट करते हो ! नीचे वाला फोटो जो देख रहे हैं इसे वेबरत्न अवार्ड मिला हुआ है, पर जरा इनाम पानेवालों से पूछ लीजिए कि इस पर कितने मामले दर्ज हुए और उसमें से कितने मामलों पर जांचोपरांत कार्रवाई हुई, और कितने मामलों का ATL Upload किया गया. सब ढाक के तीन पात हैं. उम्मीद है नववर्ष में इन सारी भडासों को दूर करने हेतु हमलोग प्रयासरत होंगे और सरकार भी अधिक संवेदनशील बनेगी.

24.12.14

माँ भारती के दो सपूत महामना पंडित मदनमोहन मालवीय जी और महामानव पंडित अटलबिहारी वाजपेयी जी को भारतरत्न, इन दो ब्रह्माण्ड रत्नो के प्रति असीम भारतीय कृतज्ञता का प्रकटीकरण है ! शिक्षा, साहित्य, धर्म और राजनीति के साथ सनातन संस्कृति पोषक इन दोनों पुरोधाओं का सम्मान कर आज प्रत्येक भारतीय अपने आप को गौरवान्वित और सम्मानित अनुभव कर रहा है ! हार्दिक बधाई , अभिनन्दन !

17.12.14

आतंक का कोई मजहब नहीं होता

-नितिन शर्मा ‘सबरंगी’
पाकिस्तान के पेशावर स्थित आर्मी स्कूल में जिस क्रूर अंदाज में बेरहम आतंकवादियों ने मासूम बच्चों को छलनी किया उससे इंसानियत शर्मसार है। चार घंटे में आतंकियों ने लाशों का अंबार लगा दिया। जो सामने आया उसे भून डाला। पूरी दुनिया में घटना की निंदा हो रही है। सबसे बड़ा सवाल यह कि पाकिस्तान में ऐसी नौबत आयी क्यों? आतंकियों को पाला किसने? दरअसल हकीकत यह है कि पाकिस्तान अब खुद अपनी ही आग में झुलस रहा है। आतंक की हांडी में जिन कीड़ों को उसने पाला वही अब कुलबुला रहे हैं। कांटों के पेड़ लगाकर कभी फूल नहीं खिला करते। उम्मीद है पाकिस्तान को समझ आ रहा होगा कि आतंकियों का कोई मजहब नहीं होता। कांटों के पेड़ लगाकर उस पर कभी फूल नहीं खिला करते। अब पाकिस्तान खुद आतंक की आग में झुलस रहा है। आतंक का एक ही मजहब होता है नफरत, तबाही, हिंसा और मौत। मिया नवाज शरीफ कहतें हैं कि अब आतंकवाद से लड़ेंगे और पहले पूरी दुनिया बोल रही थी तब समझ नहीं आया? आतंक के खिलाफ पाकिस्तान ने आवाज उठाई होती, तो मासूमों की जान नहीं जाती। दर्जनों परिवारों के पास अब दर्द और आंसुओं के सैलाब हैं। उनका क्या गुनाह था? मासूमों की कब्रों परा चढ़कर पता नहीं आतंकी कौन सी जन्नत में जाएंगे? चरमपंथी हमले पाकिस्तान में होते रहे हैं। आतंक का जड़ से सफाया जरूरी है वरना यह आग ओर भी झुलसायेगी। इंसानियत का वजूद भी पूरी तरह खो जायेगा।

15.12.14

आचार्य तुलसी के अप्रकाशित फोटो की एलबम नुमा बूक

मान्यवर जी,
आचार्य तुलसी जन्म शताब्दी वर्ष में  आचार्य तुलसी के अप्रकाशित फोटो की एलबम नुमा बूक का प्रकाशन  हुआ है। देश के जाने माने एवं पदम्  श्री अवार्ड से सम्मानित फोटोग्राफर रघु राय के इस फोटो एलबम बूक की प्रस्तावना दलाई लामा जी द्वारा लिखी गयी है।   यह एक   ऐतिहासिक कृति है, जिसे पीढ़ियों तक सुरक्षित व संग्रहित किया जा सकता है, साथ ही आप अपने परिजनों, मित्रों को भेंट भी दे सकते हैं।यह एलबम विक्रय हेतु नैतिकता के शक्तिपीठ ,गंगाशहर  पर उपलब्ध है। शीघ्र संपर्क करें। मो. 9414139192 . 01512270396
धन्यवाद।

25.11.14

45वें भारत का अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की शुरूआत
मुख्य अतिथि अमिताभ बच्चन ने किया दीप प्रज्जवलित
- रविकुमार बाबुल


गुजरे जमाने की यादें ताजा करने वाली रोमांचकारी प्रस्‍तुतियों के बीच 45वें भारत अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की रंगारंग शुरूआत समारोह के मुख्य अतिथि और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने श्‍यामा प्रसाद मुखर्जी स्‍टेडियम, बम्‍बोलिम में दीप प्रज्जवलित कर किया ।
इस अवसर पर अमिताभ बच्चन का साथ देते हुए गोवा की राज्‍यपाल श्रीमती मृदुला सिन्‍हा, केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरूण जेटली, रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, गोवा के मुख्‍यमंत्री लक्ष्‍मीकांत पार्सेकर, सूचना एवं प्रसारण राज्‍य मंत्री राज्‍यवर्धन सिंह राठौर, प्रतिष्ठित अभिनेता रजनीकांत, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में सचिव बिमल जुल्‍का ने भी दीप प्रज्‍ज्‍वलित किया। मंच पर अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍यूरी के अध्‍यक्ष सलाओमिरइदजियाक, झांग जियानया, नाडिया द्रेष्टि, मैरी ब्रेनर और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री सीमा बिश्‍वास ने भी उपस्थिति दर्ज की। मंच का संचालन अभिनेता अनुपम खेर और अभिनेत्री रवीना टंडन ने किया।
अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म महोत्‍सव के मुख्‍य अतिथि अमिताभ बच्‍चन ने अपने संबोधन में विभिन्‍न कालखंडों में छा जाने वाली थीम पर बनी उत्‍कृष्‍ट फिल्‍मों का जिक्र करते हुए भारतीय सिनेमा के आकर्षक विकास पर रोशनी डाली। श्री बच्‍चन ने भारत की विविधिता एवं अनेकता के संदर्भ में भारतीय सिनेमा की भूमिका एवं प्रासंगिकता को भी रेखांकित किया। इस अवसर पर समारोह के मुख्‍य अतिथि अमिताभ बच्‍चन और केन्‍द्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अरुण जेटली ने भारतीय सिनेमा में उल्‍लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित अभिनेता रजनीकांत को भारतीय फिल्‍म व्यक्तित्व के लिए शताब्‍दी सम्मान प्रदान किया। सम्मान ग्रहण करते हुए उन्‍होंने इसे अपने निर्माताओं, निर्देशकों, सह अभिनेताओं, टेक्‍नीशियनों और प्रशंसकों को समर्पित किया। इस अदभुत और प्रसिद्ध अभिनेता ने रूपहले पर्दे पर सिनेमा दर्शकों को हर प्रकार से लुभाया है। अपने स्‍वयं के प्रदर्शन को पर्दे पर देखकर वे भावुक हो उठे। इस अवसर पर उन्हें दस लाख रुपये, प्रमाणपत्र और रजत मयूर पदक प्रदान किया गया। भारतीय सिनेमा के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर पिछले साल से यह सम्मान आरम्भ किया गया था।
उदघाटन समारोह के दौरान महोत्‍सव की अंतर्राष्‍ट्रीय ज्‍यूरी का भी परिचय सिने प्रेमियों से कराया गया। जिनमें चेयरमैन श्री सलाओमिरइदजियाक (पोलैंड के जाने-माने फिल्‍म निर्माता), श्री झांग जियानया (चीन के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्देशक), नाडिया द्रेष्टि (स्विट्जरलैंड के मशहूर फिल्‍म निर्माता व अंतर्राष्‍ट्रीय लोकार्नो फिल्‍म महोत्‍सव के प्रमुख), मैरी ब्रेनर (जाने-माने अमेरिकी फिल्‍म आलोचक) और प्रसिद्ध भारतीय अभिनेत्री सीमा बिश्‍वास शामिल थीं।
श्वेत-श्याम सिनेमा युग की ख्याति प्राप्त अभिनेत्री और नृत्‍यांगना पद्मिनी की भतीजी शोभना पिल्‍लई की अपने समूह के साथ आकर्षक प्रस्‍तुतियों ने दर्शकों के स्‍मृति पटल पर भारतीय सिनेमा की प्रसिद्ध नृत्‍य प्रस्‍तुतियों की यादें ताजा कर दीं, खासकर  ‘होठों पे ऐसी बात में दबा के चली आई’ और ‘पिया तो से नैना लागे रे’ जैसे नृत्‍यों ने फिजा में स्‍वप्‍निल जादू बिखेरते हुए उपस्थित अतिथियों को मंत्रमुग्‍ध कर दिया। इस अवसर पर उपस्थित अन्‍य जानी-मानी हस्तियों में सतीश कौशिक, मनोज बाजपेयी और रूपा गांगुली भी शामिल हुये।
उदघाटन समारोह के दौरान स्‍वच्‍छ भारत को प्रोत्‍साहन देने वाली फिल्‍म के अलावा महोत्‍सव की सिग्‍नेचर फिल्‍म भी दिखाई गई। सिग्‍नेचर फिल्‍म का निर्देशन शाजी एन. करुण ने किया है जो भारत के एक जाने-माने फिल्‍म निर्माता हैं। ईरान के प्रसिद्ध फिल्‍म निर्माता मोहसेन मखमलबफ द्वारा निर्देशित की गई ‘द प्रेसिडेंट’ महोत्‍सव की शुरुआती फिल्‍म थी।
गोवा में आयोजित 11 दिवसीय 45वें भारत अंतर्राष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के दौरान 79 देशों की 178 फिल्‍में दिखाई जायेंगी। इन फिल्‍मों को विभिन्‍न श्रेणियों में बांटा गया है। विश्‍व सिनेमा (61 फिल्‍में), मास्‍टर-स्‍ट्रोक्‍स ( 11 फिल्‍में), महोत्‍सव बहुरूपदर्शक (फेस्टिवल केलिडोस्‍कोप) (20 फिल्में), सोल ऑफ एशिया (07 फिल्‍में), डाक्‍यूमेंट्री (06 फिल्‍में), एनीमेटेड फिल्‍में (06 फिल्‍में) इन श्रेणियों में शामिल हैं। इसके अलावा भारतीय पैनोरमा वर्ग में 26 फीचर और 15 गैर फीचर फिल्‍में होंगी। पूर्वोत्‍तर महोत्‍सव का फोकस क्षेत्र है, इसलिए आईएफएफआई 2014 में भारत के पूर्वोत्‍तर क्षेत्र की 07 फिल्‍में प्रदर्शित की जाएंगी। क्षेत्रीय सिनेमा भी महोत्‍सव का महत्‍वपूर्ण अंग होगा। इस वर्ष के समारोह में गुलजार और जानू बरूआ पर पुनरावलोकन वर्ग (रिट्रोस्‍पेक्टिव सेक्‍शंस), रिचर्ड एटनबरो, रॉबिन विलियम्‍स, ज़ोहरा सहगल, सुचित्रा सेन पर विशेष समर्पित फिल्‍में और फारूख शेख को विशेष श्रद्धाजंलि अन्‍य आकर्षण होंगे। नृत्‍य पर केंद्रित फिल्‍मों का एक विशेष वर्ग होगा तथा व्‍यक्तित्‍व आधारित पुनरावलोकन (रिट्रोस्‍पेक्टिव) और मास्‍टर क्‍लासेज/कार्यशालाएं भी आईएफएफआई 2014 का हिस्‍सा होंगे।
आम सिनेप्रेमियों के लिए ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर मुफ्त में भारतीय फिल्‍मों की ओपन एयर स्‍क्रीनिंग इस महोत्‍सव का नया आकर्षण है। फिल्‍मों के प्रथम विश्‍व प्रदर्शन के अलावा आईएफएफआई 2014 के दौरान प्रतिनिधियों के लिए फिल्‍म बाजार, 3डी फिल्‍में, भोज, मास्‍टर क्‍लासेज, पैनल परिचर्चा व स्‍टॉल्‍स और ओपन एयर स्‍क्रीनिंग जैसी रंगपटल की गतिविधियां संचालित हुईं ।

20.11.14

कबीरपंथियों के पाखंड की पराकाष्ठा हैं रामपाल

20 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,साहेब बंदगी!
कबीर कहते हैं कि
कबीरा जब हम पैदा हुए जग हँसे हम रोये।
ऐसी करनी कर चलो हम हँसें जग रोये।
मगर कबीर के अनुयायी अब जो कर रहे हैं उसको देखकर दुनिया हँस भी रही है और रो भी रही है। हँस रही है यह देखकर कि कबीर ने क्या कहा था और अनुयायी क्या कर रहे हैं और रो रही है उनके नैतिक पतन को देखकर। यह देखकर कि जो कबीर आजीवन पाखंड और पाखंडवाद से लड़ते रहे उनके ही नाम पर उनके कथित भक्तों ने यह कैसा पाखंड का साम्राज्य खड़ा कर दिया!
मित्रों,मैं वर्षों पहले अपने एक आलेख कबीर के नाम पर पाखंड का साम्राज्य में कबीर के नाम पर फैले पाखंड के साम्राज्य पर काफी विस्तार से लिख चुका हूँ लेकिन मैं जहाँ तक समझता था कबीर के नाम पर धंधा करनेवाले उससे कहीं ज्यादा ठग,चोर,फरेबी,पाखंडी और मानवशत्रु निकले। अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह बाबा रामपाल कैसा कबीरपंथी है और किस तरह से कबीरपंथी है। कबीर ने तो अपने प्रशंसकों को इंसान बनने और इंसानों के साथ इंसानों की तरह पेश आने की शिक्षा दी थी फिर यह रामपाल भगवान कैसे बन गया? पूरे आश्रम में जमीन के भीतर बने सुरंगों के माध्यम से कहीं भी प्रकट हो जाना,विज्ञान के चमत्कारों के माध्यम से हवा में चलना,लेजर की सहायता से अपने चारों ओर आभामंडल बनाना और सिंहासन सहित आसमान से उतरना आदि के माध्यम से रामपाल तो क्या कोई भी भगवान बन सकता है।
मित्रों,हमें इस बात को भी ध्यान में रखना पड़ेगा कि कबीरपंथ के अधिकतर अनुयायी गरीब और दलित-पिछड़ी जातियों से आते हैं जिनके खाने के भी लाले पड़े होते हैं। स्वाभाविक रूप से उनमें से ज्यादातर अनपढ़ होते हैं और उनमें इतनी बुद्धि नहीं होती कि वे रामपाल के चमत्कारों को तर्क और विज्ञान की कसौटी पर कस सकें। रामपाल ने गिरफ्तारी से बचने के लिए जो मानव-शील्ड बनाई उनमें से अधिकतर लोग इसी तरह के थे।
मित्रों,विज्ञान और संचार-क्रांति का उपयोग जहाँ इस तरह की ठगविद्या के भंडाभोड़ के लिए होना चाहिए वहीं दुर्भाग्यवश उसका उपयोग ठगने के लिए किया जा रहा है। दिनभर टीवी चैनलों पर ऐसे बाबाओं से संबंधित कार्यक्रम आते रहते हैं जिनमें से कोई जन्तर बेच रहा होता है तो कोई भविष्य बतानेवाली किताब और कोई तो अपनी कृपा भी। और आश्चर्य की बात तो यह है कि 21वीं सदी में भी इन बाबाओं की दुकानें धड़ल्ले से चल रही हैं।
मित्रों,रहा बाबा रामपाल का सवाल तो यह आदमी संत या अवतार तो क्या आदमी कहलाने के लायक भी नहीं है। जो व्यक्ति आदमी की जान का इस्तेमाल अपने को जेल से जाने से बचने के लिए करे उसको भला अवतार (भले ही संत कबीर का ही) कहा जा सकता है क्या? संत या अवतार तो वो है जो एक आदमी की प्राण-रक्षा के लिए अपने प्राण को न्योछावर कर दे। कबीर संत थे जिन्होंने अंधविश्वास,भेदभाव,छुआछूत और पाखंड के खिलाफ आवाज उठाई। भले ही तत्कालीन शासक सिकंदर लोदी ने तीन-तीन बार उनपर जानलेवा हमला क्यों न करवाया कबीर न तो डरे और न ही जान की परवाह ही की। कबीर ने तो भगवान से बस इतना ही मांगा था-
साईँ इतना दीजिए जामें कुटुम्ब समाय।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय।।
अर्थात् हे ईश्वर,हमको बस इतना बड़ा घर दे दो जिसमें मेरा पूरा परिवार समा जाए और इतना धन दे दो कि न तो मेरा परिवार ही भूखा रहे और न हीं अतिथि को मेरे द्वार से भूखा लौटना पड़े। फिर कबीर के रामपाल जैसे अनुयायियों को क्यों राजाओं जैसे ऐश्वर्यपूर्ण ठाठ-बाट की आवश्यकता पड़ गई? वे क्यों उस महाठगनी माया के चक्कर में पड़ गए जिसे बारे में कबीर ने कहा था कि-
माया महा ठगनी हम जानी।
तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरी बानी।।
केसव के कमला भय बैठी शिव के भवन भवानी।
पंडा के मूरत भय बैठीं तीरथ में भई पानी।।
योगी के योगन भय बैठी राजा के घर रानी।
काहू के हीरा भय बैठी काहू के कौड़ी कानी।।
माया महा ठगनी हम जानी।।
मित्रों,कहने का तात्पर्य यह है कि अगर कहीं पर संत कबीर की आत्मा होगी तो आज जरूर रो रही होगी। कबीर ने अपने जीते-जी ऐसा कभी नहीं कहा कि उनको उनकी मृत्यु के बाद कथित भूदेव ब्राह्मणों की तरह देवता या भगवान का दर्जा दे दिया जाए बल्कि वे तो लोगों की ज्ञान-चक्षु खोलना चाहते थे जिससे कोई बाबा या ढोंगी उनको बरगला न सके। वे तो चाहते थे कि लोग किताबों में लिखी बातों से ज्यादा अपनी तर्कशक्ति,बुद्धि और विवेक पर विश्वास करें। वे तो चाहते थे कि लोग जब उनकी बातों पर अमल करें और उनकी शिक्षाओं का पालन करें तब भी आँख मूंदकर न करें बल्कि भले-बुरे पर विचार करके करें फिर कबीर को किसने और क्यों साधारण इंसान से साक्षात् परब्रह्म बना दिया? क्या ऐसा रामपाल जैसे ढोंगियों ने इसलिए नहीं किया क्योंकि उनको खुद को भगवान घोषित करना था और लोगों के विश्वास का नाजायज फायदा उठाना था?
मित्रों,अंत में दुनिया के तमाम कबीरपंथियों और सारे अन्य पंथियों से मेरा यह विनम्र निवेदन है कि वे सारे महामानवों को इंसान ही रहने दें भगवान न बनाएँ क्योंकि जैसे ही हम उनको भगवान मान लेंगे उसी क्षण हम यह भी मान लेंगे कि इनके जैसा हो पाना किसी भी मानव के लिए संभव ही नहीं है। चाहे वे राम हों,कृष्ण हों,बुद्ध,ईसा,महावीर या कबीर हों ये सभी इंसान थे और इस धरती पर विचरण करते थे। इन्होंने भी उसी प्रक्रिया से जन्म लिया था जिस प्रक्रिया से हम सभी ने लिया है। इनके भीतर जरूर ऐसे गुण थे जिसके चलते इन लोगों को महामानव की श्रेणी में रखा जा सकता है और ऐसे गुण हमारे भीतर भी हो सकते हैं। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने भीतर इन महामानवों के महान गुणों का विकास करें,उनके आदर्शों पर चलें और पूरी दुनिया को महामानवों की दुनिया बनाएँ न कि दिन-रात इनका नाम रटें। जिस दिन ऐसा हो जाएगा उसी दिन धरती पर सतयुग आ जाएगा न कि किसी मकान या महल का नाम सतलोक आश्रम रख देने से आएगा।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

19.11.14

मेला सोनपुर का आता है हर साल,आके चला जाता है

19 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,भारत त्योहारों और मेलों का देश है। यहाँ रोजाना कोई न कोई-न-कोई पर्व-त्योहार होता है और रोज कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी हिस्से में मेला लगता है मगर सोनपुर के हरिहर क्षेत्र मेले की तो साहब बात ही कुछ और है। हाँ भई यह मेला उसी हरिहरनाथ के पूजन के सिलसिले में लगता है जिसके गीत हर साल बिहार और पूर्वांचल के कोने-कोने में होली में गाए जाते हैं-बाबा हरिहरनाथ,बाबा हरिहरनाथ सोनपुर में रंग लूटे,होरी राम हो हो हो,बाबा हरिहरनाथ बाबा हरिहरनाथ.....।
मित्रों,कोई नहीं कह सकता कि यह विश्वप्रसिद्ध मेला कितने सालों से लग रहा है। पहले बिहार के लोग सालभर इस मेले का इंतजार करते। कार्तिक पूर्णिमा के दिन बैलगाड़ी जुतती और लोग दाल-चावल बर्तन लेकर मेले में आते। गंगा-नारायणी के पवित्र संगम पर गंगा-स्नान करते और मेला घूमते। तब यहाँ कई वर्ग किलोमीटर में हाथी,घोड़े,गाय,बैल,बकरी और भैंसों के बाजार लगते। लोग जानवरों को बेचते और खरीदते। रात में किसी पेड़ के नीचे दरी बिछाकर या बैलगाड़ी पर ही सो जाते। लौटने लगते तो ग्रामीण सामुदायिक व व्यक्तिगत उपयोग के लिए दरी,कंबल,बर्तन,चादर,साड़ियाँ-कपड़े,खिलौने,मिठाई आदि लेकर लौटते। गांव में बच्चों को भी अपने पिता-चाचा-दादा-मामा के मेले से लौटने का बेसब्री से इंतजार रहता। अगर किसी बच्चे को मेले में स्वयं जाने का अवसर मिल जाता तो समझिए कि उसकी तो लौटरी ही लग गई। फिर वो कई महीनों तक अपने ग्रामीण मित्रों को मेले की कहानियाँ सुनाता रहता।
मित्रों,बदलते जमाने के साथ दुनिया बदली है,लोग बदले हैं सो सोनपुर मेला भी बदला है। अब ज्यादातर लोग मोटरसाईकिल से आते हैं। स्टैंडवाले को 5 के बदले 15 रुपया देकर गाड़ी खड़ी करते हैं और घूम-फिरकर घर चल देते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो सुबह की ट्रेन से आते हैं और शाम की ट्रेन से वापस लौट जाते हैं। अभी भी मेले के लिए पूरे एक महीने तक ट्रेन मेले में रूकती है। जानवर के नाम पर अब दस-बीस घोड़ों और कुछ दर्जन गाय-भैसों,कुछेक बैलों के अलावा और कुछ होता नहीं होता। अब गांव में भी ज्यादातर लोगों ने गाय-बैलों को पालना छोड़ दिया है क्योंकि अब खेती बैलों से नहीं मशीनों से होती है नहीं तो एक जमाना वह था जब 1856 में बाबू कुंवर सिंह ने इसी मेले से अपनी सेना के लिए एकसाथ 5000 घोड़े खरीदे थे। फिर भी मेले में भीड़ कम नहीं होती। बिहार सरकार की प्रदर्शनियाँ हर साल की तरह इस साल भी लगी हैं लेकिन देखने से लगता है कि जैसे पिछले साल से कोई बदलाव नहीं किया गया है। वहीं जानकारियाँ,वहीं तस्वीरें।
मित्रों,लोगों की भगवान के प्रति आस्था में कमी आई है जिसके चलते जहाँ मेले में अपार भीड़ होती है वहीं बाबा हरिहरनाथ के मंदिर में इक्के-दुक्के लोग ही दिखते हैं। मेले में हर मजहब के लोग देखे जा सकते है। हिन्दू,मुसलमान और कुछेक विदेशी सैलानी भी। मेला घूमते-घूमते अगर थक गए हों तो बिहार सरकार के जन संपर्क विभाग के पंडाल में आ जाईए। सैंकड़ों कुर्सियाँ लगी हुई हैं और लगातार लोकगीतों का गायन चलता रहता है जिस पर नर्तक-नर्तकियाँ नृत्य भी करते रहते हैं। मेले में ही मुझे एक मित्र से कई साल बाद भेंट भी हो गई। जनाब कभी माखनलाल के नोएडा परिसर में हमारे साथ पढ़ते थे और आजकल बिहार पुलिस में सब इंस्पेक्टर हैं। नाम है-रंजय कुमार। पहले तो जनाब ने पहचाना ही नहीं लेकिन बाद में जब मैंने अपना प्रेस कार्ड दिया तब पहचान लिया।
मित्रों,कुछ लोगों का मानना है कि एक दिन यह मेला समाप्त हो जाएगा लेकिन मैं ऐसा नहीं मानता और ऐसा होना भी नहीं चाहिए। सोनपुर मेला हमारी शान है हमारी आन है। एक स्थान पर यहाँ मनोरंजन के जितने साधन हैं,जितने खिलौने,खाद्य-सामग्री और रोजाना उपयोग में आनेवाली चीजें बिक रहीं हैं शायद दुनियाँ में ऐसा नजारा कहीं और शायद ही देखने को मिले। पिछले कई सालों से कुछ कमी प्रशासन की तरफ से भी रही है। किसी समय सोनपुर के काली घाट और हाजीपुर के कोनहारा घाट के बीच नावों का लचका पुल बनता था जो अब नहीं बनाया जाता। अगर बनता तो मेले की शोभा में चार चांद लग जाते। कल मेरी भी ईच्छा हो रही थी कि मैं पैदल ही इस पार से उस पार कोनहारा घाट चला जाऊँ लेकिन ऐसा हो न सका। एक और कमी मुझे शिद्दत से महसूस हुई और वह है शौचालय की कमी। कहने को तो प्रशासन ने बँसवारी में टाट से घेर कर शौचालय बनवा दिए हैं लेकिन वे इतने गंदे हैं कि कोई उनमें नहीं जाता और लोग यत्र-तत्र मल-त्याग करते रहते हैं जिससे घोड़ा बाजार की तरफ तो जाना भी मुश्किल हो जाता है। हमने कई महिलाओं को खुले में ही शौच करते देखा और हम नहीं समझते कि यह सब देखकर देश-विदेश से आनेवाले सैलानियों के मन में बिहार की कोई अच्छी छवि बनेगी।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

16.11.14

दुनिया के सबसे बड़े हवाबाज और वादावीर नेता हैं नीतीश

16 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के पीएम इऩ वेटिंग नीतीश कुमार के भाषणों को सुनकर उनपर दया भी आती है और हँसी भी। आश्चर्य होता है कि नीतीश कुमार कितने झूठे और बेशर्म हैं! मैं एक बिहारी होने और पिछले सात सालों से बिहार में ही रहने के कारण यह  दावे के साथ कह सकता हूँ कि न सिर्फ भारत बल्कि पूरी वसुंधरा पर नीतीश कुमार से बड़ा दूसरा कोई वादावीर इस समय नहीं है और गजब यह कि अपने 9 सालों के काफी लंबे शासन में अपना एक भी वादा पूरा नहीं करनेवाले नीतीश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके छठे महीने में ही उनके द्वारा किए गए वादों का हिसाब मांग रहे हैं।
मित्रों,जब 2005 का विधानसभा चुनाव चल रहा था तब नीतीश कुमार ने बिहार को सुशासन देने का वादा किया। बिहार में सुशासन तो आया नहीं मगर नौकरशाहों का शासन जरूर आ गया। मतलब कि एक अति के बदले नीतीश ने दूसरी अति को स्थापित कर दिया। इसी प्रकार जब वर्ष 2010 का विधानसभा चुनाव चल रहा था तब नीतीश कुमार ने बिहार की जनता से वादा किया कि पहली पारी में हमने कानून-व्यवस्था में सुधार किया अब अगली पारी में भ्रष्टाचार को जड़ से उखाड़ फेंकेंगे। हालाँकि रोज-रोज बिहार में औसतन तीन-चार घूसखोरों को रंगे हाथों पकड़ा गया लेकिन इससे राज्य में भ्रष्टाचार की सेहत पर कोई खास असर नहीं पड़ा बल्कि बढ़े हुए जोखिम के मद्देनजर रेट में कई गुना की बढ़ोतरी हो गई।
मित्रों,फिर भी बिहार की जनता नीतीश सरकार से काफी हद तक संतुष्ट थी मगर इसी बीच नीतीश जी पर भारत का प्रधानमंत्री बनने का फितूर सवार हो गया और उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से सांप्रदायिकता के नाम पर गठबंधन तोड़ दिया। बिहार की जनता हतप्रभ थी कि जो पार्टी पिछले 18 सालों से धर्मनिरपेक्ष थी 2014 के लोकसभा चुनावों के समय कैसे सांप्रदायिक हो गई। जनता ने नीतीश के इस घोर अवसरवादी कदम और सहयोगी दल के साथ की गई धोखेबाजी को बिल्कुल भी पसंद नहीं किया और उनकी पार्टी आज बिहार में तीसरे नंबर की पार्टी बन चुकी है।
मित्रों,इसी तरह नीतीश जी ने कहा था कि अगर 2015 तक बिहार के हर गांव और घर में बिजली नहीं पहुँची तो वे वोट मांगने नहीं आएंगे मगर नीतीश जी अपने इस वचन पर भी कायम नहीं रहे और विधानसभा चुनावों से एक साल पहले से ही जनता के द्वार पर जा पहुँचे हैं। नीतीश जी ने अपनी धन्यवाद यात्रा और विकास यात्रा के दौरान बिहार के कई गांवों में रात बिताई और जमकर थोक में शिलान्यास किया। बेगूसराय और मोतीहारी की जनता ने जब कई महीनों के इंतजार के बाद भी पाया कि काम शुरू नहीं हो रहा है तब उन्होंने शिलापट्ट को उखाड़कर फेंक दिया। इधर नीतीश जी भी यकीनन शिलान्यासों को भूल चुके थे। मेरे क्षेत्र राघोपुर (वैशाली) की जनता भी इन दिनों काफी निराश है क्योंकि उनकी सड़क-पुल की उम्मीद धूमिल होने लगी है और इस दिशा में कहीं कोई काम होता हुआ नहीं दिख रहा है। बिहार के भूमिहीनों के साथ नीतीश कुमार ने वादा किया था कि उनको तीन-तीन डिसमिल जमीन दी जाएगी मगर हुआ कुछ नहीं। इसी तरह नीतीश जी ने बिहार के हर जिले में पॉलिटेक्निक और हर गांव में उच्च विद्यालय खोलने का वादा किया था जो शायद अब उनको याद भी नहीं है। नीतीश जी यह भी भूल गए हैं कि उन्होंने मार्क्सवादी नेता स्व. वासुदेव सिंह के इस आरोप कि बिहार सरकार प्राईवेट कंपनी बन गई है के जवाब में कहा था कि अबसे बिहार सरकार कांट्रैक्ट के आधार पर नहीं बल्कि स्थायी कर्मचारियों की नियुक्ति करेगी। इसी प्रकार नीतीश कुमार महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति नहीं कर पाए जो आज तक भी नहीं हो पाई है। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि बीपीएससी की परीक्षा अब प्रत्येक साल हुआ करेगी लेकिन वे यह वादा भी पूरा नहीं कर सके। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे बिहार में कानून का राज कायम करेंगे मगर नीतीश की पहली पारी के विपरीत आज के बिहार में फिर से जंगलराज की स्थिति बन गई है। इसी तरह नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे कभी जाति-धर्म की राजनीति नहीं करेंगे बल्कि हमेशा विकास की राजनीति करेंगे। नीतीश जी ने कहा था कि मंदिरों-मस्जिदों और स्कूलों के पास शराब की सरकारी दुकानें नहीं खोली जाएंगी और जो दुकानें खुल गई हैं उनको बंद कर दिया जाएगा मगर अफसोस ऐसा हो न सका। नीतीश कुमार ने पटना को जलजमाव से मुक्त करने का वादा भी किया था लेकिन राजधानी पटना इस साल भी बरसात में झील में बदल गई और हाईकोर्ट के हस्तक्षेप के बावजूद भी बनी रही। नीतीश कुमार ने वादा किया था कि वे बिहार की शिक्षा-व्यवस्था का कायाकल्प कर देंगे मगर उन्होंने उल्टे शिक्षा को बर्बाद कर दिया। इस साल इंटर के परीक्षार्थियों के साथ कैसा मजाक हुआ यह पूरी दुनिया ने देखा है। स्क्रूटनी में कॉपियाँ जाँची नहीं गईं और कॉपियों को खोले बिना ही एक-दो नंबर बढ़ा दिए गए जिससे मेधावी छात्र-छात्राओं का एक साल बर्बाद हो गया।
मित्रों,हम कहाँ तक गिनवाएँ कि नीतीश कुमार ने कितने वादे किए थे शायद शेषनाग भी नहीं गिना पाएंगे। हाँ,हम इतना दावे के साथ कह सकते हैं कि नीतीश कुमार ने उनमें से किसी भी एक भी वादा को पूरा नहीं किया। इस प्रकार हम उनको भारत का सबसे बड़ा वादावीर के रूप में विभूषित कर सकते हैं। जहाँ तक नरेंद्र मोदी का सवाल है तो कालाधन से लेकर प्रत्येक मुद्दे और वादे पर केंद्र सरकार कायम है और संजीदगी व शीघ्रता से उस दिशा में कदम भी उठा रही है। यहाँ तक कि जी20 की बैठकों में भी मोदी का सबसे ज्यादा जोर भ्रष्टाचार और कालेधन की वापसी पर ही है। ये बात और है कि नीतीश जी की रणनीति चूँकि केंद्र सरकार की कथित विफलताओं को मुद्दा बनाकर बिहार में विधानसभा चुनाव लड़ना है इसलिए उनको केंद्र सरकार काम करती हुई दिख ही नहीं रही जबकि होना तो यह चाहिए उनको केंद्र की वर्तमान सरकार की विफलताओं के मुद्दे पर नहीं बल्कि अपनी सरकार की सफलताओं के मुद्दे पर चुनावों में जाना चाहिए।
(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

नीतीश की भई गति साँप छछूंदर केरी

16 नवंबर,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,रामचरितमानस में एक प्रसंग है कि कैकयी द्वारा वर मांगने के बाद राम वनवास जाने को उद्धत होते हैं। जाने से पहले जब वे अपनी जननी कौशल्या से अनुमति लेने जाते हैं तब उनकी माँ असमंजस में पड़ जाती है कि करूँ तो क्या करूँ? अगर अपने पुत्र को वन जाने से रोकती है तो पति पर वचनभंग का कलंक लगता है और अगर वनवास पर जाने को कहती है पति के प्राण चले जाएंगे। ऐसे में माता कौशल्या की स्थिति वही हो गई थी जैसी कि छुछुंदर को निगल लेने के बाद साँप की हो जाती है। साँप अगर छुछुंदर को निगल जाता है तो मर जाएगा और अगर उगल देता है तो लोकमान्यताओं के अनुसार अंधा हो जाएगा।

मित्रों,लगभग वही स्थिति इन दिनों बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी की भी है। नीतीश जी ने भाजपा से गठबंधन तोड़ तो दिया मगर लोकसभा चुनावों में बिहार की जनता ने उनके इस कदम को पसंद नहीं किया। घबराहट के मारे उन्होंने अपने चिरशत्रु लालू प्रसाद यादव के साथ नया गठबंधन बनाया और साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा मगर फिर से जनता ने उनकी पार्टी को लालू प्रसाद की पार्टी से आधी ही सीट दी। कहने का तात्पर्य यह कि एक नहीं दो-दो बार दो-दो चुनावों में नीतीश कुमार की पार्टी जदयू को राजद के मुकाबले आधी ताकतवाला दल साबित हो चुका है ऐसे में स्वाभाविक तौर पर अगले साल होनेवाले विधानसभा आम चुनावों में राजद उनको अपने बराबर सीट नहीं देनेवाला है। कल डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह ने सीटों के बँटवारे के लिए लोकसभा चुनाव,2014 में प्राप्त मत-प्रतिशत को आधार बनाने की मांग करके इस बात का संकेत भी दे दिया है।

मित्रों,ऐसे में नीतीश कुमार चाहते ही नहीं हैं कि महागठबंधन के तहत चुनाव लड़ा जाए और इसलिए वे जनसमर्थन जुटाने के लिए संपर्क-यात्रा पर निकले हुए हैं। एक और मोर्चे पर नीतीश जी हालत न घर के घाट वाली हो रही है। नीतीश जी ने जीतनराम मांझी को कठपुतली समझकर अपने स्थान पर मुख्यमंत्री तो बना दिया लेकिन मांझी अब सिर का दर्द बन गए हैं। वे लगातार अपने बेतुके बयानों से विवाद खड़ा कर रहे हैं और बाँकी जातियों को दरकिनार कर केवल दलितों-महादलितों के नेता बनने का प्रयास कर रहे हैं जिससे पार्टी के प्रति अन्य जातियों में गुस्सा पैदा हो रहा है। इस प्रकार नीतीश कुमार न तो मांझी को मुख्यमंत्री बनाए रख सकते हैं और न ही हटा ही पा रहे हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

15.11.14

ब्लाउस फाड़ कर तमाशा खड़ा कर दूंगी



आर टी आई अर्थात सूचना का अधिकार अधिनियम के माध्यम से सूचना लगाना  अब इतना आसान नहीं रह गया है. अब तो धमकी दी जाती है इसमें महिलाये अपने महिला होने का फायदा उठती है जबकि यही महिलाये हमेशा पुरुष के बराबरी का अधिकार मांगती है.

हमने पिछले दिनों राष्ट्रिय माध्यमिक शिक्षा मिसन के अंतर्गत कटनी जिले में चलने वाले बालिका छात्रावासो में चल रहे भ्रष्टाचार की पोल-खोलने के उद्देश्य से आर टी आई के माध्यम से जानकारी मांगी

इस पर रमसा बालिका छात्रावास रीठी की अधीक्षिका ने प्रिंसिपल के माध्यम से वांछित रूपये जमा करा लिए और इसकी पावती  भी नहीं दी.

हफ्ते भर बाद प्रिंसिपल के सामने यह अधःक्षिका तिरिया चरित्र बताते हुए कहने लगी की एक महिला से बात करने  की तमीज नहीं है मै अभी ब्लाउस फाड़ कर तमाशा खड़ा कर दूंगी और फसा दूंगी

यह जानकारी मैंने  जिला शिक्षा अधिकारी कटनी से मांगी है ऐसे में इस वार्डन का  व्यवहार कई सवाल खड़े करता है ?

जबकि इसी बालिका छात्रावास में इसका पति भी रहता है जिसे प्रिंसिपल से लेकर सभी उच्च अधिकारी जानते है लेकिन कुछ नहीं बोलते

कारण तो आप समझ चुके होगे

अब देखो कैसे मुझे यह जानकारी मिलती है

अखिलेश उपाध्याय

12.11.14

कांग्रेस का इतिहास है इसलिए कांग्रेस अब इतिहास है

12 नवंबर,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बात उस समय की है जब फ्रांस का शासक नेपोलियन महान फ्रांस के सैनिक स्कूल में पढ़ता था। उसके साथ फ्रांस के बड़े-बड़े कुलीन सामंतों के लड़के पढ़ते थे। चूँकि नेपोलियन कुलीन नहीं था इसलिए वे उससे जलते थे। एक दिन उन्होंने नेपोलियन को नीचा दिखाने के लिए उससे पूछा कि तुम किस वंश के हो। नेपोलियन ने पूरी दृढ़ता के साथ उत्तर दिया कि मेरा वंश मुझसे शुरू होता है।
मित्रों,इन दिनों भारत की ऐतिहासिक राजनैतिक पार्टी कांग्रेस का भी वही हाल है जो फ्रांसीसी क्रांति के समय कुलीनों की या उनके बच्चों की थी। कांग्रेस ने भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की 125वीं जयंती पर पार्टी द्वारा आयोजित होनेवाले समारोह में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को आमंत्रित नहीं करने की धृष्टता की है और उल्टे वो भाजपा पर अपने नेताओं को छीनने के आरोप लगा रही है। उसका यह भी कहना है कि कांग्रेस का गौरवशाली इतिहास रहा है जबकि भाजपा या मोदी को ऐसा सौभाग्य प्राप्त नहीं है।
मित्रों,कांग्रेस अभूतपूर्व पतन के बावजूद  निश्चित रूप से यह नहीं समझ पा रही है भले ही कांग्रेस के पास अतीत में एक-से-एक तेजस्वी और तपःपूत नेता थे लेकिन आज उसके पास ऐसा एक भी नेता नहीं है जो योजना बनाने,वक्तृता,प्रशासनिक योगयता और त्याग में भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पासंग में भी ठहरता हो। जनता को इतिहास नहीं वर्तमान चाहिए। आज नेहरू,आजाद,प्रसाद,पटेल,गांधी या इंदिरा नहीं आनेवाले हैं देश और कांग्रेस को चलाने बल्कि देश को वही लोग चलायेंगे जो इस समय जीवित हैं और जो कांग्रेस का वर्तमान नेतृत्व है वह परवर्ती मुगलों की तरह पूरी तरह से अक्षम है।
मित्रों,हमारे गांव में एक जमींदार था जिसके दरवाजे पर कभी कई-कई हाथी झूमते रहते थे। आज उसके वंशज भिखारी हो चुके हैं मगर उनके पास आज भी वह लोहे का सिक्कड़ है जिससे कि हाथियों को अतीत में बांधा जाता था। क्या आज कांग्रेस की हालत भी ऐसी ही नहीं हो गई है? कांग्रेस के दरवाजे से जनसमर्थन बटोरने वाले नेता (हाथी) तो गायब हो चुके हैं लेकिन सोनिया और राहुल आज भी उनका सिक्कड़ लेकर घूम रहे हैं मगर भारत की जनता है कि अपनी नाक पर मक्खी तक को नहीं बैठने दे रही है क्योंकि जनता को ऐसा हाथी चाहिए जो भारत को फिर से विश्वगुरू बनाए न कि कोरा सिक्कड़।
मित्रों,इसलिए कांग्रेस को अपने अतीत पर इतराने के बदले मोदी सरकार के सकारात्मक कार्यों का समर्थन और नकारात्मक कार्यों (अगर वो करे) का विरोध करना चाहिए। अगर कांग्रेस नरेंद्र मोदी को आज भी एक चायवाला समझ रही है तो निश्चित रूप से उसको और भी बुरे दिन देखने हैं क्योंकि आज नरेंद्र मोदी न सिर्फ भारत के बल्कि विश्व के सबके लोकप्रिय नेता बनकर उभरे हैं और उनकी अकुलीनता पर किसी भी तरह के अपमानजनक व्यवहार को भारत की जनता किसी भी तरह बर्दाश्त नहीं करेगी और करारी प्रतिक्रिया देगी। मोदी को किसी गांधी-नेहरू के वंश से खुद को जोड़ने की कोई जरुरत नहीं है क्योंकि मोदी का वंश नेपोलियन की तरह मोदी से ही शुरू होता है और निश्चित रूप से इस कारण से मोदी पर ही समाप्त नहीं होगा क्योंकि उनका कोई परिवार नहीं है बल्कि देश के करोड़ों राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी के भाई-बंधु हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)