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26.8.14

बिहार के उपचुनाव भाजपा के लिए सबक?!-ब्रज की दुनिया

26 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,वैसे तो बिहार में जो दस सीटों के लिए उपचुनाव हुए हैं उनका कोई मतलब नहीं था। इससे सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़नेवाला था और मुझे नहीं लगता कि वर्तमान विधानसभा के बचे हुए एक साल में जीतनेवाले 10 उम्मीदवार अपने क्षेत्र के लिए कुछ खास कर पाएंगे लेकिन फिर भी चुनाव तो चुनाव होते हैं। मैच चाहे लीग स्तर का हो या नॉक आउट,20-20 हो या टेस्ट, जीत जीत होती है और हार हार।
मित्रों,इस साल के लोकसभा चुनावों में जिस तरह एनडीए ने बिहार में विपक्ष का सूपड़ा साफ कर दिया था लगता है कि भाजपा के बिहारी नेता उससे कुछ ज्यादा ही फूल गए। उनको लगा कि बिहार की जनता ने सिर्फ उनको ही वोट दिया है और उसके सामने विकल्पहीनता की स्थिति है। वास्तविकता तो यह है कि उस समय बिहार की जनता ने बिहार की जनता की तरह नहीं बल्कि भारत की जनता के रूप में वोट दिया था। वास्तविकता यह भी है कि उस समय भी एनडीए के पक्ष में कम विपक्ष में ज्यादा मत पड़े थे। फिर उस चुनाव में भाजपा के पास एक मजबूत,प्रतिभासम्पन्न और प्रखर सेनापति मौजूद था। उस समय भाजपा का प्रचार अभियान भी काफी सुव्यवस्थित और सुसंगठित तरीके से चला था।
मित्रों,लगता है कि एनडीए ने इन उपचुनावों को गंभीरता से लिया ही नहीं जबकि महागठबंधन ने इस अपने अस्तित्व का प्रश्न बना लिया था। शायद यह कारण भी था कि भाजपा समर्थक मतदाताओं ने मतदान में कम संख्या में भाग लिया जिसका प्रभाव कुल मतदान की संख्य़ा पर भी पड़ा। 10 सीटों में से 9 सीटों पर सिर्फ भाजपा चुनाव लड़ रही थी और लोजपा ने सिर्फ एक सीट पर और रालोसपा ने तो किसी भी सीट पर लड़ने में अपनी रूचि ही नहीं दिखाई शायद इसलिए उसको अपने बाँकी दो सहयोगी दलों के समर्थकों का मत भी पूरी तरह से नहीं मिल सका। रही-सही कसर टिकट-वितरण में की गई गड़बड़ी ने पूरी कर दी जिससे पार्टी को लगभग हरेक सीट पर बागी उम्मीदवारों का सामना करना पड़ा। उदाहरण के लिए मोहिउद्दीननगर में हमेशा राजद का वोट बैंक ज्यादा मुखर और सशक्त रहा है फिर भी वहाँ भाजपा ने बाहरी उम्मीदवार को खड़ा कर दिया। मतलब भाजपा को अभी भी निचले स्तर तक स्थानीय व जिताऊ उम्मीदवार तलाशने में परेशानी हो रही है जैसा कि 2010 के विधानसभा चुनावों में भी हुआ था और यह निश्चित रूप से पार्टी के लिए चिंता का विषय है। जब किसी पार्टी के पक्ष में लहर चल रही होती है तब ऐरे-गैरे नत्थू खैरे भी जीत जाया करते हैं लेकिन जब लहर नहीं चल रही होती है तब मतदाता उम्मीदवार को भी देखता है और भाजपा ने कई सीटों पर उम्मीदवार चयन में गलतियाँ कीं। इतना ही नहीं पार्टी ने जदयू के बागियों की ताकत को आँकने में भी गलती की और लगातार बेवजह अनाप-शनाप बयान देती रही।
मित्रों,इन उपचुनावों में प्रदेश भाजपा नेतृत्व बिखरा हुआ दिख रहा था। इसी तरह प्रचार अभियान में भी बिखराव था और अव्यवस्था थी। बिहार की जनता यह जानना भी चाहती है कि बिहार के अगले मुख्यमंत्री के लिए भाजपा किसको अपना उम्मीदवार बनाएगी। बिहार में ऐसा कौन-सा भाजपा नेता है जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह सीना ठोंककर यह कह सके कि मैं न तो खाऊंगा और न ही खाने दूंगा? है कोई नेता जो कह सके कि मैं न तो सोऊंगा और न ही सोने दूंगा? भाजपा नेताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी लाख गलतियों के बावजूद भी बिहार की जनता ने उनको दस में से चार यानि सबसे ज्यादा सीटें दी हैं और मत प्रतिशत के मामले में भी वह अकेली सबसे आगे है इसलिए पूरी तरह से हार मान लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। आवश्यकता है एक सशक्त और तेजस्वी नेतृत्व के हाथों में बिहार भाजपा का सेनापतित्व सौंपने की और फिर सुसंगठित और सुव्यवस्थित तरीके से गहन चुनाव प्रचार करने की। सोशल मीडिया से लेकर जनता से डोर-टू-डोर सीधा संवाद करके उसे बताना होगा कि उसकी झोली में बिहार के लिए कौन-सी योजनाएँ हैं और उन योजनाओं को कैसे प्रभावी तरीके से वह लागू करेगी,कैसे बिहार में वास्तविक सुशासन,पारदर्शिता और ईमानदार शासन-प्रशासन की स्थापना करेगी,कैसे अव्यवस्था,अराजकता और रिश्वतखोरी के प्रति जीरो टॉलरेंसे की नीति अपनाएगी और इन बुराइयों को पूरी तरह से दूर करेगी। इसके लिए बिहार प्रदेश भाजपा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क कर सकती है लेकिन चूँकि बिहार पूरे भारत के लिए हमेशा से कुत्ते की दुम रहा है इसलिए योजनाओं के क्रियान्वयन और शासन से भ्रष्टाचार और घूसखोरी की समाप्ति के लिए उनको विशेष बिहारी उपाय खोजने होंगे और जनता को विश्वास में लेना होगा। हम जानते हैं कि बिहार भारत के सबसे युवा प्रदेशों में से है। बिहार का युवा आज भी अपने परिवार से हजारों किलोमीटर दूर जाकर नौकरी करने को विवश है,आज भी बिहार सिर्फ श्रमिकों की आपूर्ति करने का काम कर रहा है। कौन ऐसा बिहारी युवा होगा जो अपने घर में परिवार के साथ रहकर रोजी-रोटी कमाना नहीं चाहेगा? बस भाजपा बिहारी युवाओं को विश्वास दिलाए कि हम बिहार को औद्योगिक प्रदेश बनाएंगे और कैसे बनाएंगे बताए।
मित्रों,फाईनल में टक्कर एक बार फिर से काँटे की होनेवाली है इसलिए इंतजाम अभी से ही करने होंगे। बिहार के युवा अभी भी भ्रष्ट व जातिवादी ताकतों के हाथों का खिलौना बनने को तैयार नहीं हैं बशर्ते उनके पास बेहतर और बेहतरीन विकल्प हो और वह विकल्प इस समय सिर्फ भाजपा ही दे सकती है।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

25.8.14

बिहार में इंटर परीक्षा का अंतिम परिणाम कभी आएगा भी?-ब्रज की दुनिया

25 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,बिहार के बारे में विशेषज्ञ लगातार अपनी राय रखते रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि बिहार एक बीमार मानसिकता का नाम है तो कुछेक कहते हैं कि बिहार एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई ईलाज किसी के पास भी नहीं है। चूँकि मैं एक विशेषज्ञ नहीं हूँ इसलिए मानता हूँ कि बिहार नामक बीमारी भले ही 40-50 साल पुरानी हो,भले ही पिछले कई दशकों से बिहार में सरकार और प्रशासन नाम की चीज नहीं रह गई है,भले ही बिहार आज भी दूसरे राज्यों को सिर्फ श्रम की आपूर्ति करनेवाला राज्य बना हुआ है,भले ही बिहार में परीक्षा के नाम पर मजाक होता हो,भले ही बिहार में अंग्रेजी के शिक्षक संस्कृत की और हिन्दी के शिक्षक अंग्रेजी की कॉपियाँ जाँचते हों लेकिन बिहार फिर भी सुधर सकत है,स्वस्थ हो सकता है लेकिन ऐसा इस सरकार में तो कभी नहीं होगा। इसके लिए व्यवस्था परिवर्तन के लिए सत्ता-परिवर्तन करना होगा। ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि इस समय भी बिहार में जन्म लेना बिहारियों के लिए अभिशाप ही बना हुआ है।

मित्रों,बिहार के करीब डेढ़ लाख विद्यार्थी ऐसे हैं जो बिहार में जन्म लेने और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा आयोजित इंटर की परीक्षा देने का दंड भुगत रहे हैं। हुआ यह कि इस साल जब इंटर का रिजल्ट आया तो बड़ी संख्या में छात्र फेल कर दिए गए थे। उनमें से कुछ छात्र तो ऐसे थे जो देश की शीर्षस्थ इंजीनियरिंग और मेडिकल संस्थानों की नामांकन परीक्षाओं में टॉप किया था। रिजल्ट आते ही पूरे राज्य में छात्रों ने हंगामा खड़ा कर दिया। जगह-जगह आगजनी होने लगी। तत्कालीन शिक्षा मंत्री पीके शाही ने कहा कि कॉपियाँ फिर से जाँची जाएंगी और छात्रों के साथ न्याय होगा।

मित्रों,जब से पुनर्मूल्यांकन अर्थात् स्क्रूटनी का काम शुरू हुआ बिहार सरकार और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति को परीक्षक मिल ही नहीं रहे। डेढ़ लाख छात्रों की 8 लाख कापियों की जाँच के लिए मात्र 125 परीक्षक रखे गए हैं। ऐसे में जो होना चाहिए था वही हुआ। देश के सभी विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में नामांकन समाप्त हो चुके हैं। नए सत्र की पढ़ाई भी शुरू हो चुकी है लेकिन रिजल्ट का अभी भी कहीं अता-पता नहीं है। सूत्र बता रहे हैं कि अभी भी कम-से-कम एक छात्रों की कॉपियों की जाँच होनी बाँकी है। ऐसे में छात्रों को जिनका कि एक साल बर्बाद हो चुका है अब जिंदगी खराब होने का खतरा मंडराने लगा है।

मित्रों, जब इन कॉपियों की जाँच की गई थी तब तो सरकार को पर्याप्त संख्या में शिक्षक मिल गए थे फिर अब क्यों नहीं मिल रहे हैं? क्या तब दूसरे विषय के शिक्षकों से दूसरे विषय की कॉपियाँ जँचवाई गई थीं या फिर परीक्षकों ने धड़ल्ले से बिना पढ़े ही नंबर दे दिये? अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर तब इतनी तेजी में कैसे कॉपियों की जाँच हो गई और अब इतनी धीमी गति से क्यों हो रही है? छात्रों को प्राप्त बेतुके अंकों से भी क्या मेरी यह आशंका सत्य साबित नहीं हो रही है?

मित्रों,एक सप्ताह पहले बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के वर्तमान अध्यक्ष लालकेश्वर प्रसाद ने दावा किया था कि 10 दिन में परिणाम घोषित कर दिये जाएंगे लेकिन जबकि एक परीक्षक एक दिन में अधिकतम 30 कॉपियों की ही जाँच कर सकता है तो फिर कैसे दस दिन में 5-6 लाख कॉपियों की जाँच हो सकेगी? क्या फिर से उसी तरह से धड़ल्ले से कॉपियों को बिना पढ़े ही जाँच देने की योजना बनाई गई है जैसे कि पहली बार में किया गया था? फिर स्क्रूटनी का मतलब ही क्या है?

मित्रों, अभी भी कॉपियों को स्ट्रांग रूम में मैनेज वे में नहीं रखा गया है जिससे कि एक-एक को निकालने में काफी समय लग रहा है। बीच में समर वैकेशन के कारण लगभग एक महीने बंद रहा था स्कूल जिसके चलते भी कॉपियों की जाँच की गति धीमी पड़ गई। बोर्ड के पास कॉपी चेक कराने के लिए स्पेस की कमी है।
स्कूल एवं कॉलेज खुले होने के कारण बड़ी संख्या में टीचर्स को एग्जामिनर्स बनाने से क्लासेस बंद हो जाएंगे इसके चलते भी समस्या आ रही है। सरकार अगर अमल करना चाहे तो हम सुझाव देते हैं कि सरकार को स्पेशियस सरकारी या प्राइवेट भवन किराए पर लेना चाहिए जहाँ कि ज्यादा संख्या में परीक्षक कॉपियों की जाँच कर सकें। परीक्षकों की संख्या बढ़ाई जाए। जरुरत के हिसाब से हर जिले में री-चेकिंग सेंटर बने और आगे से इंटर और मैट्रिक की परीक्षाओं से कदाचार को तो समाप्त किया ही जाए कॉपियों की जाँच की प्रक्रिया को भी इस तरह से चुस्त-दुरूस्त किया जाए कि बिहार में जन्म लेना और बिहार विद्यालय परीक्षा समिति पर विश्वास करना अभिशाप नहीं बन पाए।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

24.8.14

आइडिया इंटरनेट जब लगाविंग,आइडिया तुमको उल्लू बनाविंग-ब्रज की दुनिया

24 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,विज्ञापन की दुनिया बड़ी आकर्षक है। अच्छे-अच्छे समझदार भी इनके झाँसे में आने से नहीं बच पाते। उदाहरणार्थ,आइडिया कंपनी कहती है कि आइडिया इंटरनेट जब लगाविंग,नो उल्लू बनाविंग,नो उल्लू बनाविंग अर्थात् जब आप आइडिया इंटरनेट लगा लेते हैं तो कोई आपको उल्लू नहीं बना सकता लेकिन कंपनी यह नहीं बताती कि हम तो आपको उल्लू बना ही सकते हैं और जरूर बनाएंगे।
मित्रों,हुआ यूँ कि रक्षाबंधन यानि 10 अगस्त से एक-दो दिन पहले मैं अपने मित्र नरेश राय जिनकी मोबाईल रिचार्चिंग की दुकान में बैठा था तभी मेरी नजर दुकान में चिपकाए गए आइडिया के पोस्टर पर पड़ी जिसमें बताया गया था आइडिया मात्र 197 रुपये में एक महीने के लिए अनलिमिटेड इंटरनेट उपयोग की सुविधा देती है। मैंने तत्काल आइडिया का एक सिम ले लिया जो 8 तारीख को चालू भी हो गया। नंबर है 9507489439। नौ अगस्त को मैं बक्सर जिले के छतनवार गांव गया जहां कि मेरी बड़ी बहन रहती है। वहाँ जाकर पता चला कि वहाँ आइडिया का टावर था इसलिए आइडिया ही सबसे अच्छा काम करता था। मैंने तत्काल नरेश जी को फोन किया और कहा कि 197 वाला पैकेज डाल दीजिए। सचमुच वहाँ आइडिया काफी अच्छा काम कर रहा था।
मित्रों,मैं 11 तारीख को हाजीपुर वापस आ गया। कल मैं जब एसएमएस चेक कर रहा था तो मैंने पाया कि मेरा 50 एमबी जीपीआएस डाटा आइडिया कंपनी पर बकाया है। मैंने तुरंत बताए गए नंबर पर फोन कर दिया। करीब आधे घंटे में 50 एमबी डाटा समाप्त हो गया परंतु यह क्या उसके बाद आइडिया इंटरनेट ने काम करना ही बंद कर दिया। मैं परेशान हो गया कि यह क्या हुआ। फिर मैंने 198 पर कस्टमर केयर पर कॉल किया तो फोन उठानेवाली महिला ने बताया कि चूँकि आपने 50 एमबी फ्री डाटा लिया है इसलिए आपकी सेवा बंद कर दी गई है। मैंने पूछा कि ऐसा कैसे हो सकता है मुझे तो एक महीने का वादा किया गया था तो उसने कहा कि कंपनी का यही नियम है इसलिए ऐसा किया गया है। यानि फ्री के फेर में पड़े तो पेड भी गया।
मित्रों,फ्री डाटा वाले एसएमएस में यह कहीं नहीं कहा गया था कि ऐसा भी हो सकता है और मैं उल्लू बनाया जा सकता हूँ लेकिन सच्चाई तो यही है कि जिस कंपनी ने पूरे भारत को ठगी से मुक्त करने का बीड़ा उठाया है उसी ने मुझे ठग लिया। सावधान रहिएगा ऐसा आपके साथ भी हो सकता है क्योंकि इन कंपनियों का कोई ईमान नहीं होता। यह बोलतीं कुछ है और करतीं कुछ और। खुद ही इंडिया को उल्लू बनाती हैं और कहती हैं कि हम आपको उल्लू बनने नहीं देंगे।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

23.8.14

भंते, बिहार सरकार में बुद्धि की कमी है!-ब्रज की दुनिया

23 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,आपने का वर्षा जब कृषि सुखानि वाली कहावत तो सुनी होगी लेकिन हमें पूरी तरह से यकीन है कि इस पर कभी अमल नहीं किया होगा लेकिन हमारे बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी इस पर न सिर्फ यकीन रखते हैं बल्कि इस पर अमल भी करते हैं। तभी तो उन्होंने कहा है कि बरसात के बाद बिहार उन सभी बांधों की मरम्मत करवाई जाएगी जिनकी पिछली कई वर्षों या महीनों से मरम्मत नहीं हुई। वाह कमाल है! क्या तरीका है शासन चलाने का। मुजफ्फरपुर में बागमती नदी पर बने बांध के टूटने से लेकर यहाँ बिहार में रोज कहीं-न-कहीं किसी-न-किसी नदी का बांध टूट रहा है। कल भी सीवान में सरयू नदी पर बना मिर्जापुर बांध टूटा है। नीतीश कुमार जी उर्फ सुशासन बाबू के गृह जिले नालंदा में तो अब शायद ही कोई बांध टूटने से बच गया हो। इस साल बाढ़ से सबसे ज्यादा वही नालंदा जिला प्रभावित हुआ है जिसके बारे मैंने जबसे होश संभाला है नहीं सुना कि वहाँ बाढ़ भी आती है और बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री बिहार की जनता को भरोसा दे रहे हैं कि घबराईए नहीं बस कुछ ही दिनों की बात है। कुछ दिन और कष्ट बर्दाश्त कर लीजिए फिर बरसात के रुकते ही सरकार सारे तटबंधों की मरम्मत करवा देगी। मगर उससे क्या फायदा होगा और किसको फायदा होगा? ठेकेदार दस-बीस टोकरी मिट्टी डालकर काम पूरा कर लेंगे और इंजीनियर कमीशन पाकर लिख देंगे कि फलां ठेकेदार ने इतने करोड़ का काम किया और अगले साल फिर से वही बांध टूट जाएंगे। मुख्यमंत्री खुद कहते हैं कि ओवर एस्टिमेट बनाकर अधिकारी-कर्मचारी सरकारी खजाने को चूना लगा रहे हैं। क्या उनका कह देना भर काफी है? इस लूट को रोकेगा कौन? कई जिलों से रिपोर्ट आई है कि उनके यहाँ कोई बांध नहीं है जबकि उन्हीं जिलों में जमींदारी बांधों की देखभाल के नाम पर करोड़ों रुपयों के वारे-न्यारे कर दिये गए। ईट हैप्पेन्स ऑनली ईन बिहार।

मित्रों,राजधानी पटना में तो कोई बांध नहीं टूटा फिर वहाँ क्यों बाढ़ जैसे हालात बने हुए हैं? पटना में भी हर साल बरसात में जलनिकासी प्रणाली फेल हो जाती है और लोगों के घरों तक में पानी घुस जाता है क्या उसके लिए बिहार सरकार के पास कोई कार्ययोजना है? पिछले 9 सालों में पूरे पटना में नालियों का निर्णाण करवाया गया फिर भी हालत में सुधार क्यों नहीं हो रहा? क्यों करोड़ों रुपये नालियों के निर्माण और रखरखाव के नाम पर नालियों में बहा दिए गए?

मित्रों,बिहार की सरकार को किसने रोका था,किसने जबर्दस्ती उसके हाथ-पांव बांध रखे थे बरसात से पहले ही बांधों की मरम्मत करने से? क्या बरसात के बाद बांधों की मरम्मत की जाती है अगर हुई तो और मांझी को अपना यह अद्भुत वादा याद रह गया तो? क्या इस तरह चलती है सरकार? इससे पहले जब राज्य में सूखे से आसार बन रहे थे तब पता चला कि राज्य के 99 प्रतिशत सरकारी नलकूल कई सालों से बंद पड़े हैं और इस साल भी सरकार उनमें से एक को भी चालू नहीं करवा पाई। क्या इस तरह की जाती है प्राकृतिक आपदा से निबटने की तैयारी कि सूखा आए तो सारे नलकूप खराब और बाढ़ आए तो एक-एक कर सारे बांध टूट जाएँ? क्या बिहार सरकार के पास अब कामचलाऊ बुद्धि भी नहीं रह गई है? साहित्यकार श्रीकांत वर्मा ने तो अपनी कविता में कोशल के बारे में कहा था कि कोशल ज्यादा दिन टिक नहीं सकता क्योंकि वहाँ विचारों की कमी है लेकिन यहाँ तो बिहार सरकार में बुद्धि की ही कमी हो गई है विचार तो फिर भी दूर की कौड़ी हैं।

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

21.8.14

सफल होना कहाँ मना है

सफल होना कहाँ मना है 


टू -व्हीलर के प्लग पर थोड़ा सा कार्बन आ जाने पर उसके बाकी सभी पार्ट ठीक
होने पर भी स्टार्ट नहीं होता है ठीक इसी तरह से मनुष्य पूर्ण स्वस्थ होने पर भी,
विषय का आवश्यक ज्ञान होने पर भी,जरुरी संसाधन उपलब्ध होने पर भी बहुत
बार असफल हो जाता है? उसकी असफलता का कारण उसके मन पर कार्बन की
हल्की सी परत जम जाना है और वह परत है नकारात्मक सोच  .... नकारात्मक
सोच हमें सफल होने से रोक देती है क्योंकि इसका पहला कुप्रभाव हमारे हौसले
पर पड़ता है। हौसला टूटने से हमारा उत्साह खत्म हो जाता है। उत्साह खत्म होने
से हमारा लक्ष्य बिखर जाता है और लक्ष्य धुँधला होते ही हम असफल हो जाते हैं।

नीची उड़ान भरने वाले पंछी अक्सर मौके की तलाश में घूमते रहते हैं मगर अवसर
उनकी पकड़ से प्राय:दूर ही रहता है जबकि बाज बहुत ऊँचाई पर उड़ता है और अवसर
को मजबूती से दबोच लेता है। यह अंतर है सामान्य और बड़ी सोच में। हम किनारो
पर बैठकर मोती पाना चाहते हैं यानि हम पर्याप्त पुरुषार्थ के बिना वो हासिल करना
चाहते हैं जिसे हासिल करने के लिए ऊँची उड़ान,अवसर की टोह ,सटीक निर्णय क्षमता
और कड़ी मेहनत की जरुरत होती है। लक्ष्य अगर छोटा है तो भी असफलता और बहुत
बड़ा है तो भी असफलता। हमें उतनी ऊँचाई पर उड़ना चाहिए कि वहाँ से लक्ष्य स्पष्ट
दीखता रहे और मौका बनते ही बिना देरी किये दबोचा जा सके।

मजदुर कड़ी मेहनत करता है फिर भी कितना कमाता है सिर्फ पेट भर पाता है और
एक सेठ कम मेहनत करके भी बहुत अर्जन कर लेता है। इस कटु सत्य को लोग
किस्मत या भाग्य कहते हैं जबकि हकीकत में यह सोच,नजरिया या लक्ष्य का
फर्क है। लक्ष्य बहुत छोटा होगा तो कड़ी मेहनत भी सार्थक परिणाम नहीं दे पायेगी
नजरिया यदि संकीर्ण होगा तो बड़ी सोच पनप ही नहीं पायेगी और सोच  केवल
पेट भरने के जुगाड़ तक की होगी तो इससे ज्यादा मिलेगा क्यों ? सोच सकारात्मक
रखिये ,नजरिया स्पष्ट रखिये और लक्ष्य ठीक नाक के सामने रखिये  तब आप
जान जायेंगे की पुरुषार्थ का दूसरा नाम ही किस्मत है  …।

मेंढक और कछुवे में एक समानता यह है कि दोनों जल के जीव हैं मगर इनके स्वभाव
में जो भिन्नता है उनमें भी जीवन सूत्र छिपा है। थोड़ा सा सुहाना मौसम और बारिस
का पानी देख मेंढक जोर -जोर से टर्राने लग जाते हैं और उछलने लगते हैं जबकि कछुआ
गहरे पानी के बीच भी शान्त रहता है इसी प्रकार का स्वभाव मनुष्य का होता है ,जब
थोड़ी सी सफलता प्राप्त कर लेते हैं या थोड़ा सा अनुकूल समय आता है तो खुद को अहँकार
से भर लेते हैं या आडम्बर को पकड़ लेते हैं या अपने को महत्वपूर्ण और दूसरों को हिन
समझने का दिखावा करते हैं और विपरीत परिस्थिति आते ही गुमनामी में खो जाते हैं।
कछुआ पर्याप्त जल में रहकर भी धीर गंभीर बना रहता है और आपत्ति काल में अपनी
समस्त इन्द्रियों को वश में कर आत्म चिंतन करता है और अनुकूल समय ना आने तक
धीरज रखता है।   …। index of happiness . 

किसी भी घटना को तटस्थ भाव से समझना और महसूस करना भी योग या ध्यान का
एक प्रकार है। हम अपनी गलतियों को प्राय :पकड़ नहीं पाते हैं या उनको जैसी है वैसी
देखने का साहस नहीं कर पाते हैं। मनुष्य की आदत है की वह जब भी वह कोई गलती
करता है तब उसे देखने के लिए जिस रंग का काँच (लैंस )उसे पसंद है उसी से देखता है
जिस कारण से उसे अपनी भूल और गलती भी उचित लगती है और जब उसे अन्य की
गलती देखनी हो तो वह अपनी आँखों पर पारदर्शी काँच (लैंस)लगा कर सूक्ष्मता से
अवलोकन करता है। यदि हम इसका उल्टा करके जीने की कला सीख जाये तो सफलता
को शीघ्र पा सकते हैं औरयदि हम तटस्थ भाव से विषय वस्तु या घटना को देखते हैं और
गलत और सही की पहचान कर गलत की वास्तविक आलोचना और सही का सहयोग
करते हैं तो समाज,देश और मानवता का भला कर सकते हैं।  



  

19.8.14

कमाल खान इन्सान हैं या पत्रकार या सिर्फ मुसलमान?

कमाल खान इन्सान हैं या पत्रकार या सिर्फ मुसलमान?

19 अगस्त,2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,इसमें कोई संदेह नहीं कि एनडीटीवी के रिपोर्टर कमाल खान कमाल के रिपोर्टर हैं। उनके बोलने का लहजा और शब्दों का चयन दोनों ही लाजवाब है लेकिन आज जब मैं फैजाबाद सामूहिक दुष्कर्म और बेरहमी से,तड़पा-तड़पा कर एक लड़की की हत्या के मामले में उनकी रिपोर्ट देख रहा था तो लगा कि भले ही इन दोनों मामलों में कमाल खान कमाल हैं लेकिन वे कदाचित् इंसान हैं ही नहीं।
मित्रों,जहाँ तक मेरी परिभाषा का सवाल है तो मैं यह मानता हूँ कि इंसान वही है जो सीने पर बंदूक टिकी होने पर भी,तोप के आगे बांध दिए जाने के बाद भी पीड़ितों का पक्ष ले न कि पीड़कों का और आज की अपनी रिपोर्ट में कमाल खान सीधे-सीधे पीड़कों का पक्ष ले रहे थे। श्री खान का मानना था कि यह मामला एक व्यक्तिगत मामला है क्योंकि पीड़क व दरिंदा नदीम बता रहा है कि हिन्दू लड़की उससे प्यार करती थी और उसकी मोबाईल की दुकान पर बराबर पैसा भरवाने आती थी। इधर कुछ दिनों से लड़की उस पर शादी के लिए दबाव डाल रही थी इसलिए उसने उससे छुटकारा पाने के लिए उसकी हत्या कर दी और बड़ी बेरहमी से हत्या कर दी। तो हमारे कमाल के धर्मनिरपेक्ष कमाल खान ने बिना किसी हीला-हवाली के इस दरिंदे की बात पर विश्वास कर लिया और अपना निर्णय सुना दिया कि यह मामला सांप्रदायिक तो है ही नहीं बल्कि व्यक्तिगत है।
मित्रों,दूसरी तरफ दिवंगत पीड़िता ने पुलिस को अपने अंतिम बयान में कहा था कि फलां-फलां चार मुसलमान लड़कों ने मेरा जबर्दस्ती अपहरण किया फिर सामूहिक बलात्कार किया और बाद में उसके सारे बाल उखाड़ डाले,सारे दाँत तोड़ दिए और रीढ़ की हड्डी के भी टुकड़े-टुकड़े कर दिया लेकिन कमाल खान जी को पीड़िता की बातों पर किंचित भी भरोसा नहीं है। क्यों? क्या इसलिए क्योंकि पीड़िता हिन्दू थी और हिन्दू तो झूठ ही बोलते हैं सच तो सिर्फ मुसलमान बोलते हैं? अब आप खुद भी निर्णय ले सकते हैं कि मेरी परिभाषा के अनुसार कमाल खान इंसानियत से कोसों दूर हैं। तो फिर कमाल खान हैं क्या? क्या वे पत्रकार हैं? लेकिन पत्रकार तो प्रत्येक मामले को सिर्फ गुण-दोष के आधार पर देखता है तो इस तरह तो कमाल खान जी तो पत्रकार भी नहीं रहे। यहाँ मैं यह स्पष्ट कर दूँ कि यह मेरी परिभाषा है अब उनकी परिभाषा में पत्रकार को कैसा होना चाहिए यह तो वही बता सकते हैं।
मित्रों,हमारे कमाल खान जी वास्तव में न तो पत्रकार हैं और न ही इंसान वे तो सिर्फ मुसलमान हैं और मुसलमान भी कैसे? वे सूफी परंपरा वाले मंसूर बिन हल्लाज किस्म के मुसलमान नहीं हैं जिनको सऊदी अरब में अन हलक अर्थात् ब्रह्मास्मि की रट लगाने के चलते जिन्दा आग में झोंक दिया गया था,श्री खान इमाम हुसैन की तरह के मुसलमान भी नहीं हैं जिन्होंने पीड़ितों का पक्ष लेते हुए कर्बला के मैदान में बेनजीर शहादत दी थी। बल्कि श्री कमाल खान तो तालिबान,बोको हराम और आईएस किस्म के मुसलमान हैं जिनके अनुसार मुसलमान (खासकर सुन्नी) जो करे वही सही है और सिर्फ वही सही है। अन्यथा श्री खान को पीड़िता के दर्द के प्रति स्वानुभूति तो दूर सहानुभूति तो होती। उनके बोलने के लहजे से और बॉडी लैंग्वेज से तो यही लग रहा था कि पीड़िता जो कि एक प्रेंमिका भी थी (सिर्फ दरिंदे नदीम और महान पत्रकार कमाल खान के अनुसार) को शादी के लिए कहने का कोई अधिकार नहीं था और चूंकि उसने यह अक्षम्य अपराध किया इसलिए नदीम का कर्त्तव्य था कि वो निहारत बहसीपना करके उसकी हत्या कर दे और सो उसने अपना कर्त्तव्य निभाया। फिर तो नदीम को राजकीय सम्मान मिलना चाहिए। है न कमाल खान जी?
मित्रों,मैं कमाल खान जी से पूछना चाहता हूँ कि अगर ऐसी हरकत किसी हिन्दू चांडाल चौकड़ी ने किसी मुसलमान लड़की के साथ किया होता तब भी क्या यह व्यक्तिगत मामला होता? वैसे मैं यहाँ स्पष्ट कर दूँ कि महिला चाहे हिन्दू हो या मुसलमान और पीड़क चाहे हिन्दू हो मुसलमान मेरा मानना है कि हर महिला का दर्द एकसमान होता है और हर पीड़क को सिर्फ एक ही दंड देना चाहिए-सड़क पर खड़ा करके पत्थरों से मार देना चाहिए और ऐसा होने पर पहला पत्थर मैं मारूंगा। तो मैं कह रहा था कमाल खान जी महाराष्ट्र सदन में रोटी खिलाने की घटना तो कमाल खान जी की नजरों में सांप्रदायिक थी लेकिन फैजाबाद का इंसानियत को शर्मसार कर देनेवाली घटना व्यक्तिगत है? हिन्दू लड़कियों को घर से निकलने से पहले लाख बार सोंचने को मजबूर और भयभीत कर देनेवाली घटना व्यक्तिगत है? वाह रे हमारे धर्मनिरपेक्ष चैनल,धर्मनिरपेक्ष पत्रकार और उनकी धर्मनिरपेक्षता। एक बात और आगे से जब भी किसी हिन्दू लड़की के साथ मुसलमानों द्वारा सामूहिक बलात्कार होगा तो धर्मनिरपेक्ष मीडिया,यूपी पुलिस और दरिंदे मिलकर यही कहेंगे कि लड़की लड़के से प्यार करती थी और ऐसे प्यार का अंजाम जो होना चाहिए वही हुआ। मतलब कि बलात्कार तो हुआ ही नहीं वह तो प्यार था यह बात अलग है कि इसे कई मानवता प्रेमी प्रेमियों ने मिलकर अंजाम दिया। यह ज्ञान आज मुझे श्री कमाल खान की रिपोर्टिंग देखकर ही प्राप्त हुआ है जिसके लिए मैं उनका बहुत-बहुत-बहुत-बहुत आभारी हूँ। तहेदिल से!


(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

17.8.14

सफलता के लिए गीता अध्ययन करे

सफलता के लिए गीता अध्ययन करे 

श्रीमद भगवत गीता को धार्मिक ग्रन्थ मानकर हम उसे पढ़ते नहीं है जबकि
अन्य विदेशी लेखकों के अपूर्ण ज्ञान की ढेरों किताबें पढ़ लेते हैं। सँस्कृत
साहित्य की घोर उपेक्षा आजादी के बाद हुयी जब देश के ओछे राजनीतिज्ञ
इन शास्त्रों के ज्ञान को केवल हिन्दुओं से जोड़कर देखने लगे जबकि ज्ञान तो
सबका कल्याण करता है पर स्वार्थियों और मूढ़ों को क्या कहे।

संसार का हर मनुष्य सफल होना चाहता है और वह प्रयासरत भी रहता है
परन्तु फिर भी असफल हो जाता है ,क्यों ? इसी प्रश्न का उत्तर श्री कृष्ण गीता
के माध्यम से दे चुके हैं।

कार्य को कैसे शुरू करे 

हम जब भी कोई काम करते हैं तो उसका लक्ष्य जरूर बनाते हैं और उसे प्राप्त
करने का प्रयास भी शुरू करते हैं मगर कुछ दिनों के बाद जब वांछित फल
दिखाई नहीं देता है तो हम विषाद और निराश हो जाते हैं और काम को करने
की गति को कम कर देते है या रोक देते हैं या ध्येय बदल लेते हैं या अन्य लोगों
का अनुसरण करने की कोशिश करते हैं इनका सबका परिणाम शुभ नहीं आता
और अंत में हम पराजय को स्वीकार कर लेते हैं।

  श्री कृष्ण कहते हैं कि हम इस पद्धति को बदल डाले। मनुष्य को अपना लक्ष्य
बहुत सोच समझ कर तय करना चाहिए ,उसका रोडमेप तैयार करे,संभावित
बाधाओं को रेखांकित करे,आवश्यक ज्ञान और उपयोगी सामग्री एकत्रित करे
और उस लक्ष्य को स्थापित कर दें ,लक्ष्य बनाने के बाद लक्ष्य को बदलना
पराजय को वरण करना है या मन में लक्ष्य को पाने में खुद को छोटा समझना
खुद को अयोग्य समझना भी पराजय को स्वीकार करना कहा जायेगा।

हमें लक्ष्य तय करने के बाद अपने मन में संकल्प को मजबूत करना होगा ,यदि
हमारा संकल्प मजबूत होगा ,शंका रहित होगा ,स्पष्ट होगा तो हमारा आत्म विश्वास
मजबुत होता जायेगा। अब हमें लक्ष्य की ओर चलना है और इस मार्ग पर ढेरो
बाधाएं रहेगी। बाधाओं से लड़ने के लिए धीरज चाहिए ,सकारात्मक नजरिया
चाहिये,कर्तव्य को पूरा करने की तत्परता चाहिए अगर हम लक्ष्य की उपेक्षा
कठिनाइयों को देख कर करेंगे तो पराजय और अपयश निश्चित है। श्री कृष्ण
का सन्देश है कि सफलता के मार्ग पर आप हानि और लाभ,जय या पराजय
के बोझ को सिर से उतार कर केवल प्रयास रत रहे ,थोड़ा -थोड़ा ही मगर आगे
बढ़ते जाये ,यहाँ पर आत्महीनता या कुशंका मन में ना लाये। ओलम्पिक दौड़
में सभी मैडल नहीं पाते हैं मगर दौड़ते तो सभी हैं और लक्ष्य को किसी ना किसी
समय में छूते जरूर हैं। अंतिम दौड़वीर को भी हारा हुआ नहीं माने क्योंकि उसने
भी कुछ ज्यादा समय भले ही लिया हो मगर लक्ष्य को छुआ तो है। हमे सफलता
अन्य लोगों के मुकाबले देरी से मिल रही है यह सोच के निराश ना हो बस दौड़
चालू रखे,बंद ना करे ,यह सफलता के लिए पर्याप्त है।

हम प्राय: दौड़ पूरी करके वांछित फल ना पाकर उदास हो जाते हैं और नई दौड़
में भय के कारण भाग नहीं लेते ,यह उदासी ही अकर्म है ,अकर्तव्य है। श्री कृष्ण
यही कहते हैं कि काम को काम की भावना से करो उसको असफलता या सफलता
से तत्काल मत जोड़ो। किसी भी परीक्षा में जब हम असफल हो जाते हैं इसका अर्थ
यह नहीं कि हम अयोग्य हैं ,इसका मतलब यह भी है कि उस परीक्षा के लिए और
अधिक ज्ञान बढाने या मेहनत करने की समय द्वारा माँग है जिसे हमें एकाग्र मन
बुद्धि से पूरा करना है। मन की एकाग्रता ही कार्य कौशल है।कर्म को सावधानी
पूर्वक निरंतर करते रहने से सफलता आती ही है ,शंका का कोई स्थान नहीं है।

श्री कृष्ण कहते हैं कि लक्ष्य के मार्ग पर बढ़ते समय आलस्य ना करे ,स्वामित्व के
दावे के बिना काम करे ,लाभ हानि के पचड़े को छोड़कर काम करें। प्राय:जब भी हम
कोई काम करते हैं तब अहँकार के प्रभाव में आ जाते हैं यह अति आत्म विश्वास
भयावह है ,इससे बचे। सफलता के लिए तीन बातों को छोड़ देना है १. फल की
आसक्ति 2. भय या निराशा 3. क्रोध। इस रोडमेप पर चलकर हम सफल हो सकते
हैं ,बाधाओं से झुंझना सीख सकते हैं ,जीवन रूपी नौका को सहजता से लक्ष्य
तक पहुँचाना सीख सकते हैं।

 
         

16.8.14

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं

सौभाग्य है कि आप इस पछतावे से दूर हैं 

वे गाँव के बुजुर्ग थे शायद अपना नाम भी ठीक से नहीं लिख पाते हैं। आज की
वर्तमान टेक्नोलॉजी की बिलकुल जानकारी नहीं रखते हैं। उनके पास बैठा मैं
बतिया रहा था। बातों ही बातों में मैने उनसे पूछा -बाबा,क्या आपको अब तक
जी हुयी जिंदगी से संतुष्टि है ?
बाबा बोले -बेटे ,हर मनुष्य भूलों का पुतला है। मैनें भी एक भूल की जिसका
पछतावा है ?
मैनें पूछा-क्या वह बात मुझे बता सकते हैं ?
बाबा बोले -क्यों नहीं,वह बात बताने से मेरा मन भी पश्चाताप करके हल्का हो
जायेगा और कोई उससे सीख भी लेगा।
थोड़ी देर बाद उन्होंने कुछ याद करते हुए कहना शुरू किया -बेटा ,जब मैं दौ
साल का था और ठीक से खड़ा भी नहीं हो पाता था तब मेरे पिता जवान थे
उन्होंने मुझे खड़ा होना सिखाया और जब मैं लड़खड़ाते हुए डग भरना सीखता
था तो उनके मजबूत हाथ मेरी पीठ की तरफ सुरक्षा कवच बन कर तैयार
रहते थे। उनके कारण मैं दौड़ना सीख गया। वो मुझे जब भी मन्दिर ले जाते
थे तब मैं भगवान के दर्शन नहीं कर पता था तब वे अपने कन्धे पर बैठा कर
दर्शन करवा देते थे। जब मैं उनके साथ मेले में जाता था कुछ कदम चल कर
भीड़ देख घबरा जाता था तो वे बिना झिझक के मुझे पुरे मेले में कंधे पर या
गोदी में सवारी कराते थे। मेरे पिता कभी कभार कमीज पहनते थे ,प्राय :
बनियान ही पहनते थे कारण उनके पास आमदनी कम थी मगर मेरे लिए
३-४ कमीज हर साल लाते थे। जब मैं किशोर आयु का हुआ तो उनका प्रयास
रहता था कि मैं अच्छा पढ़ लिख जाऊँ मगर मैं पढता नहीं था केवल स्कुल
जाने का ढोंग रचता था,मेरी असफलता के समय वो मेरा हौसला बढ़ाते और
पढ़ने को प्रोत्साहित करते मगर मैं उन्हें धोखा दे देता। मेरी स्कुल बंद हो
गयी और मैं उनके साथ खेत पर जाने लगा। कुछ साल बाद मेरी शादी कर
दी ,उस समय उन्होंने जितनी पूँजी जमा की थी सब मेरी शादी में खर्च कर दी।

कुछ साल बाद मेरे बच्चे हो गए और मेरे पिता बूढ़े हो गये। अब वो खेत का
काम नहीं कर पाते थे तब मुझे लगता कि सारा काम का भार मुझ पर डाल
अब ये आराम फ़रमाते हैं। उन्हें बैठे देख बहुत बार मैं उन्हें झिड़क देता वो
मेरी कठोरता से उदास हो जाते और कभी कभी शुन्य में ताकने लगते। मेरी
पत्नी को वे अप्रिय लगते थे क्योंकि वे दिन भर खाँसते रहते या उसके गैर-
बर्ताव पर चिल्ला उठते। पत्नी जब उनकी शिकायत मुझसे करती तो मैं उन्हें
खूब भली बुरी सुनाता  .... कहते हुये बुजुर्ग का गला भराने लगा। बूढी आँखों
में आँसू आ गए थे। मैं उनकी ओर ताक रहा था। थोड़ी देर की चुप्पी के बाद
वो बोले -कुछ साल बाद मेर पिता को आँखों से दिखना बंद हो गया ,मुझे
लगा अब आफत गले पड़ गयी है। उनको पाखाने लेकर जाना ,नहलाना
जैसे काम बढ़ गए थे। मेरी पत्नी उनके मरने की राह देखने लगी। उन्हें
दौ समय खाना भी रुखा सुखा दिया जाने लगा मगर वो कभी शिकायत नहीं
करते थे। कुछ महीने बीमार रह कर वो स्वर्ग सिधार गए उस समय मैं
50 साल का हो चूका था। मुझे उनकी मौत पर बहुत कम अफ़सोस और मन
में सुकून ज्यादा था। अब मैं अपनी गृहस्थी में लग गया। मेरे बच्चे पढ़ लिख
गए थे और देखते ही देखते मेरे बाल सफेद हो गए ,हाथ पैर जबाब देने लगे
अब मेरे साथ भी वही होने लगा जो मेने अपने पिता के साथ किया था।
एकाद बार बच्चो और बहु से अच्छा व्यवहार करने को कहा तो लड़के ने जबाब
दिया -आपने कौनसा सेवा का काम अपने बाप के लिए किया। बस तब से
मुझे पछतावा होता है कि काश!मेने माँ -बाप की सेवा और इज्जत की होती
मगर…… अब समय चला गया हाथ से।     

पतित पावन पतरातू - एक रेल यात्रा

हर एक वो जगह जहाँ ट्रेन रुकती है, स्टेशन नहीं होता।

उस औरत को यह मालूम न था।

ट्रेन रूकती नहीं की पूछ पड़ती -

“कौना टेशन है बबुआ?”



हर एक वो ट्रेन जो चलती है, पतरातू नहीं जाती।

उस औरत को तो यह भी न था पता।

जो भी जिस ट्रेन में कहता चढ जाती और कहती -

“पतरातू आते बतला दीहऽ बबुआ”



कुल मिलाकर वो उसकी तीसरी ट्रेन थी और वो भी पतरातू नहीं जा रही थी। लोगों से सलाह मिली धनबाद में उतर कर दूसरी ट्रेन लेने की, पर उसे कितना समझ आया वो वह ही जानती थी। वह बार-बार बंद दरवाजों और खिड़कियों को खोल बाहर झाँकना चाहती, जैसे अपनी धरती, अपने खेत, अपना घर आते हीं पहचान लेगी। पर उसे गेट और खिड़कियाँ खोलना भी नहीं आता था। बार-बार असफल प्रयास किया उसने गेट को खोलने का, फिर थक कर बैठ गयी।



उस औरत का स्लीपर से सरोकार क्या?

टिकट और जुर्माने से सरोकार क्या?

काले कोट और खाकी वर्दी वालों से सरोकार क्या?

नए रेल बजट से सरोकार क्या?



वो डब्बा स्लीपर वाला था, टिकट थी उसके पास जेनरल की और वो भी पिछले दिन की (वह पिछले दिन से सफर कर रही थी)।  कभी काले-कोट वाले फटकार कर चले जाते, कभी खाकी वर्दी, तो कभी कोई अन्य यात्री। सभी एक ही भाषा में बात करते -

“हुह!... उहाँ जाकर बईठो” ,

“होने जाओ, होने” ,

“जेनरल में जाकर बईठो”



किसी वेटिंग वाले ने संवेदना से कह दिया -

“गेटेर पाशे बोशे जान ... गेट के पास बैठ जाईए”

तो चढ़ने-उतरने वाले डाँटने लगे कि

“गेट तो छोड़ के बैठो”

  

आखिर में वो अपनी गठरी लेकर शौचालय के बाद डिब्बों के जुड़ाव वाली जगह पर बैठ गयी जहाँ गंध तो आ रही थी पर अभद्र फटकारों से अच्छी थी। जुड़ाव वाला स्थान जहाँ वो बैठी थी लहरों सा ऊपर नीचे हो रहा था। वो बगल के फाँकों से नीचे पटरियों के बीच झाँकने लगी और मुस्कुराते हुए उसी में मग्न हो गयी। उसे देख ऐसा लग रहा था कि मनो वो किसी ट्रेन में नही बल्कि एक नाव में बैठी है। नाव लहरों पर ऊपर नीचे हो रही है और वह औरत नीचे नदी की उलटी धार को चीरती हुई उसकी नाव को देख आनंदित हो रही है। उसे अपने खेवैये पति पर भी खूब भरोसा है कि वो उसे पतरातू तक जरूर ले जा पायेगा सुरक्षित। बैठे-बैठे उसकी आंखें लग गयी। फिर थोड़ी देर बाद वह वहीँ लेट गयी।



शाम से रात हो चुकी थी।



कुछ देर बाद एक भूंजा वाला पिछले डब्बे से आया और उसकी गठरी पर पैर रख दिया। अचानक उसका ध्यान टूटा और उसके मुँह से फूट पड़ा -

“अभगला, ई मोटरी में कशी बाबा के परसाद हथीन, करम फूट गेल हउ का तोहर? जो.. जो.. जो..”

भूंजा वाला कुछ बुदबुदाता चला गया।

 उस रस्ते अब कुछ और भी लोग आने लगे थे। कभी अंडा वाला, कभी पानी वाला, कभी गुटखे वाला, कभी हरा-चना वाला तो कभी चाय वाला।

इसी आने-जाने के क्रम में एक और मुसीबत आई। एक अंडे वाले की बाल्टी उसके सर पर जोर से लग गयी और वह तिलमिला उठी -

“अन्हरा मुझऊंसा मार देलक रे मार देलक...”

 अंडे वाले ने भी जबाब दिया -

“रास्ता पर बईठेगी त अईसाहीं न होगा, जेनरल में काहे नहीं जाती है”

 झगडा बढ़ने लगा और दोनो गालियों पर उतर आये। वो यात्री जिनकी अभी-अभी मीठी नींद लगी थी, जाग गए और चिल्लाने लगे दोनों पर। औरत को भी जम कर डांटा गया -

“जेनरल बना है न तुम्हारे लिए, जाओ.. जेनरल में जाकर कहे नहीं बैठती? टीटी साहेब को आने दो बेलगाते हैं तुमको यहाँ से”



काले कोट वाले साहब आये और हिदायत दिया कि “अगले स्टेशन आने पर जेनरल में नहीं गयी तो जेल में डाल देंगे”

औरत ने पूछा “जेनरल केने है?”

टीटी साहेब बोले “पीछे का चार डब्बा छोड़ के अगला वाला डब्बा”

“आठ गो गेट छोड़ के अगला गेट”



अगला स्टेशन काफी छोटा था, ट्रेन का तो स्टॉपेज भी नहीं था सिर्फ सिग्नल के लिए रुकी थी। वह औरत झट से उतरी, गेट गिनते-गिनते जेनरल बोगी तक पहुँची पर भीड़ देख कर दंग रह गयी। जेनरल बोगी पूरी खचाखच भरी हुई थी। होली की भीड़ थी, सभी कमा कर अपने-अपने घर वापस जा रहे थे। उसने बहुत कोशिश की पर चढ़ नहीं पायी। किसी ने बोला पीछे वाले डिब्बे में जाओ तो वह पीछे चली गयी पर उधर भी वही हालत। फिर किसी ने बोला पीछे जाओ और वो पीछे चलती गयी पर किसी में भी जगह नहीं मिली उसे चढ़ने को। उसे कुछ समझ नहीं आया वो वापस अपनी पुरानी जगह लौटने लगी। इसी बीच ट्रेन खुल गयी और वो दौड़ने लगी ट्रेन से तेज पर थोड़ी देर में ट्रेन और तेज हो गयी और वो चिल्लाती रह गयी -

“रोकऽ.. रोकऽ.. रोकऽ न हो भईया..या.. टरेन रोकऽ न.....”

ट्रेन की रफ़्तार तेज होने लगी और उसकी धीमी। ट्रेन अपने पूरे होश में दौड़ने लगी और वह औरत हाँफते हुए बेसुध गिर गयी वहीँ प्लेटफार्म पर। जब तक ट्रेन थी, प्लेटफार्म पर रौशनी थी, ट्रेन जाते ही अँधेरा छा गया ठीक उसकी किस्मत के इन दो दिनों जैसा।



जिस तरह अपने किसी सहयात्री के गिरे पड़े होने से ट्रेन को कुछ फर्क नहीं पड़ता, ठीक वैसे ही ज़माने को किसी एक वर्ग के पतित-पिछड़े होने से फर्क नहीं पड़ता.. हम चलते जाते हैं उन्हें कहीं पीछे गिरा-पड़ा छोड़। – प्रकाश ‘पंकज’

15.8.14

हम और हमारा देश

हम और हमारा देश 

हम शिकायत कर्ता बनें ,यह जरूरी भी है परन्तु शिकायत करने से पहले हम अपने
गिरेबान में झाँक कर देखें कि कहीँ सिस्टम की समस्या का एक कारण हम स्वयं
तो नहीं बने हुए हैं।

मतदान करके सरकार चुन कर हम अपने कर्तव्यों से फ़ारिग होते रहे हैं। हम यही
सोचते हैं कि अब सारी समस्याओं पर बैठे -बैठे निराकरण पाना है। घर का एक
मुखिया परिवार को ठीक से चलाने के लिए सब सदस्यों की जरुरत महसूस करता
है वरना घर चलाने में खुद को असहाय महसूस करता है  और हम 125 करोड़ लोगों
का परिवार 550 से कम प्रतिनिधियों पर छोड़ कर अच्छे दिन का सपना पूरा होते
देखना चाहते हैं!!!

इस गरीब देश के नागरिक गरीब होते हुए भी दान देने में जुटे रहते हैं,यह एक श्रेष्ठ
बात है मगर वह दान सृष्टि कर्ता के नाम पर देने के बाद अनुपयोगी रह जाता है।
जब एक सरकार अपने नागरिकों से कर के रूप में दान माँगती है तब उसे अनुपयोगी
कृत्य समझ हम दूर हट जाते हैं। साल में पचास -सौ रूपये भी हर नागरिक सरकार
को सहर्ष कर्तव्य समझ कर देता है तो छोटे-छोटे समाधान रास्ता बनाते जायेंगे।

विदेशी भाषा सीखना उत्तम बात है क्योंकि उस भाषा के माध्यम से हम सृष्टि के
उस भाग में रहने वाले लोगों के विचार समझते हैं लेकिन हद तो तब होती है जब
यह सब हम राष्ट्र भाषा का मूल्य चूका कर करते हैं,जिस भाषा को देश के ९०%
लोग पूरी तरह से समझते भी नहीं है उनके सामने उस भाषा का प्रयोग हमें कैसे
समृद्ध करेगा ?लेकिन हम विदेशी भाषा को कन्धे पर लाद कर अच्छे समय की
आशा करते हैं!!

बड़ा आश्चर्य होता है जब हमारा मीडिया बे सिर पैर के विश्लेषण कर देश के लोगों
का समय नष्ट करता है या मूल्यहीन खबरें दिखाता है। इनका तो धन्धा है यह
समझा जा सकता है मगर इस देश के नेता,विद्धवान और शिक्षित लोग जब इस
प्रकार के घटिया मूल्यहीन,वास्तविकता से परे विश्लेषणों और बहस में भाग लेते
समय नष्ट करते हैं तब आम नागरिक माथा पीटता है!!      

आजादी

आजादी 








निरी अहिँसा के बुते तो सपना बन जाती आजादी  
दुश्मन के सर कलम किये उसका नतीजा आजादी 

निशस्त्र खड़े होते रण में तो सपना रहती आजादी
लावा बनके बही जवानी उसका नतीजा आजादी 

भूखे रह कर तप करने से किसने किसको दी आजादी
वीर शहीदों ने जब खेली होली उसका नतीजा आजादी 

आग्रह अनशन करने भर से कभी ना मिलती आजादी
चुन चुन कर दुश्मन को मारा उसका नतीजा आजादी 

शांति मन्त्र जपते रहने से सपना बन जाती आजादी 
इन्कलाब और जय-हिन्द जिसका नतीजा आजादी 

14.8.14

धर्म निरपेक्षता को लेकर राजनैतिक दल एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने के बजाय देश के विकास को सर्वोपरी माने यह समय की मांग है
आज हम 68 वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे है।  आजादी के बाद हमने प्रजातंत्र को अंगीकार किया जिसमें समाजवाद के साथ धर्म निरपेक्षता को स्वीकार किया। प्रजातंत्र में सत्ता हासिल करने के लिये राजनैतिक दलों और नेताओं ने कई शार्ट कट भी अपनाये और सत्तासीन हुये। कहीं कभी क्षेत्रीयता को आधार बनाया गया तो कहीं भाषा को,तो कहीं जाति को और कहीं धर्म को। इससे सत्ता तो नेताओं को मिल गयी लेकिन विश्व बंधुत्व को मानने वाले हमारे देश में विभिन्नता में एकता भारत की विशेषता के बजाय आपस में दूरियां बढ़तीं गयीं। समाज टुकड़ों में बंटने लगा और आपसी सदभाव कम होते गया। लेकिन शार्ट कट से सत्ता का स्वाद चखने वाले नेताओं ने इससे कोई सबक नहीं लिया। ब्लकि यदि देखा जाये तो आजादी के इन 67 सालों में सबसे अधिक विवाद और बहस यदि किसी एक शब्द पर हुयी है तो वह है धर्म निरपेक्षता।  हमारे संविधान में देश के हर नागरिक को अपना अपना धर्म मानने की पूरी आजादी दी गयी है। लेकिन जबसे धर्म के नाम पर राजनीति करने की शुरुआत हुयी तबसे इस पर विवाद और बहस तेज होने लगी। देश के प्रमुख राजनैतिक दल इसकी मूल भावना को समझने के बजाय आपस में एक दूसे पर आरोप प्रत्यारोप लगाने में मशगूल हो गये।  कहीं कोई किसी पर तुष्टीकरण का आरोप लगाता तो कहीं कोई किसी पर राजनैतिक मंच से धार्मिक मुद्दे उठाकर राजनैतिक लाभ लेने के आरोप लगाते देखा गया।  प्रमुख राजनैतिक दलों के ऐसे रवैये से साम्प्रदायकि सौहार्द बिगड़ने लगा और देश के कई हिस्सों में ऐसे सांप्रदायिक दंगे हुये जिन्होनें पूरी दुनिया में देश को शर्मसार कर दिया। यह भी सच है कि देश का आम आदमी अपने धर्म के प्रति बहुत संवेदनशील है। लोगों की इसी धार्मिक भावना का नेताओं ने राजनैतिक रूप से शोषण करने में कोई गुरेज नहीं किया। लेकिन हमारी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रजातंत्र में हमारी अटूट आस्था है इसीलिये हमारे देश में बड़े से बड़ा राजनैतिक परिवर्तन बुलेट के बजाय बैलेट से ही हुआ है।  जबकि इसके विपरीत हमारे ही साथ आजाद हुये पाकिस्तान में मजहबी कट्टरता के कारण हालात ऐसे हो गयें है कि वहां के कई अहम परिवर्तन बुलेट से ही होते रहें है। विश्व व्यापी आर्थिक मंदी के इस दौर में भी हमारी अर्थ व्यवस्था दुनिया में चौथे नंबर पर है। देश के सर्वांगीण विकास करने के लिये बहुत सारे रास्ते खुले हुये है।  बीस साल तक देश में गठबंधन की राजनीति के दौर के बाद आज देश में एक पार्टी की मजबूत सरकार पदारूढ़ है। पूरा देश भी अच्छे दिन आने की राह देख रहा है। इसीलिये आइये स्वाधीनता दिवस के इस पावन अवसर पर हम यह संकल्प लें  कि अब हम देश ने हमें क्या दिया? यह सोचने के साथ यह भी सोचें कि हमने देश को क्या दिया? अपने संकीर्ण निजी और राजनैतिक स्वार्थों को दर किनार कर विश्व बंधुत्व और सर्व धर्म समभाव के उस मूल मंत्र अमल करना प्रारंभ कर दें जिसके लिये पूरी दुनिया में हमारा देश जाना जाता है। हमारा देश तेजी से प्रगति की ओर अग्रसर हो और स्वतंत्रता दिवस की अगली वर्षगांठ पर हम गर्व से यह कह सकें कि हमने जो संकल्प इस साल लिया था उस पर पूरी ईमानदारी से हमने अमल किया। यही स्वतंत्रता दिवस पर हमारी शुभकामनायें है।    
आशुतोष वर्मा
919425174640

12.8.14

छोटी-छोटी पहल से बचेगी विशाल धरती

- संतोष सारंग

पांच अगस्त को संध्या काल में पर्यावरण व गांधी चिंतन-दर्शन का जाना पहचाना नाम अनुपम मिश्र से नयी दिल्ली स्थित गांधी शांति प्रतिष्ठान के दफ्तर में एक संक्षिप्त मुलाकात हुई. प्रभात भाई को धन्यवाद. उनके प्रयास से अनुपम भाई से मिल सका. आइपीसीसी की पांचवीं एसेसमेंट रिपोर्ट पर पैनोस साउथ एशिया व सीडीकेएन की ओर से आयोजित एकदिवसीय मीडिया वर्कशॉप में भाग लेने के बाद सीधे आइटीओ पहुंचा. मन में ढेरों सवाल थे- क्लाइमेट चेंज, प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, मर-मिट रहे जलस्त्रोतों, दुनियाभर में पर्यावरणवादियों की ओर से पृथ्वी को बचाने के लिए किये जा रहे प्रयासों को ले. ‘आज भी खड़े हैं तालाब’ अनुपम भाई का शोधपरक दस्तावेज है. इस चर्चित पुस्तक की लाखों प्रतियां कई संशोधित संस्करणों के रू प में प्रकाशित हो चुकी हैं. समाजकर्मियों, कार्यकर्ताओं ने अपने पैसे से इसे प्रकाशित करते रहे हैं. कई संगठनों का भी योगदान रहा है इसके प्रकाशन में, यह जानकार अच्छा लगा. चलिये, देश में कुछ अच्छे लोग, ग्रासरू ट में काम करनेवाले संगठन तो हैं. अनुपम भाई से सवाल किया, धरती कैसे बचेगी? सीधा सा जवाब मिला, मैं चिंता नहीं करता, काम करता हूं. देश में कई जगह अच्छे काम हो रहे हैं. कई लोग बिना प्रचार-प्रसार व शोर के प्रकृति व पर्यावरण बचाने में लगे हैं. उन्होंने ‘आज भी खड़े हैं तालाब’ की संशोधित संस्करण की एक प्रति भेंट की. कई पोस्टर भी दिये, जिनमें तालाब को बचाने से जुड़ा प्रसंग छपा है. साथ ही, गांधी दर्शन से जुड़ी कई किताबें दीं. मंगलवार का वह पूरा दिन व रात पर्यावरण के नाम रहा. चलते-चलते उन्होंने कहा, चिंता करने से धरती नहीं बचेगी, छोटे-छोटे प्रयास करने होंगे. उनसे मिलकर मेरे भीतर ऊर्जा का संचार हुआ. दिव्य व्यक्तित्व का दर्शन पाकर प्रेरित हुआ. इसी शाम खादी के युवातुर्क लोकेंद्र भारतीयजी से भी आदिम जाति में मुलाकात का मौका मिला. ढेर सारी बातें हुई. गांधीवादी रामचंद्र राही के काम के बारे में जाना.

अनुपम भाई के बहाने उस रात तालाब व अन्य परंपरागत जलस्त्रोतों के बारे में सोचता रहा. देश के अन्य राज्यों की तरह बिहार में भी कुएं, तालाब व आहार-पईन मरते-मिटते जा रहे हैं. दरभंगा तालाबों का शहर कहलाता रहा है. जमीन की आसमान छूती कीमत के कारण आज इस शहर में कुछ ही तालाब बचे हैं. पूरे मिथिलांचल में तालाब व मखाने का अटूट नाता रहा है. तालाबों की संख्या घटने के कारण मखाने की खेती में गिरावट आई है. जो तालाब बचे हैं, वे बरसाती बन गये हैं. जलस्तर भी गिर रहा है. अमूमन यही स्थिति राज्य के अन्य हिस्सों की है. ये सारी चिंताएं मन में उभर रही थीं. 

दिन में कार्यशाला में आइपीसीसी की रिपोर्ट के तमाम बिंदुओं पर चर्चा होती रही. पैनोस साउथ एशिया के गोपी एस वारियर ने अपने संबोधन से कार्यशाला का शुभारंभ किया. देशभर के पर्यावरण पर लिखनेवाले वरिष्ठ पत्रकारों का संगत मिला. नोबेल विजेता ‘आइपीसीसी’ के वरिष्ठ अधिकारी जोनाथन लीन के भाषण से प्रथम सत्र की शुरुआत हुई. उन्होंने आइपीसीसी के संगठनात्मक ढांचे, उसकी गतिविधियों, नीतियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी. इसके बाद जाधवपुर यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर जॉयश्री रॉय ने महत्वपूर्ण जानकारी दी. आइपीसीसी एआर 5 रिपोर्ट को तैयार करने में 85 देशों के 800 लेखकों ने अपनी ऊर्जा खर्च की. उन्होंने बताया कि देश का सकल घरेलू उत्पाद व जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सजर्न में भी वृद्धि हो रही है. प्राय 80 फीसदी जीएचजी का उत्सजर्न 2000 से 2010 के बीच हुआ, जिसके लिए सबसे ज्यादा इनर्जी व इंडस्ट्री सेक्टर जिम्मेदार है. जबतक मनुष्य अपने व्यवहार व सोच में बदलाव नहीं लायेगा, तबतक कुछ नहीं होनेवाला है. जर्मनी व स्वीट्जरलैंड में कार शेयरिंग के जरिये लोग पर्यावरण संरक्षण कर रहे हैं. भारत में भी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली को अपनाना होगा. नवरोज के. दुबाश ने कार्बन टड्रिंग पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि स्वीडन, नाव्रे, डेनमार्क कार्बन टैक्स को ले गंभीर है. सरकार को कार्बन पर टैक्स लगाना चाहिए.


10.8.14

स्वाधीनता के मायने

स्वाधीनता के  मायने

हमारे पर मुगलों ने शासन किया ,अंग्रेजों ने किया ,लम्बे संघर्ष के बाद देश दासता से मुक्त
हुआ और हम वापिस मानसिकता से गुलाम कर दिये गये।
आजाद होने के बाद देश का नेतृत्व भारतीय नागरिको को भारतीयता की जगह धर्म के
आधार पर देखने का निर्णय किया और देश में विभिन्न धर्मावलम्बी देख एक नई विचार
धारा को रखा जिसे धर्म निरपेक्षता नाम दिया। धर्म निरपेक्षता ने भारतीयता को हासिये
पर धकेल दिया इसका दुष्परिणाम तुष्टिकरण के जहर के रूप में आया और अपने ही देश
में बहुसंख्यक हिन्दुओं को राजनेता सांप्रदायिक परोक्ष रूप में समझने लगे। देश का इतिहास
गलत प्रस्तुत किया गया और पढ़ाया जाने लगा। हम अपने बच्चों को मुग़ल शासनकाल को
महान बता कर पढ़ने को मजबूर करते रहे। क्या जिसने भी हिन्दुस्थान पर आक्रमण किया
वह समय हमारे लिए स्वर्णयुग हुआ ?फिर मुग़ल आक्रमणकारियों को महान पढ़ कर हम
देश का किस रूप में गौरव बढ़ा रहे हैं ,भविष्य में यह हाल रहा तो अंग्रेजों को भी महान
हमारी पीढ़ियों को पास होने के लिए पढ़ना पड़ेगा !!!

भारत को जबसे धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र माना गया है तबसे सबसे बड़ी क्षति देशप्रेम की भावना और
आपसी सौहार्द की हुई है इसका कारण थी तथाकथित धर्म निरपेक्ष राजनैतिक पार्टियाँ। भारत
की ताकत धर्मनिरपेक्षता ना कभी थी और ना कभी होगी। इस देश की असली ताकत वेद से
आई है जो सर्व धर्म समभाव  है। अब सवाल यह उठता है कि क्या संविधान से धर्म निरपेक्ष
भारत की जगह "सर्व धर्म समभाव "भारत लिखने का समय आ गया है ?यदि सर्व धर्म समभाव
आयेगा तब समान नागरिक अधिकार का उदय होगा और पक्षपात/तुष्टिकरण की राजनीती का
नाश होगा।

आज जब भी समान नागरिक अधिकार और कानून की बात आती है तो लोग धर्म के नाम पर
हायतौबा मचाने लगते हैं। क्या भारत के नागरिक एक ही जुर्म पर अलग अलग सजा पाएंगे ,
धर्म प्रधान है या राष्ट्र ?यह तय करने का समय आ गया है।

व्यंग -अंतरिक्ष में भारत से मानव भेजने की बात आई ,बात राजनेताओं तक पहुंची। राजनेताओं
ने सर्वदलीय मीटिंग रखी और सबने तय किया -अंतरिक्ष में चार हिन्दू,दो मुस्लिम ,एक दलित ,एक
ईसाई ,एक पारसी भेजा जाये जब वैज्ञानिकों के पास यह फैसला गया तो वे सर पकड़ कर रह
गए। 

हम गन्दा न करें तो साफ ही है गंगा

निर्मल गंगा का सवाल

Ganga in Peril : Building more barrages will finish it off


गंगा योजना के विरोधाभास


8.8.14

पारस को खोजती पूरे एक महीने बाद पहुँची पुलिस घटनास्थल पर-ब्रज की दुनिया

08-08-2014,हाजीपुर,ब्रजकिशोर सिंह। मित्रों,हमने कुछ महीने पहले पढ़ा था कि अमेरिका में किसी की लिखी हुई चिट्ठी अपने गन्तव्य तक लगभग 100 साल बाद पहुँची लेकिन हमारी बिहार पुलिस और खासकर वैशाली पुलिस तो उस चिट्ठी से भी ज्यादा सुस्त है। हमने 16 जुलाई को लिखा था कि एफआईआर दर्ज करा के पछता रहा है पारस और बताया था कि 11 जुलाई की रात को चोरी हुई और 16 तारीख तक पुलिस का कहीं अता-पता नहीं था जबकि पारस का पड़ोसी होने के नाते मैं कई-कई बार वैशाली के पुलिस अधीक्षक सुरेश प्रसाद चौधरी से बात कर चुका था। हमने आपको यह भी बताया था कि संभावित चोर नत्थू साह पारस को सपरिवार जान से मारने की धमकी दे रहा था जिसके चलते उसने चोरी के बाद 15 दिनों तक डर के मारे दुकान तक नहीं खोली थी। बाद में मेरे द्वारा हिम्मत देने के बाद बेचारे ने दुकान खोलना शुरू किया।

मित्रों,यह बड़े ही हर्ष का विषय है कि आज हमारी उम्मीद के विपरीत घटना के पूरे एक महीने के बाद हाजीपुर नगर थाना की पुलिस प्रकट हुई। इससे पहले कल ही मुझे पारस ने बता दिया था कि थाने से उसके मोबाईल पर फोन आया था। दुर्भाग्यवश जब पुलिस आई तब मैं घर पर नहीं था वरना मुझे भी नगर थाना के देवतुल्य पुलिसवालों का देवदुर्लभ दर्शन प्राप्त करने का सुअवसर प्राप्त हो जाता। मैंने तो समझा था कि अब पुलिस चोरी की तफ्तीश करने कभी आएगी ही नहीं लेकिन आश्चर्य कि पुलिस आई। आकर पूछताछ की। किस पर शक है पूछा और संभावित चोर नत्थू साह के घर की ओर रवाना हो गई फिर क्या हुआ क्या पता क्या खबर!? होगा क्या यह जरूर हमें पता है कि कुछ भी नहीं। अब चोरी के एक महीने बाद पुलिस को न तो कोई सबूत नहीं मिलेगा और न ही कोई चोरी का सामान। अब तक तो चोर ने कब का नगदी को ठिकाना लगा दिया होगा और बिस्कुट,पावरोटी और दालमोट खा गया होगा और साबुनों से नहा गया होगा। 

मित्रों,सवाल उठता है कि फिर पुलिस आई ही क्यों? पारस ने आज शाम मुझे बताया कि उसने भी अनुसंधान अधिकारी से यही सवाल पूछा था तो वह बोला कि उसे तो पता ही नहीं था कि आपके यहाँ चोरी भी हुई है। हद हो गई पारस ने 12 जुलाई को एफआईआर के लिए आवेदन दिया और 13 जुलाई को केस नं.-575/14 दर्ज भी कर लिया गया,14 जुलाई के हिन्दुस्तान अखबार में समाचार प्रकाशित भी हुआ,खुद मैंने पहले थाने को और बाद में एसपी को फोन कर तत्परता दिखाने का अनुरोध किया फिर भी दारोगा जी को कल तक पता ही नहीं चला कि चोरी हुई है। फिर किसी भी घटना के बाद उनको कैसे तत्काल पता चलवाया जाए? बड़ी उलझन है। क्या आप पाठकों के पास कोई उपाय है,कोई युक्ति है?

(हाजीपुर टाईम्स पर भी प्रकाशित)

7.8.14

उत्तर प्रदेश (समाजवादी) संस्कृत संस्थान का दो दिवसीय समारोह

उत्तर प्रदेश (समाजवादी) संस्कृत संस्थान ने संस्कृत का पूरा पूरा मजाक उड़ाया . दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया श्री जनेश्वर मिश्र के नाम पर जिसमें एक विदुषी को पुरस्कृत भी किया गया । सम्मान देने और पुरस्कार देने में अंतर होता है । मंच पर लगे बैनर में जनेश्वर मिश्र और अखिलेश यादव का नाम दिखा परन्तु जिस गरीब विदुषी को डेढ़ लाख दिया गया उस बेचारी का नाम ही नहीं, ऐसा लगता है कि संस्थान कभी ऐसे आयोजन करता ही नहीं हो. भाषण एवं चाटुकारिता में तो समय दिया गया परन्तु पुरस्कार प्रक्रिया दो मिनट में निपटा दी गयी, आम परंपरा के तहत सारा आयोजन हिंदी और अशुद्ध उर्दू में किया गया. बेचारा संस्थान शायद कोई समाजवादी संस्कृत वक्ता नहीं खोज पाया होगा. गलती संस्थान की नहीं है, अब तो जो सर्वदा अयोग्य और संस्कृत न जानता हो वो इस संस्थान के अध्यक्ष पद के लिए एक योग्य व्यक्तित्व होगा. प्रथम दिवस और द्वितीय दिवस की प्रस्तुतियों ने संस्कृत का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी . अध्यक्ष महोदय स्वयं अपना नाम शंकर के स्थान पर संकर उच्चारित करते दिखे तो शेष का क्या दोष । खैर सकार इत्यादि दोष तो आज के विद्वानों में भी आम है ।

प्रथम दिवस संस्कृत नाटक के नाम पर शुरू की गई नृत्य नाटिका हिन्दी गीतों पर आ गई और यह शो जिसे एक नृत्याङ्गना द्वारा निदेशित बताया जा रहा, मात्र लाइट एण्ड साउण्ड शो बनकर रह गया .
द्वितीय दिवस का कजरी गायन गाँव में होने वाले ऑर्केस्ट्रा शो से अधिक स्तर का नहीं था, परन्तु किसी गलती की वजह से भास का नाटक आमन्त्रित कर लिया गया था, शायद आयोजक ये नहीं जानते होंगे कि इसकी सुन्दर प्रस्तुति होगी वर्ना वे श्री प्रेमचन्द को न आमन्त्रित करते । इस प्रस्तुति ने पूरे समारोह का स्वाद बिगाड़ दिया । अन्यथा हम कह सकते थे कि इतना घटिया आयोजन आगे कभी न होगा ।
मै यह जानना चाहूँगा कि आखिर किस की गलती से श्री प्रेमचन्द होम्बल आ गए . अवश्य ही यह गलती से हो गया होगा । खैर जिसकी भी गलती हो, कमसे कम एक अच्छी प्रस्तुति दिखी । इस समाजवादी गलती के लिए संस्थान धन्यवाद का पात्र है । नाटक का पूर्वरंग ही यह दिखा गया कि यदि आप काम करना जानते हैं तो बड़ी बड़ी लाइट या मल्टीमीडिया व्यर्थ है, नाटक का पूर्वरंग ही सारे समारोह पर भारी पड़ा और पूर्व के सारे आयोजन से बहुत आगे निकल गया ।
मजे की बात है कि अध्यक्ष महोदय भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं फिल्म इन्टीट्यूट पुणे से सम्बद्ध एवं प्रशिक्षित बताए गए फिर भी इतना निम्न आयोजन होना आश्चर्य जनक किन्तु सत्य की श्रेणी में ही गिना जाएगा ।
खैर अब मुझे यह अफसोस नहीं रहैगा कि उर्दू नाटक के नाम पर उर्दू एकेडमी ने अशुद्ध उर्दू उच्रचारण वाले कलाकारों को लेकर आगा हश्र कश्मीरी की ऐसी तैसी फेरी थी , संस्कृत भी क्यों पीठ दिखाए...
मगर आज तक मैंने उर्दू के कार्यक्रमों में संचालन में हिन्दी या संस्कृत का प्रयोग होता नहीं देखा, आमतोर पर नफीस उर्दू बोली जाती है, उर्दू अकादमी में भी स्टाफ उर्दू बोलता लिखता पढ़ता दिखता है परन्तु बोचारा संस्कृत संस्थान, यहाँ एक को छोड़ कोई भी संस्कृत का ज्ञान नहीं रखता । वास्तव में संस्कृत संस्थान की पहटान मात्र यहाँ के पुस्तकालय के कारण हैं जिस में छात्र पढ़ने आ जाते हैं, अन्यथा यहाँ सन्नाटा ही रहे ।