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28.3.12

कमजोर-लाचार नेतृत्व

सत्ता के प्रमुख के रूप में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के कामकाज पर निगाह डाल रहे हैं हृदयनारायण दीक्षित

कमजोर और मजबूर हाथों से सत्ता नहीं चलती। भारत ने बहुत सोच-समझकर इतिहास के प्रमुख शासक अशोक के स्तंभ से अपना राजचिह्न अशोक चक्र अपनाया। अशोक की तुलना मारकस आरेलियस, कोस्टेटाइन, सोलोमन और खलीफा उमर जैसे विश्व नायकों से होती है। इतिहासकार एचसी राय चौधरी ने लिखा है, उनमें चंद्रगुप्त की ऊर्जा थी, समुद्रगुप्त का तेज था, लेकिन कमजोर हाथों वाले उत्तराधिकारी प्राचीन मौर्य साम्राज्य को संगठित बनाए रखने में अक्षम रहे। राष्ट्र-राज्य कमजोर हाथों से मजबूत नहीं होते। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह कमजोर हैं। कमजोरी की ही परिणति है मजबूरी। प्रधानमंत्री ने लोकसभा में कहा, गठबंधन की मजबूरियों के चलते मुश्किल फैसले और मुश्किल हो जाते हैं। गठबंधन सरकारों में घटक दलों से समन्वय बनाना बेशक प्रधानमंत्री की व्यावहारिक मजबूरी होती है, लेकिन असल बात है उनकी व्यावहारिक कमजोरी। वह कांग्रेस संसदीय दल के स्वाभाविक निर्वाचित नेता नहीं हैं। उन्हें प्रधानमंत्री बनाया है सोनिया गांधी ने। संविधान के अनुसार वह संसद के प्रति जवाबदेह हैं, लेकिन असलियत में वह सोनिया गांधी की कृपा से ही प्रधानमंत्री हैं। ममता बनर्जी ने रेलमंत्री हटवाने के सवाल पर कड़वा सच ही कहा है, सोनिया प्रधानमंत्री चुन सकती हैं तो अपनी पार्टी की नेता होने के कारण रेलमंत्री मैं ही चुनूंगी। रेल ममता की है, प्रमुख सत्ता सोनिया की। भारत के लोगों का यहां क्या है? न प्रधानमंत्री और न अन्य मंत्री। प्रधानमंत्री कमजोर और मजबूर हैं। संविधान में मंत्रिमंडल के सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत है। डॉ. अंबेडकर ने संविधान सभा में सामूहिक उत्तरदायित्व की जिम्मेदारी प्रधानमंत्री पर ही डाली थी। उन्होंने कहा था कि सामूहिक उत्तरदायित्व प्रधानमंत्री के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल रूपी मेहराब के बीच का मुख्य पत्थर है। यहां मुख्य पत्थर ही कमजोर है तो सामूहिक उत्तरदायित्व कैसा? प्रधानमंत्री की मजबूरी से भारत का संसदीय ढांचा ध्वस्त हो गया है। दिनेश त्रिवेदी प्रधानमंत्री की संस्तुति पर रेलमंत्री बने। उन्होंने लोकसभा में रेल बजट रखा। रेल बजट की प्रशंसा प्रधानमंत्री ने भी की थी। फिर ममता का दबाव आया। कमजोर हाथ जुड़ गए। प्रधानमंत्री ने सिर झुकाया और अपने रेलमंत्री का सिर ममता को सौंपा। ममता ने मुकुल राय को रेलमंत्री बनाने का निर्देश दिया। रेल राज्यमंत्री रह चुके इन्हीं मुकुल राय ने असम रेल दुर्घटना के समय इन्हीं प्रधानमंत्री का निर्देश नहीं माना था। मंत्री को प्रधानमंत्री का विश्वासपात्र होना चाहिए, लेकिन विश्वासपात्र दिनेश त्रिवेदी को हटाने और स्वयं प्रधानमंत्री का भी निर्देश न मानने वाले मुकुल राय को रेलमंत्री बनाने की सिफारिश प्रधानमंत्री ने ही की है। सामूहिक उत्तरदायित्व का संवैधानिक सिद्धांत अपनी मौत मर गया। दिनेश त्रिवेदी गलत थे तो प्रधानमंत्री सहित पूरी मंत्रिपरिषद की जिम्मेदारी है। नेतृत्व प्रधानमंत्री ही करता है, वह त्यागपत्र देता है तो सबका त्यागपत्र अपने आप हो जाता है। वह हटता है तो सब हटते हैं। प्रधानमंत्री सत्ता का प्रमुख है। वह देश की अर्थनीति, समाजनीति, संस्कृति और राजव्यवस्था का सर्वोच्च प्रतिनिधि है। वही प्रमुख शासनकर्ता है। मनमोहन सिंह विश्व इतिहास के प्रथम प्रधानमंत्री हैं जो दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र में राज करते हैं, लेकिन शासन नहीं करते। उन्होंने ममता के सामने सिर झुकाया। उन्होंने द्रमुक की इच्छानुसार संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन किया। वह शासन नहीं करते। विशेषाधिकार की कौन कहे, वह प्रधानमंत्री के संवैधानिक प्राधिकार की भी रक्षा नहीं करते। मजबूरी का नाम प्रधानमंत्री-मनमोहन सिंह ने यही सिद्ध किया है। वह दूसरी दफा प्रधानमंत्री हैं। प्रधानमंत्री के रूप में उनका कोई निर्णय यादगार नहीं बनता। मनमोहन सिंह के समय चीन ने अरुणाचल को लेकर गलतबयानी की। पाकिस्तान ने कई दफा अपमानजनक टिप्पणियां कीं। वह प्रतिकार नहीं कर सके। संप्रग घटक दलों के नेता भी प्रधानमंत्री से सीधी बात नहीं करते। मनमोहन सिंह का अब तक का पूरा कार्यकाल दयनीय है। देश के भविष्य को लेकर उनका स्वप्न क्या है? वह क्या करना चाहते थे? पता नहीं चला, वह जो नहीं करना चाहते थे, वही करते दिखाई पड़े। उनके सहयोगी मंत्री घोटालों में फंसे, घोटाले दर घोटाले हुए। उन्हें पता नहीं चला। केंद्रीय सतर्कता आयुक्त की नियुक्ति को लेकर भी वह वीतराग रहे। वह हमेशा आत्मसमर्पण की मुद्रा में रहे। बहुत मजबूर हैं मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह का आत्मसमर्पण भारत की मुख्य चिंता नहीं है। मुख्य चिंता है देश की सर्वोच्च शासन संस्था की साख और गरिमा। प्रधानमंत्री देश का राजमुकुट और संप्रभुता का प्रतिमान हैं। वही परतंत्र, मजबूर और लाचार हैं तो देश का क्या होगा? संविधान के अनुसार मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री हैं, सर्वोच्च शासक हैं, उन्हें अपने मंत्री चुनने का अधिकार है लेकिन वस्तुत: उनका अपना अस्तित्व भी सोनिया गांधी के पास है और उनके मंत्रियों के प्राण भी दलीय नेताओं के पास। प्रधानमंत्री ही सरकार का मुखिया नहीं रहा। मंत्री के नाम दूसरे बताते हैं, प्रधानमंत्री हां करते हैं। मंत्री हटाने के निर्देश भी दूसरे देते हैं, प्रधानमंत्री उनके निर्देश मानने को मजबूर हैं। प्रधानमंत्री ने गठबंधन की मजबूरी की चादर में सारा सच ढक दिया है। क्या 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला गठबंधन की मजबूरी था? सीएजी की रिपोर्ट में 2-जी से कई गुने बड़े कोयला घोटाले की चर्चा है। घोटाले के समय कोयला विभाग प्रधानमंत्री के पास ही था। ढेर सारे घोटाले गठबंधन की ही मजबूरी नहीं हो सकते। असली सच है-हर हाल में सत्ता में बने रहने की कांग्रेसी पिपासा। कांग्रेस संवैधानिक संस्थाओं को बेइज्जत करते हुए ही सत्ता में है। ठीक है कि तृणमूल कांग्रेस संप्रग का एक घटक है, लेकिन कांग्रेस उससे बड़ा घटक है। कांग्रेस ने तृणमूल कांग्रेस के साथ संवैधानिक मर्यादाओं के पालन की भी साझेदारी क्यों नहीं की? संप्रग के घटक कांग्रेस की सत्ता-कमजोरी का ही लाभ उठाते हैं। वे आंख दिखाते हैं, कांग्रेस झुक जाती है। वे धौंस देते हैं, कांग्रेस डर जाती है। वे डांट देते है, कांग्रेस आत्मसमर्पण कर देती है। मनमोहन सिंह यही सब करने-कराने के लिए प्रधानमंत्री हैं। उनके आचरण से विश्व में भारतीय प्रधानमंत्री की साख को बट्टा लगा है। वास्तविक प्राधिकार से विहीन प्रधानमंत्री के राज में भारत का भविष्य और राष्ट्र का स्वाभिमान दांव पर है। प्रधानमंत्री की मजबूरी समझी जा सकती है, लेकिन प्राधिकारविहीन प्रधानमंत्री बने रहने की उनकी मजबूरी आखिरकार क्या है?
(लेखक उप्र विधानपरिषद के सदस्य हैं)
साभार :- दैनिक जागरण

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